सुप्रीम कोर्ट ने एक लंबी बहस के बाद नेशनल ज्यूडीशियल अपॉइंटमेंट कमीशन एक्ट और इसके लिए जरूरी संविधान संशोधन विधेयक को असंवैधानिक बता दिया है. इसके साथ ही उसने तुरंत प्रभाव से पुरानी जजों द्वारा जजों की नियुक्ति की कॉलेजियम व्यवस्था को फिर से लागू कर दिया है. एक प्रकार से इस बात को स्वीकारते हुए कि कॉलेजियम व्यवस्था में भी खामियां हैं. क्योंकि न्यायालय ने 3 नवंबर से इस व्यवस्था में सुधार की प्रक्रिया पर सुनवाई शुरू करने की बात भी अपने आदेश में कही है.

अदालत के हजार पन्नों से लंबे आदेश में एनजेएसी कानून को मुख्यतः दो आधारों पर खारिज किया गया है. एक तो इसमें उच्च न्यायपलिका की नियुक्तियों में उसके सदस्यों की भूमिका प्रमुख नहीं है. दूसरा, अदालत के मुताबिक नया कानून संविधान द्वारा न्यायपालिका को दी गई स्वतंत्रता के पैमाने पर भी ठीक नहीं था.

अदालत ने तुरंत प्रभाव से पुरानी जजों द्वारा जजों की नियुक्ति की कॉलेजियम व्यवस्था को फिर से लागू कर दिया है. एक प्रकार से इस बात को स्वीकारते हुए कि कॉलेजियम व्यवस्था में भी खामियां हैं

अगर एनजेएसी कानून से बनने वाली सुप्रीम और हाई कोर्ट के जजों को चुनने के लिए बनी नई व्यवस्था की बात करें तो यह छह सदस्यों का एक आयोग थी जिसमें देश के मुख्य न्यायाधीश के अलावा सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठतम जज, कानून मंत्री और दो गणमान्य नागरिक शामिल थे. इन दो गणमान्य नागरिकों का चुनाव प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश की एक समिति को करना था.

अब अगर सुप्रीम कोर्ट की आपत्तियों के संदर्भ में इस नई व्यवस्था को देखें तो इसमें एक प्रावधान यह भी था कि अगर एनजेएसी के कोई दो सदस्य किसी नियुक्ति को वीटो कर देते हैं तो वह नियुक्ति नहीं होती. इसका मतलब यह हुआ कि यदि किसी नियुक्ति पर तीनों न्यायाधीशों को कोई एतराज नहीं था या वे इसे चाहते थे, तब भी जरूरी नहीं था कि वह होती ही. ऊपर से भले लगता हो कि आयोग में कार्यपालिका के सदस्य की संख्या एक – कानून मंत्री – ही है लेकिन बाकी के जो दो सदस्य हैं उन्हें चुनने वाली समिति में राजनेताओं – प्रधानमंत्री और नेता विपक्ष – का वर्चस्व ही था. ये सदस्य अपने मतलब के लिए एक होकर अपने हिसाब के लोगों को एनजेएसी का सदस्य बना सकते थे. और ये सदस्य कानूनमंत्री के साथ मिलकर आयोग में न्यायपालिका से आए सदस्यों के किसी भी निर्णय को वीटो कर सकते थे.

इसे थोड़ा और आगे जाकर देखें तो समझ में आता है कि यदि सरकार किसी सुप्रीम कोर्ट के जज से नाराज है तो कानून मंत्री सिर्फ एक और सदस्य के साथ मिलकर उसे देश का मुख्य न्यायाधीश बनने से रोक सकते थे. या हाईकोर्ट के किसी चीफ जस्टिस को सुप्रीम कोर्ट का जज बनने से. ऐसे में उच्च न्यायपालिका के जज सरकार या बड़े राजनेताओं के खिलाफ निर्णय देने से पहले दस दफा सोच सकते थे. यानी कि अदालत का यह मानना सही लगता है कि नई व्यवस्था में न्यायपालिका की ऊपर से दिखने के बावजूद प्रमुख भूमिका नहीं थी और इसमें उसकी स्वतंत्रता को चोट पहुंचा सकने वाले कारक भी मौजूद थे.

