अमरावती का आंध्र प्रदेश की राजधानी बनना इसकी दो हजार साल से भी पुरानी सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत का सबसे अच्छा सम्मान है.
उत्तर भारत के आम लोग अमरावती नगर को तब से पहचानते हैं जब दूरदर्शन पर ‘अमरावती की कथाएं’ नाम का सीरियल आया करता था. यह आज से डेढ़ दशक या उससे और पहले की बात होगी. तब हम सबके लिए यह दक्षिण भारत का कोई ऐसा इलाका था जहां के ग्राम्य जीवन की कहानियां हमें खूब रिझाती थीं.
लेकिन अब हमारी स्मृतियों में बसे अमरावती का वह ग्राम्य अतीत हमेशा के लिए पीछे छूटने वाला है. आज आंध्र प्रदेश की नई राजधानी की आधारशिला रखे जाने के साथ अमरावती के अत्याधुनिक शहर में बदलने की प्रक्रिया शुरू हो रही है. इस प्रक्रिया से जुड़ी बड़ी ही दिलचस्प बात है कि इससे पहले जो भी कवायदें हुईं वे अपने आप में इतनी ही रोचक हैं कि भविष्य में उन्हें ‘राजधानी अमरावती की कथाओं’ का दर्जा मिल सकता है.
आंध्र प्रदेश के हर गांव से थोड़ी-थोड़ी मिट्टी और पानी इकट्ठा करके अमरावती में उस जगह मिलाया गया है जहां नई राजधानी की आधारशिला रखी जानी है
एक तरह से देखें तो अमरावती इतिहास, भूगोल, धर्म और संस्कृति का अद्भुत मेल है. यह कृष्णा नदी किनारे बसा है और देश की चुनिंदा बसाहटों में से है जहां कोई नदी पूर्व या दक्षिण के बजाय उत्तर की तरफ बहती है. इसे हिंदू धर्म में पवित्रता का प्रतीक समझा जाता है. धार्मिक लिहाज से तो राजधानी बनने के लिए अमरावती के पास यह पुख्ता आधार था ही लेकिन प्रदेश की टीडीपी सरकार और मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने इसे पूरे राज्य की अस्मिता का प्रतीक बनाने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है. वैसे नई राजधानी का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों विजयादशमी के दिन हो रहा है. यह दिन भी अपने आप में भारतीय समाज के लिए बेहद खास है.
आंध्र प्रदेश में पिछले दिनों लगातार एक मुहिम चली है जिसके तहत हर गांव से एक किलो मिट्टी और एक लीटर पानी जमा किया गया है. यह मिट्टी और पानी कृष्णा नदी के किनारे उस जगह पर डाली गई है जहां नई राजधानी की आधारशिला रखी जाएगी. इसके अलावा यहां पूरे भारत के धार्मिक स्थलों से मिट्टी लाकर मिलाई गई है. इनमें वैष्णो देवी का स्थान भी शामिल है तो अजमेर शरीफ की मिट्टी भी यहां लाई गई है.
नायडू सरकार ने अमरावती को विश्वस्तरीय शहर बनाने के लिए सिंगापुर सरकार के साथ पिछले साल दिसंबर में एमओयू पर हस्ताक्षर किए थे. फिर जब सिंगापुर सरकार ने एक बार शहर का मास्टर प्लान सरकार के सामने पेश कर दिया तो उसके व्यापक अध्ययन और विचारविमर्श के बाद राजधानी की आधारशिला रखे जाने की तारीख तय हुई. इस मास्टर प्लान के मुताबिक प्रस्तावित राजधानी क्षेत्र में तकरीबन 17 वर्ग किमी का एक मुख्य केंद्रीय राजधानी क्षेत्र होगा. यहां सरकारी कार्यालय, कर्मचारियों के घर और तकरीबन तीन लाख लोगों के रहने की जगह होगी. इसके चारों तरफ तकरीबन 217 वर्ग किमी का एक बड़ा शहर होगा. अनुमान है कि राजधानी के केंद्रीय भाग के विकास में तकरीबन 20 हजार करोड़ रुपये खर्च होने हैं लेकिन यह लागत इसे अपनी तरह का आधुनिकतम और विश्वस्तरीय शहर बना देगी.
सातवाहन वंश ने अमरावती क्षेत्र में हिंदू धर्म को खूब बढ़ावा दिया. उनके शासन काल में ही यहां अमरलिंगेश्वर मंदिर बना, जिसके आधार पर पहली बार शहर को अमरावती नाम मिला
यह तो अमरावती के भविष्य की बात हुई लेकिन हैदराबाद की जगह इस शहर का नई राजधानी बनना यूं ही नहीं है. अमरावती का सामान्य परिचय बताता है कि यह शहर राज्य की समृद्ध सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है.
तेलुगू साम्राज्य का केंद्र
अमरावती प्राचीन और मध्यकाल में तेलुगू साम्राज्य का केंद्र रहा है. ईसापूर्व दूसरी सदी से लेकर 16वीं शताब्दी तक यह सातवाहन वंश, इक्ष्वाकू, चालुक्य, तेलुगू चोल, पल्लव, काकातिया और रेड्डी राजाओं के शासन में रहा. सोलहवीं शताब्दी के मध्य तक यह कर्नाटक के विजयनगर साम्राज्य का हिस्सा था.
नदी किनारे एक और राजधानी
नई राजधानी पुराने अमरावती शहर से 35 किमी दूर है. सरकार ने इसके लिए विजयवाड़ा और गुंटूर के बीच 33 हजार एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया है. यह जगह कृष्णा नदी के किनारे पर है जहां उससे उसकी एक सहयोगी नदी मुन्नेरू मिलती है.
धर्मों का मिलन स्थल
सातवाहन वंश के शासन के पहले अमरावती बौद्ध धर्म का केंद्र था. यहां सम्राट अशोक के समय (269 से 232 ईसापूर्व) निर्मित स्तूप और बौद्ध मठ के अवशेष पाए गए हैं. सातवाहन वंश ने यहां हिंदू धर्म को खूब बढ़ावा दिया. उनके शासन काल में ही यहां अमरलिंगेश्वर मंदिर बना, जिसके आधार पर पहली बार शहर को अमरावती नाम मिला. इसके बाद आए राजवंशों ने यहां जैन धर्म को खूब बढ़ावा दिया और शहर का नाम श्रीधन्यकातक हो गया. इस शब्द का मतलब है ‘सहनशीलता का नगर’
जब नगर उपनिवेश बना
18 वीं शताब्दी में यहां वासीरेड्डी वंश का शासन था और इसके आखिरी राजा वैंकटाद्री नायडू ने शहर को अमरावती नाम दिया था. हैदराबाद रियासत का हिस्सा रहते हुए 1750 में यह क्षेत्र फ्रांस को दे दिया गया. 1759 में यह अंग्रेजों के मद्रास प्रेसीडेंसी के अधीन आ गया और इसके बाद इसका महत्व लगातार कम होता गया.
प्राचीन अमरावती बनाम राजधानी अमरावती
प्राचीन अमरावती को नए राजधानी क्षेत्र के साथ ही अलग सांस्कृतिक विरासत वाले शहर के रूप में विकसित किया जा रहा है. इसके लिए केंद्र सरकार से फंड मिलेगा. 16 हजार की आबादी वाला अमरावती फिलहाल ग्राम पंचायत है और जल्दी ही ये राजधानी विकास प्राधिकरण के तहत आ जाएगा.