आरएसएस और भाजपा के लिए यह हमेशा से मुद्दा रहा है जिसमें उसे अब न्यायपालिका का भी साथ जोर-शोर से मिल रहा है. तो क्या देश में समान नागरिक संहिता को लागू करने का समय आ चुका है?
राम मंदिर, अनुच्छेद 370 और समान नागरिक संहिता. ये तीनों ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें भाजपा अक्सर उठाती रही है. इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि इन्हीं मुद्दों ने भाजपा को भी उठाया है. 90 के दशक में राम मंदिर की लहर पर सवार होकर ही भाजपा देशव्यापी हुई थी. इसके साथ ही कश्मीर को विशेषाधिकार देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को समाप्त करना और समान नागरिक संहिता को लागू करना हमेशा भाजपा के एजेंडे में रहा.
लेकिन समय के साथ इन तीनों ही मुद्दों पर, कभी गठबंधन के नाम पर तो कभी किसी और वजह से, भाजपा की आवाज़ मद्धम होती गई. 90 के दशक में जो भाजपा अपने घोषणापत्र में प्रमुखता से ‘किसी भी हाल में राम मंदिर बनाने’ की बात कहती थी, 2014 आते-आते वही भाजपा ‘कानून के दायरे में राम मंदिर बनाने की संभावनाएं तलाशने’ की बात करने लगी. इतना ही नहीं, इस दौरान राम मंदिर का यह मुद्दा भाजपा के चुनावी घोषणापत्र में पहले पन्ने से खिसककर 41वें पन्ने पर जा पहुंचा.
जहां राम मंदिर के निर्माण और अनुच्छेद 370 को समाप्त करने में न्यायपालिका केंद्र सरकार की राह में बाधा है, वहीं समान नागरिक संहिता को लागू करवाने में उसे न्यायपालिका का भी साथ मिल रहा है
कश्मीर को विशेषाधिकार देने वाले अनुच्छेद 370 के साथ भी कुछ ऐसा ही है. 2014 के लोकसभा चुनावों में इसे समाप्त करने की बात भाजपा करती रही लेकिन इसके बाद जब जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव हुए तो भाजपा ने इस मुद्दे को अपने घोषणापत्र में शामिल तक करना जरूरी नहीं समझा. हाल ही में जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में यह कहा था कि अनुच्छेद 370 को किसी भी हाल में हटाया या संशोधित नहीं किया जा सकता. इस पर भी भाजपा की कोई प्रतिक्रिया अब तक नहीं आई है.
समान नागरिक संहिता पर भी भाजपा अब पहले वाले तेवर नहीं दिखाती. पहले ‘किसी भी हाल’ में इसे लागू करने की मांग करने वाली भाजपा सत्ता में आने के बाद से इस पर ‘सबसे राय-मशविरा’ करने की बात कहने लगी है.
इन तीनों ही मुद्दों में एक दिलचस्प समानता यह भी है कि न्यायपालिका का हस्तक्षेप इन सभी में बना हुआ है. लेकिन एक तरफ जहां राम मंदिर के निर्माण और अनुच्छेद 370 को समाप्त करने में न्यायपालिका केंद्र सरकार की राह में बाधा है, वहीं समान नागरिक संहिता को लागू करवाने में उसे न्यायपालिका का भी साथ मिल रहा है. हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से तीन हफ्तों मे इस सवाल का जवाब मांगा है कि वह देश में समान नागरिक संहिता लाना चाहती है या नहीं.
इस व्यवस्था से हिन्दू धर्म के कानूनों में बड़ा बदलाव नहीं आएगा जबकि अल्पसंख्यकों के कानून काफी हद तक बदल जाएंगे.
सर्वोच्च न्यायालय ने उस याचिका पर सुनवाई के दौरान ऐसा किया जिसमें उस कानूनी प्रावधान को चुनौती दी गई थी जिसके चलते किसी भी ईसाई दंपति को तलाक लेने से पहले कम से कम दो साल तक इंतज़ार करना होता है. जबकि अन्य धर्मों के लोगों के लिए यह समय एक साल ही है. सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रमजीत सेन और जस्टिस शिव कीर्ति सिंह की खंडपीठ का केंद्र सरकार की पैरवी कर रहे अधिवक्ता से कहना था, ‘यह पूरी तरह से भ्रम की स्थिति है. हमें समान नागरिक संहिता पर काम करना चाहिए....'
समान नागरिक संहिता का जिक्र भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में किया गया है. इसके अनुसार देश के सभी नागरिकों के लिए सिविल कानून एक जैसे होने चाहिए. लेकिन मौजूदा समय में किसी भी व्यक्ति की संपत्ति, विरासत, विवाह, तलाक और बच्चा गोद लेने जैसे अधिकारों का फैसला उस व्यक्ति के धर्म के आधार पर होता है. सभी धर्मों के लिए अलग-अलग सिविल कानून मौजूद हैं. समान नागरिक संहिता इन तमाम कानूनों को हटाकर सबके लिए एक जैसा कानून बनाए जाने की व्यवस्था है.
