कई कहते हैं कि अगर सचिन देव बर्मन कुछ वर्ष और जीवित रहते तो श्रेष्ठता के लिए उनके पुत्र राहुल देव बर्मन की सबसे बड़ी टक्कर अपने पिता से ही होती. चुपके-चुपके का मशहूर रोमांटिक गाना, ‘अब के सजन सावन में’, एसडी बर्मन ने 31 अक्टूबर 1975 को इस दुनिया को अलविदा कहने से कुछ समय पहले ही बनाया था. इसी तरह अभिमान का हिट गीत, ‘मीत ना मिला रे मन का’ बनाते वक़्त बर्मन साहब की उम्र 67 वर्ष थी. 1971 में जब आरडी बर्मन ‘रैना बीती जाए’ (अमर प्रेम) के साथ सफलता की सीढियां चढ़ रहे थे, तो इसी साल एसडी बर्मन ‘मेघा छाये आधी रात’ (शर्मीली) जैसे कालजयी गीत की रचना कर रहे थे. ये और ऐसे कई उदाहरण बताते हैं कि एसडी बर्मन एक ऐसे असाधारण संगीतकार थे जो अपने आखिरी वक्त तक न सिर्फ काम करते रहे बल्कि दिल से युवा भी रहे.

लेकिन यह एसडी बर्मन की असाधारणता का सिर्फ एक पक्ष है. दरअसल इस दिग्गज संगीतकार की झोली में संगीत के जितने रंग हैं उतने शायद ही किसी और के पास रहे हों. इसकी वजह यह है कि बर्मन दा की संगीत रचना का कोई पैटर्न नहीं था. कोई एसडी बर्मन मार्का संगीत नहीं था. कोई ख़ास पसंदीदा गायक या गायिका नहीं. सबको खुद में समेटने वाली विशाल और गहरी कला. बर्मन दा ने हर गायक को लेने के लिए हमेशा सही वक़्त का इंतज़ार किया. यह बात उन किशोर कुमार के लिए भी लागू होती है जिन्हें वे अपने दूसरे बेटे की तरह ही मानते थे. ये बर्मन दा ही थे जिनके कहने पर किशोर ने अपनी आवाज़ को पहचाना और केएल सहगल के प्रभाव से बाहर आये.

एसडी बर्मन की लम्बी संगीत गाथा की शुरुआत नवकेतन फिल्म्स के बैनर में बनी फिल्म बाज़ी से की जानी चाहिए. हालांकि इसके पहले भी वे सफल संगीत की रचना कर चुके थे, लेकिन बाज़ी (1951) में गीता दत्त का गाया हुआ, ‘तदबीर से बिगड़ी हुयी तक़दीर’ और ‘सुनो गज़र क्या कहे’ ने न सिर्फ एसडी बर्मन को ऊंचाइयां दीं बल्कि गीता दत्त को भी एक नयी और ‘मॉर्डन’ गायिका रूप में स्थापित किया. तीन साल पहले गीता दत्त ने बर्मन दा के साथ जब ‘मेरा सुंदर सपना टूट गया’ गाया था, तब भी वे अपनी पहचान वैसी न बना सकी थीं जिसके लिए उन्हें आज भी याद किया जाता है.

बर्मन दा के पास सबके लिए कुछ न कुछ था. 1951 में गीता दत्त के हिस्से बाजी आई तो लता मंगेशकर के हिस्से आया, ‘झन झन झन झन पायल बाजे’ (बुजदिल). खूब चर्चित हुआ यह गीत हिंदी फिल्म संगीत में बेहद कम सुने जाने वाले राग ‘नट बिहाग’ पर आधारित था. 1955 में उन्होंने किशोर कुमार से ‘जीवन के सफ़र में राही’ (मुनीम जी) गवाया तो इसी फिल्म में हेमंतकुमार और गीता दत्त से युगल गीत ‘दिल की उमंगें हैं जवां’ गवाया. इसी साल आई फिल्म देवदास में उन्होंने तलत महमूद से ‘मितवा लागी रे ये कैसी’ (देवदास) गवाया. बर्मन दा की संगीत गंगा से हर प्यासे की प्यास बुझ रही थी.

