एक खूंखार, लथपथ समय में गलत के विरोध की हर पहल स्वागत योग्य है. जो इस पर सवाल उठाते हैं वे कहीं ज्यादा सवालों के घेरे में हैं
कन्नड़ लेखक एमएम कलबुर्गी की हत्या के विरोध में जब हिंदी लेखक उदय प्रकाश ने अपना साहित्य अकादेमी सम्मान वापस करने का फ़ैसला किया तो हिंदी की दुनिया में उनकी प्रशंसा में कुछ आवाज़ें ज़रूर उठीं, लेकिन किसी ने उनका अनुसरण करने की ज़रूरत नहीं समझी. करीब एक महीने बाद जब अंग्रेजी लेखिका नयनतारा सहगल ने दादरी की वीभत्स घटना के बाद सम्मान वापस करने की घोषणा की तो अचानक हिंदी के कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी का ज़मीर जाग गया और उन्होंने भी सम्मान वापस करने का फ़ैसला कर लिया.
इसके बाद बीते चार दिन से जैसे साहित्य अकादेमी सम्मान लौटाने की होड़ लगी हुई है. हिंदी लेखकों कृष्णा सोबती, मंगलेश डबराल और राजेश जोशी के अलावा पंजाबी, कन्नड़, कश्मीरी जैसी दूसरी भाषाओं के कई बड़े लेखकों ने भी विरोध के लिए सम्मान वापसी का रास्ता चुना है. उदय प्रकाश ने कलबुर्गी की हत्या के बाद साहित्य अकादेमी की चुप्पी पर सवाल खड़े किए थे तो बाद के लेखकों ने दादरी की घटना के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी को कठघरे में खड़ा किया.
इन सबसे अचानक यह हुआ है कि सम्मान वापसी की जिस कवायद का वास्ता मूलत: हमारे समय में बढ़ रही कट्टरता के विरुद्ध माहौल बनाना था, वह आपसी खींचतान और साहित्य अकादेमी की भूमिका पर बहस तक सिमट रही है
जब लेखक समाज कलम के भीतर पैदा हुए इस प्रतिरोध भाव का जश्न मना ही रहा था तब असहमति की कई आवाज़ें भी आने लगीं. कुछ ने सीधे अपने राग-विराग के आधार पर लेखकों की नीयत पर शक किए तो कुछ ने पुरस्कार वापसी के औचित्य पर सवाल खड़े किए. लेकिन इन सबके बीच कम से कम दो आवाज़ें ऐसी दिखीं जिनकी उपेक्षा आसान नहीं है. साहित्य अकादेमी सम्मान विजेता मृदुला गर्ग ने कहा कि वे पुरस्कार नहीं लौटाने जा रहीं लेकिन सरकार के रवैये के विरुद्ध हैं. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि अगर लेखक अपनी ही अकादेमी को इस तरह कठघरे में खड़ा करेंगे तो इससे सरकार को दखल देने में आसानी होगी. साहित्य अकादेमी सम्मान विजेता अलका सरावगी ने भी कहा कि वे इस देश के नागरिक के तौर पर हर तरह की लोकतांत्रिक फासीवादी मानसिकता का विरोध करती हैं और अकादेमी की मौजूदा कमेटी के रवैये की निंदा भी करती हैं, लेकिन एक संस्था के रूप में अकादेमी से जो सम्मान उन्हें मिला है, वे उसे नहीं लौटाएंगी.
अंग्रेजी लेखक केकी दारुवाला ने भी अपना सम्मान वापस नहीं किया, मगर अकादेमी के अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी को चिट्ठी लिखी. इस पूरी प्रक्रिया में सबसे स्तब्धकारी वक्तव्य नामवर सिंह का रहा जिन्होंने सीधे यह इल्जाम लगा दिया कि पुरस्कार लौटाने वाले लेखक सुर्खियां बटोरने के लिए यह काम कर रहे हैं.
