प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन यात्रा से खुलेगा मानसरोवर का नया रास्ता
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के बाद चीन-भारत के बीच गतिरोध बढ़ने की तमाम आशंकाओं के बीच एक अच्छी खबर है. खबर यह है कि अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले कुछ महीनों में ही चीन की यात्रा करेंगे. इस वक्त चीन की यात्रा पर गईं विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने यह जानकारी दी है. उन्होंने कहा है कि प्रधानमंत्री के रूप में एक साल का कार्यकाल पूरा करने से पहले ही मोदी की यह यात्रा हो जाएगी. सूत्रों के मुताबिक दोनों देशों ने सीमा विवाद से लेकर कई अन्य समझौतों पर भी काम करना शुरू कर दिया है. इन समझौतों को मोदी की चीन यात्रा के दौरान अंतिम रूप दिया जाएगा. बताया जा रहा है कि चीन के साथ होने वाले समझौतों में सबसे प्रमुख समझौता तिब्बत स्थित मानसरोवर की यात्रा के लिए नाथूला दर्रे से अतिरिक्त रास्ता तैयार करने को लेकर होना है. नाथूला दर्रे से मानसरोवर तक रास्ता बनाने के भारत के प्रस्ताव को लेकर चीन सकारात्मक रुख दिखा चुका है. इस रास्ते से आवागमन शुरू होने के बाद मानसरोवर की यात्रा पहले के मुकाबले आसान हो जाएगी, और अधिक से अधिक लोग मानसरोवर जा सकेंगे. एक अनुमान के मुताबिक अब तक हर साल 800 से 900 यात्री कैलाश मानसरोवर की यात्रा करते हैं.
चौरासी पर बैठेगी एसआईटी ? 1984 के सिख विरोधी दंगों की जांच के लिए एसआईटी का गठन हो सकता है. केंद्र सरकार द्वारा बनाई गई एक समिति ने ऐसा करने की सिफारिश की है. रिटायर्ड जस्टिस जीपी माथुर की अध्यक्षता वाली इस समिति ने सरकार को बताया है कि लगभग 225 मामले ऐसे हैं जिन्हें फिर से खोले जाने की जरूरत है. समिति के मुताबिक इन मामलों में बहुत से अहम सबूत मौजूद हैं लिहाजा इनकी नए सिरे से पड़ताल होनी चाहिए. समिति ने सरकार से कहा है कि जिन मामलों का अदालतों में निपटारा हो चुका है उनमें भले ही ज्यादा कुछ नहीं किया जा सकता है, लेकिन ऐसे मामलों की जांच दोबारा शुरू की जा सकती है, जिनमें पर्याप्त सबूत होनें के बावजूद पुलिस ने ठीक से काम नहीं किया और मामलों को बंद करने में अधिक दिलचस्पी दिखाई. इस सिफारिश के बाद दंगा पीड़ितों के लिए न्याय की आस एक बार फिर से जग गई है. सूत्रों के मुताबिक एसअईटी का गठन दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद किया जा सकता है. इस बीच दंगे की जांच नये सिरे से होने की संभावना को देखते हुए कांग्रेस भी सजग हो गई है. कांग्रेस इसे दिल्ली विधानसभा चुनाव में मतदाताओं को लुभाने के प्रयास के रूप में देख रही है.
प्रधानमंत्री समेत कई सांसदों की सांसद निधि जस की तस विकास कार्यों में रुकावट के सवालों पर जनप्रतिनिधियों द्वारा अक्सर धन की कमी का रोना रोया जाता है. लेकिन पर्याप्त पैसा होने के बाद भी यदि विकास योजनाएं शुरु न हो पा रही हों तो इसे जनप्रतिनिधियों का उदासीन रवैया मानना कहीं से भी गलत नजर नहीं आता. 16वीं लोकसभा के लिए चुने गए अधिकतर सांसदों ने अपनी सांसद निधि खर्च करने को लेकर ऐसा ही उदासीन रवैया अपनाया हुआ है. लोकसभा के गठन को आठ महीने से भी ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद इन सांसदों ने अभी तक सांसद निधि से एक रुपया तक खर्च नहीं किया है. संख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के आंकड़ों से इस बात का पता चाला है. इन आंकड़ों के मुताबिक अब तक सिर्फ 10 राज्यों के सांसदों ने ही एमपी फंड के तहत मिलने वाले पैसे का उपयोग करना शुरू किया है. यह स्थिति तब है जबकि मई 2014 से जनवरी 2015 तक लोकसभा के सभी सांसदों को पहली किस्त के रूप में बारह सौ करोड़ से भी ज्यादा पैसे जारी किये जा चुके हैं. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों का नाम भी सांसद निधि खर्च न करने वालों में शामिल है. सासंद निधि का पैसा खर्च न करने वाले सबसे अधिक सांसद भाजपा के बताए जा रहे हैं. इनके अलावा सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मुलायम सिंह यादव जैसे विपक्षी दलों के सांसदों ने भी अपनी सांसद निधि अब तक 'कोल्ड स्टोर' से बाहर नहीं निकाली है. मालूम हो कि, सांसद निधि के तहत प्रत्येक सांसद को हर साल पांच करोड़ रुपये जारी किए जाते हैं, ताकि इसका उपयोग वे अपने लोकसभा क्षेत्र की बुनियादी जरूरतों को पूर करने में कर सकें.
चुनाव निपटते ही बढ सकता है मेट्रो का किराया राजधानी की लाइफ लाइन मानी जाने वाली दिल्ली मेट्रो का सफर विधानसभा चुनाव के बाद मंहगा हो सकता है. सरकार ने मेट्रो के किराये की समीक्षा प्रक्रिया शुरू कर दी है. इसको लेकर केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने मेट्रो पास तथा किराया तय करने वाली समिति के गठन का प्रस्ताव रखा है. इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलते ही समिति का गठन कर दिया जाएगा, जो तीन महीने में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप देगी. सूत्रों के मुताबिक रिटायर्ड जस्टिस एके श्रीवास्तव इस किराया निर्धारण समिति के मुखिया होंगे. मैट्रो किराया बढाए जाने को लेकर डीएमआरसी ने कुछ दिन पहले संकेत दे दिया था कि परिचालन में भारी बढेतरी के चलते ऐसा किया जा सकता है. दिल्ली मेट्रो के किराये में आखिरी बार संशोधन साल 2009 में किया गया था. उसके बाद दिल्ली मेट्रो ने साल 2012 में भी सरकार से किराया बढाने का अनुरोध किया था, लेकिन तब किराया निर्धारण कमेटी का गठन नहीं हो पाने से यह मामला लटक गया था.