यदि सरकार किसी सुप्रीम कोर्ट के जज से नाराज है तो कानून मंत्री सिर्फ एक और सदस्य के साथ मिलकर उसे देश का मुख्य न्यायाधीश बनने से रोक सकते थे.

एनजेएसी कानून की धारा 5(1) कहती थी कि ‘आयोग के जिस सदस्य के नाम पर विचार चल रहा होगा वह आयोग की बैठक में भाग नहीं लेगा.’ इसका सीधा-सीधा मतलब यह था कि आयोग की बैठक में जब भी देश के मुख्य न्यायाधीश के चयन की प्रक्रिया चलती तो इसमें न्यायपालिका के तीन में से एक सदस्य भाग ही नहीं ले रहा होता. क्योंकि सबसे पहले तो मुख्य न्यायाधीश के पद पर नियुक्ति के लिए सर्वोच्च न्यायालय के सबसे वरिष्ठ सदस्य के नाम पर ही विचार किया जाता जो कि आयोग का ही एक सदस्य होता. एनजेएसी एक्ट का यह प्रावधान एनजेएसी में न्यायपालिका की भूमिका को और भी सीमित कर देने वाला था.

इसके अलावा एनजेएसी एक्ट में कई बातों को लेकर थोड़ा अस्पष्टता भी थी. मिसाल के तौर पर कानून में यह नहीं कहा गया था कि एनजेएसी की बैठकों का कोरम क्या होगा. एक्ट के मुताबिक मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति वरिष्ठता के आधार पर की जानी थी यदि वह इसके लायक हो तो. लेकिन वह इसके लायक क्यों नहीं होगा इसके बारे में भी कानून में अस्पष्टता थी.

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर से हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में नियुक्तियों की जिस पहले वाली कॉलेजियम व्यवस्था को लागू किया है उसका जन्म 1993 और 1998 के ‘सेकंड’ और ‘थर्ड जजेज़’ वाले मामलों में आए सुप्रीम कोर्ट के ही फैसलों से हुआ था. इन फैसलों में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि देश का मुख्य न्यायाधीश केवल वरिष्ठता के आधार पर ही बनाया जाएगा और बाकी न्यायाधीशों की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठ न्यायाधीशों का एक कॉलेजियम करेगा. हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए भी कुछ-कुछ ऐसी ही व्यवस्था सर्वोच्च न्यायालय ने की थी.

एक बार फिर से लागू हो चुकी कॉलेजियम की व्यवस्था को सही ठहराया जा सकता था यदि यह आदर्श न भी होती तो भी कम से कम पारदर्शी तो होती.

सर्वोच्च न्यायालय का कोई जज कैसे नियुक्त होगा इसके बारे में संविधान के अनुच्छेद 124 में लिखा है. इसके मुताबिक सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति राष्ट्रपति (यानी कि केंद्र सरकार या कैबिनेट), जितने उन्हें जरूरी लगें उतने, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों से सलाह के बाद करेंगे. हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए अनुच्छेद 217 है, जिसमें लिखा है कि उनकी नियुक्ति राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, राज्य के राज्यपाल और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सलाह से करेंगे.

सन 1993 से पहले की सरकारों ने संविधान के इन प्रावधानों को कुछ इस तरह से लिया था कि जजों की नियुक्ति के लिए मुख्य न्यायाधीश या न्यायपालिका से विचार-विमर्श करना भले आवश्यक हो, लेकिन उसकी सलाह से सहमत होना जरूरी नहीं है. इसलिए वे उस वक्त जिसे और जैसे चाहती थीं नियुक्त कर देती थीं.

कॉलेजियम वाली व्यवस्था 1993 से पहले से तो बेहतर है. लेकिन यह भी सच है कि यह संविधान में जजों की नियुक्ति से जुड़े प्रावधानों से ठीक से मेल नहीं खाती. संविधान ने जजों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका को महत्वपूर्ण माना था जबकि कॉलेजियम की व्यवस्था में सरकार की कोई भूमिका है ही नहीं.

कॉलेजियम वाली व्यवस्था में सुधार की जरूरत इसलिए भी है कि जजों द्वारा जजों को नियुक्त करने में हितों का टकराव साफ दिखता है.