इन सबसे अचानक यह हुआ है कि सम्मान वापसी की जिस कवायद का वास्ता मूलत: हमारे समय में बढ़ रही कट्टरता के विरुद्ध माहौल बनाना था, वह आपसी खींचतान और साहित्य अकादेमी की भूमिका पर बहस तक सिमट रही है. कई लोगों का पूछा हुआ यह सवाल जायज़ बन गया कि बढ़ती कट्टरता के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए साहित्य अकादेमी का सम्मान वापस करने का औचित्य क्या बनता है. साहित्य अकादेमी की इसमें क्या भूमिका है? जिन लोगों ने पुरस्कार वापस किए हैं, उन सबने अपने-अपने ढंग से इस सवाल का जवाब दिया है. उन्हें दादरी जैसे ख़ौफ़नाक वाकये पर प्रधानमंत्री की चुप्पी खल रही है और एक लेखक के मारे जाने पर साहित्य अकादेमी की भी.
ऐसे प्रतिरोधों से ही वह ओजोन परत बनती है जो किसी वैचारिक पर्यावरण को जीने लायक बनाती है.
अब इस सिलसिले में धीरे-धीरे नए सवाल पैदा हो रहे हैं. क्या सार्वजनिक कट्टरता और उस पर शीर्ष की चुप्पी का प्रतिरोध लेखकों को निजी तौर पर करने की बजाय कोई सामूहिक रणनीति बनाकर नहीं करना चाहिए? या फिर क्या साहित्य अकादेमी के पुरस्कार लेने से लौटाने के बीच देश के सार्वजनिक जीवन में अभी के जैसा कुछ भी नहीं घटा जो लेखकों को पहले सम्मान लौटाने के लिए मजबूर करता? अचानक यह क्या हुआ कि सबके सब एक साथ पुरस्कार लौटाने पर आमादा हो गए? क्या नामवर सिंह सही कह रहे हैं कि यह सुर्खियां बटोरने की कोशिश है या महेश शर्मा सही कह रहे हैं कि इसके पीछे विचारधारा की राजनीति है. या विश्वनाथ तिवारी ठीक फ़रमा रहे हैं कि लेखकों ने आम चूस लिए, अब गुठली वापस कर रहे हैं? क्या यह वाकई एक गायब लक्ष्य पर देर से दागी गई गीली कारतूसें हैं जो बस धमाका करके ध्यान खींचना चाहती हैं?
सतह पर ये सवाल बड़े जायज़ दिखते हैं. लेकिन किसी भी प्रतिक्रिया के कुछ आयाम कारण और परिणामों वाली सतही शब्दावली से निकले इन सवालों से कुछ अलग भी हो सकते हैं. मसलन अगर कलबुर्गी की हत्या से स्तब्ध और साहित्य अकादेमी की चुप्पी से आहत और अपने ऊपर एक तरह का ख़तरा महसूस करते उदय प्रकाश को अचानक अपना अकादेमी पुरस्कार व्यर्थ लगने लगता है तो उन्हें क्या करना चाहिए? क्या उन्हें उन संगठनों की शरण में जाना चाहिए जिन पर वे पहले भी अविश्वास करते रहे हैं और उनसे आग्रह करना चाहिए कि वे इस मुद्दे पर आंदोलन करें? वे जो कर सकते थे, उन्होंने किया. अपने गांव से बैठे-बैठे सम्मान लौटाने की सूचना दी. अब इसमें आप जो राजनीति पढ़ना चाहें, पढ़ लें. इसके पहले भी उदय प्रकाश सार्वजनिक आरोपों की परवाह किए बिना ऐसे फैसले करते और उन पर टिकते रहे हैं जो उनको निजी तौर पर ठीक लगते हैं.
क्या ऐसा नहीं हो सकता कि उदय प्रकाश की पहल से जो शुरुआत हुई, उसे नयनतारा सहगल और अशोक वाजपेयी ने बढ़ाया तो बहुत सारे लोगों के भीतर की दुविधा ख़त्म हुई और उन्होंने भी अपने प्रतिरोध को व्यक्त करने का वही रास्ता चुन लिया. मृदुला गर्ग और अलका सरावगी या दूसरे कुछ लेखकों ने यह रास्ता नहीं चुना, फिर भी अपने प्रतिरोध को साहसपूर्वक सामने रखा तो इसे भी उनके निजी फ़ैसले की तरह ही देखा जाना चाहिए. ये सारे फ़ैसले सम्मान के योग्य हैं क्योंकि इनसे अहंकारी सत्ता को एक ठेस लगती है, उसे खयाल आता है कि उसके समाज में ऐसे प्रबुद्ध नागरिक बचे हुए हैं जो उसका विरोध कर सकते हैं. ठीक है कि इस विरोध का कोई सांगठनिक चरित्र नहीं है और इससे तात्कालिक तौर पर कुछ निकलेगा भी नहीं, लेकिन ऐसे प्रतिरोधों से ही वह ओजोन परत बनती है जो किसी वैचारिक पर्यावरण को जीने लायक बनाती है.