चूंकि इस व्यवस्था से हिन्दू धर्म के कानूनों में कोई बड़ा बदलाव नहीं आएगा जबकि अल्पसंख्यकों के कानून काफी हद तक बदल जाएंगे. इसीलिए अल्पसंख्यक समुदायों के कुछ लोग समान नागरिक संहिता को अपने धार्मिक मामलों में दखल के रूप में देखते हैं. इसके चलते विभिन्न सरकारें इस मामले को ‘संवेदनशील’ मानते हुए इससे अब तक बचती रही हैं.
हो सकता है कि अदालत के रुख की वजह से दूसरे दल सीधे-सीधे समान नागरिक संहिता का विरोध न करें. लेकिन पुराने कई कानूनों को हटाकर नये बनने वाले कानून के रंग-रूप पर तो वे ऐतराज कर ही सकते हैं
हालांकि ऐसे लोगों की कमी नहीं जो ये मानते हैं कि समान नागरिक संहिता कानून को धर्म से अलग करने की बात करती है न कि किसी के धार्मिक मामलों में किसी तरह का दखल देती है. लेकिन ‘हिन्दू राष्ट्र’ की बात करने वाले विश्व हिन्दू परिषद् और आरएसएस जैसे संगठन जब इसकी पैरवी करते हैं तो कई लोगों के मन में इसे लेकर बड़े सवाल पैदा हो जाते हैं.
चूंकि भाजपा की वैचारिक प्रेरणा का स्रोत आरएसएस शुरू से समान नागरिक संहिता का हामी रहा है इसलिए वह भी एकमात्र ऐसी पार्टी रही जिसने हमेशा समान नागरिक संहिता को लागू करने की पैरवी की. अब जब केंद्र में उसी की एक मजबूत सरकार है, न्यायपालिका उसके साथ है तो क्या कहा जा सकता है कि समान नागरिक संहिता को लागू करने का समय आ गया है?
इस सवाल के जवाब में मुख्यतः दो तरह की बातें सामने आती हैं. एक वर्ग है जो मानता है कि समान नागरिक संहिता के लागू होने से देशभर के अल्पसंख्यक इसका विरोध करेंगे और इससे देश का माहौल बिगड़ भी सकता है. यह एक ऐसा तर्क है जो पिछले कई सालों से इस व्यवस्था को लागू करने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बनता रहा है. इस वर्ग के लोगों का यह भी कहना है कि वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के बाद से देश में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं बढ़ गई हैं. ऐसे में समान नागरिक संहिता का लागू होना इस माहौल में ‘आग में घी डालने’ जैसा हो सकता है.
विरोध का सामना करने के लिए नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार अटल बिहारी वाजपेयी की उस सरकार से थोड़ी प्रेरणा ले सकती है जो खुद समान नागरिक संहिता पर ज्यादा आगे नहीं बढ़ सकी थी.
इसके उलट दूसरे वर्ग का मानना है कि यह लंबे समय से भाजपा का एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा रहा है. न्यायपालिका खुद इस समय उससे समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए बार-बार कह रही है. इसलिए इस मुद्दे पर आगे बढ़ने में उसे कोई हिचक होनी नहीं चाहिए. बल्कि ऐसा न करने पर उसे आने वाले समय में तरह-तरह के सवालों का सामना करना पड़ सकता है. इस वर्ग में कई लोगों का यह भी मानना है कि समान नागरिक संहिता के लागू होने से भाजपा को दोहरा फायदा हो सकता है. यह एक ऐसा मसला है जो भाजपा की पारंपरिक छवि को बनाए रखते हुए, देश के प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष वर्ग को भी उससे जोड़ सकता है.
लेकिन इसका लागू होना न होना इस पर भी निर्भर करता है कि बाकी के दल इस पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं. चूंकि राज्यसभा में भाजपा अल्पमत में है इसलिए समान नागरिक संहिता पर उसे बाहरी दलों का सहयोग भी चाहिए ही होगा. हो सकता है कि अदालत के रुख की वजह से ये दल सीधे-सीधे समान नागरिक संहिता का विरोध न करें. लेकिन पुराने कई कानूनों को हटाकर नये बनने वाले कानून के रंग-रूप पर तो ऐतराज कर ही सकते हैं. ऐसी हालत में यूनीफॉर्म सिविल कोड को लागू करना वर्तमान भाजपा सरकार के लिए आसान तो बिलकुल नहीं होगा.
ऐसे में इस विरोध का सामना करने के लिए नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार, अटल बिहारी वाजपेयी की उस सरकार से थोड़ी प्रेरणा ले सकती है जो खुद समान नागरिक संहिता पर ज्यादा आगे नहीं बढ़ सकी थी. वर्तमान केंद्र सरकार विपक्ष के विरोध को वाजपेयी सरकार की तरह संसद का मिला-जुला सत्र बुलाकर भी कुंद कर सकती है और वाजपेयी की एक बात को ध्यान में रखकर भी. पूर्व प्रधानमंत्री ने इस्लाम में निकाह से पहले लड़की की अनुमति लेने के नियम की सराहना करते हुए कहा था कि इसे समान नागरिक संहिता में शामिल करते हुए सभी के लिए अनिवार्य बना देना चाहिए. अगर वर्तमान भाजपा सरकार नया कानून बनाते समय इतनी सहिष्णुता के साथ अन्य धर्मों की सकारात्मक बातों को नए कानून में जगह दे सकती है तो इससे भी उसका विरोध कम हो सकता है.