एक बार फिर से लागू हो चुकी कॉलेजियम की व्यवस्था को सही ठहराया जा सकता था यदि यह आदर्श न भी होती तो भी कम से कम पारदर्शी तो होती. लेकिन जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने पिछले साल जजों की नियुक्ति से जुड़ी ऐसी कई बातें सार्वजनिक कीं जिनसे लगता है कि इसने कुछ नियुक्तियां पूरी तरह से अतार्किक आधार पर की थीं. इसके अलावा जस्टिस दिनकरण का उदाहरण हमारे सामने है ही, जिनपर लगे तमाम आरोपों के बाद भी उनकी नियुक्ति की अनुशंसा सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने कर दी थी. और कॉलेजियम के एक सदस्य की आपत्तियों के बावजूद पिछले से पिछले मुख्य न्यायाधीश अल्तमश कबीर की बहन की नियुक्ति का मामला भी है.

इस सब से निकल कर यह आता है कि कॉलेजियम व्यवस्था पिछली कार्यपालिका वाली व्यवस्था से बेहतर भले हो लेकिन इसे और बेहतर बनाना भी उतना ही जरूरी था और है. कॉलेजियम वाली व्यवस्था में सुधार की जरूरत इसलिए भी है कि जजों द्वारा जजों को नियुक्त करने में हितों का टकराव साफ दिखता है. 1993 से पहले सरकार द्वारा जजों की नियुक्ति के मामले में भी ऐसा ही था क्योंकि अदालतों में सबसे बड़े और सबसे ज्यादा मामले सरकार के ही चलते हैं या उसे चलाने वालों के.

इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने अगर पहली बार इस व्यवस्था में सुधार की जरूरत को मानकर इसकी प्रक्रिया को खुद ही आगे बढ़ाने का फैसला किया है तो यह कई वजहों से स्वागत योग्य है.

एनजेएसी के मसले पर अपने बचाव में जितने भी प्रयास न्यायालय कर रहा था, सरकार की तरफ से उतने ही प्रहार उसे और झेलने पड़ रहे थे

अदालत में एनजेएसी का बचाव करते हुए केंद्र सरकार खुले तौर पर कॉलेजियम व्यवस्था को गलत ठहरा रही थी. लेकिन जिन न्यायाधीशों के सामने यह तर्क दिए जा रहे हैं, वे स्वयं उसी व्यवस्था के कारण नियुक्त हुए थे. इसलिए कई मौकों पर वे याचिकाकर्ताओं के स्थान पर खुद ही इसका बचाव करने लगते थे. लेकिन अपने बचाव में जितने भी प्रयास न्यायालय कर रहा था, सरकार की तरफ से उतने ही प्रहार उसे और झेलने पड़ रहे थे. अब अपनी गरिमा को लगातार लगती रही ठेस की भरपायी करने का सुप्रीम कोर्ट ने खुद को ही एक मौका दिया है तो यह एक सही कदम है.

ऐसा करना इसलिए भी जरूरी है कि इससे उसके और विधायिका के बीच टकराव की स्थिति की संभावना कम होती है. एनजेएसी एक्ट पर बहस के दौरान न्यायालय ने एक बार केंद्र सरकार से सवाल किया था ‘यदि हम एनजेएसी को असंवैधानिक घोषित कर दें और कॉलेजियम को ही वापस ले आएं तो?’ इसके जवाब में सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार का कहना था, ‘इस घोषणा को अमान्य करार दिया जा सकता है.’ जब न्यायालय ने उनसे पूछा कि हमारे फैसले को कौन अमान्य करार देगा तो कुमार का जवाब था, ‘संसद इसे अमान्य घोषित कर देगी.’

इस तरह की अप्रिय स्थिति से सर्वोच्च न्यायालय को यदि बचना है तो उसे अपना काम सही से करना होगा. यानी कि कॉलेजियम तंत्र पर उसे दूसरों के विचार ठीक से सुनकर उसमें कई ईमानदार बदलाव लाने होंगे या उसे किसी और व्यवस्था से बदलना होगा (वह एनजेएसी को भी जरूरी बदलाव के साथ स्वीकार कर सकता है या बिलकुल ही किसी नई व्यवस्था को भी). नहीं तो एनजेएसी एक्ट जैसे कम ईमानदार बदलाव का जो हाल उसने किया है, वैसा ही हाल संसद भी उसके वर्तमान निर्णय और बदलावों का कर सकती है.