अगर कलबुर्गी की हत्या से स्तब्ध और साहित्य अकादेमी की चुप्पी से आहत और अपने ऊपर एक तरह का ख़तरा महसूस करते उदय प्रकाश को अचानक अपना अकादेमी पुरस्कार व्यर्थ लगने लगता है तो उन्हें क्या करना चाहिए?
इस पूरे वाकये में साहित्य अकादेमी की भूमिका बेहद अफ़सोसनाक है. प्रोफेसर कलबुर्गी की हत्या के बाद अगर उसने कोई वक्तव्य जारी नहीं किया तो इसे उसकी संस्थागत ढिलाई या कमज़ोरी माना जा सकता है. लेकिन उदय प्रकाश और दूसरे लेखकों द्वारा सम्मान वापसी के बाद उसकी ओर से जो प्रतिक्रिया आई, वह सांगठनिक अहंकार से भरी रही, एक लेखक-संस्थान होने की विनम्रता उसमें नहीं दिखी. ऐसा करते समय वह भूल गई कि अंततः अकादेमी लेखकों से बनी है, लेखक अकादेमी से नहीं बने हैं. उदय प्रकाश, अशोक वाजपेयी, राजेश जोशी या मंगलेश डबराल को साहित्य अकादेमी मिलने से इनकी हैसियत नहीं बढ़ी, उल्टे इनको सम्मानित कर अकादेमी ने वह विश्वसनीयता अर्जित की, जो कई मौकों पर संकट में दिखती है.
सबसे बड़ा सवाल है, क्या साहित्य अकादेमी सिर्फ एक पुरस्कार बांटने वाली, किताबों के अनुवाद कराने वाली बेजान संस्था है या वह समाज की मशाल बन सकने वाले लेखकों का पुंज भी है? अगर है तो उसे अपने लेखकों को यह भरोसा दिलाना होगा कि वह उनकी कलम की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है. यह काम उसने नहीं किया, उल्टे लेखकों पर कोड़े बरसाने लगी.
और इसमें क्या शक है कि यह चौकस रहने का समय है? ऐसा समय जो स्वतंत्रचेत्ता लोगों की पीठ पर चाबुक की तरह पड़ता है. ऐसा समय जिसमें धर्म और राष्ट्र के उन्माद से भरी ताकतें हर असहमत आवाज़ को कुचलने पर आमादा हैं. ऐसा समय जिसमें घनघोर सांप्रदायिकता और प्रतिक्रियावाद को मूल्य की तरह पेश किया जाता है और प्रगतिशीलता को पराया कह कर लांछित किया जाता है. ऐसा समय जो विवेक और तर्क को कभी राष्ट्रवाद के नाम पर निबटाना चाहता है, कभी आस्था के नाम पर पैदा जुनून से कुचल डालता है. ऐसा समय जिसमें घर के दरवाज़े पर दस्तक पड़ती है और 78 साल के बूढ़े के सिर पर गोलियां उतार दी जाती हैं. ऐसा समय जिसमें घर से निकाल कर किसी अख़लाक को सिर्फ इस शक पर मारा जा सकता है कि उसके फ्रिज में गोमांस है.
ऐसे खूंखार, लथपथ समय में जो लिखते हैं वे साहस दिखाते हैं. जो पुरस्कार लौटाते हैं, वे बताते हैं कि उनमें कुछ छोड़ने का बल बचा हुआ है. जो पुरस्कार न लौटा कर भी इस फासीवादी समय का प्रतिरोध करते हैं और साहित्य अकादेमी से एक बेहतर भूमिका की उम्मीद करते हैं, वे विवेक के पक्षधर लोग हैं. ऐसे समय में हर पहल स्वागत योग्य है. जो इस पर सवाल उठाते हैं, इसकी नीयत पर शक करते हैं, इसके दिशाहीन हो जाने का डर दिखाते हैं, और इसके व्यर्थ चले जाने की भविष्यवाणी करते हैं, वे कहीं ज़्यादा ख़तरनाक, दिशाहीन और विचारविहीन लोग हैं.