देवदास का संगीत ही था जिसने गुरु दत्त को एसडी बर्मन को अपनी फिल्म प्यासा (1957) में लेने के लिए प्रेरित किया जबकि उनकी पहली पसंद ओपी नैय्यर थे. और फिर प्यासा ने लोगों को एक ऐसा संगीत दिया जिसकी प्यास शायद ही कभी बुझे. ‘तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िन्दगी से हम’ और ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है’ के लिए मोहम्मद रफी थे तो ‘जाने वो कैसे लोग थे’ में एक असफल प्रेमी के दर्द को उजागर करने के लिए हेमंत कुमार. गीता दत्त की आवाज़ में ‘आज सजन मोहे अंग लगा लो’ के साथ बर्मन दा ने बंगाली कीर्तन का हिंदी फिल्म संगीत में अनूठा प्रयोग किया. इसी के साथ उन्होंने यह भी साबित किया एक गंभीर संगीत का शास्त्रीय होना अनिवार्य नहीं है.

एसडी बर्मन ने अपने संगीत से हमेशा ही फिल्मों को एक नई ऊंचाई दी. सुजाता (1959) में एक अछूत कन्या के सवर्ण परिवार में आने के बाद उसकी जिंदगी के उतार चढ़ाव के लिए बर्मन दा के पास ‘नन्ही कली सोने चली’ या ‘काली घटा छाये मोरा जिया तरसाए’ जैसे गीत थे. उधर, कागज़ के फूल (1960) की कल्पना ‘वक़्त ने किया क्या हंसी सितम’ और ‘देखी ज़माने की यारी’ जैसे गीतों के बिना हो ही नहीं सकती. एसडी बर्मन के लिए ‘डार्क म्यूजिक’ पसंदीदा क्षेत्र नहीं था, इसलिए प्यासा और कागज़ के फूल में अपनी श्रेष्ठता साबित करने के बाद उन्होंने ऐसे संगीत पर दुबारा काम नहीं किया.

एक बार बर्मन दा के दिए एक इंटरव्यू से नाराज़ होकर लता मंगेशकर ने उनसे दूरियां बढ़ा लीं. ये वही लता थीं जिनके लिए बर्मन दा ने एक बार कहा था कि ‘मुझे हारमोनियम और लता दो, मैं संगीत बना दूंगा’. लेकिन छह साल बाद जब ये दूरियां दूर हुईं और बंदिनी (1963) में यह जोड़ी दोबारा बनी तो फिर कमाल हो गया. ‘मोरा गोरा अंग लै ले’ और ‘जोगी जब से तू आया मेरे द्वार’ जैसे गीत हर जुबान पर छा गए. इसी फिल्म में बर्मन दा का खुद का गाया ‘मोरे साजन हैं उस पार’ भी था.

नवकेतन फिल्म्स की गाइड (1965) में काम करते हुए एक गाने के बाद ही एसडी बर्मन काफी गंभीर रूप से बीमार पड़े. इस बात से सबसे ज्यादा निराश देव आनंद थे, जो बाज़ी (1951) से अब तक बर्मन दा के साथ 12 फिल्मों में काम कर चुके थे. एसडी बर्मन ने देव आनंद को किसी और संगीतकार को लेने का सुझाव दिया, जिसमें उनके सहायक जयदेव भी थे. बर्मन दा को लग रहा था कि अब वे कभी ठीक नहीं होने वाले. किसी और संगीतकार को लेने की बजाय देव आनंद ने फिल्म को एक गाने के साथ ही रिलीज़ करने का फैसला किया.

शायद इस समर्पण और दोस्ती ने ही बर्मन दा को जल्द से जल्द ठीक होने की शक्ति दी, और वह जूनून भी जिससे गाइड के संगीत ने नवकेतन की पिछली सभी फिल्मों को भी पीछे छोड़ दिया. ‘क्या से क्या हो गया’, ‘दिल ढल जाए रात ना जाए’, ‘तेरे मेरे सपने’, ‘पिया तोसे नैना लागे रे’, ‘मोसे छल किये जाए’ और ‘गाता रहे मेरा दिल’ जैसे गीत बने जो आज तक संगीत प्रेमियों के पसंदीदा हैं. दरअसल गाइड के संगीत ने एसडी बर्मन को अतुलनीय साबित किया. अफ़सोस कि उस साल फिल्मफेयर पुरस्कारों की चयन मंडली ने शंकर-जयकिशन को फिल्म सूरज के लिए पहली पसंद माना.

अपनी पूरी शक्ति गाइड में लगाने के बाद बर्मन दा का संगीत छिटपुट हिट गानों के साथ तीन साल कुछ खामोश सा रहा. लेकिन ये ख़ामोशी ज्यादा दिन नहीं रहने वाली थी. जल्द ही ‘खायी है रे हमने कसम’ (तलाश, 1969), ‘दिल आज शायर’ (गैम्बलर, 1971), ‘मेघा छाये आधी रात’ (शर्मीली, 1971) के साथ बर्मन दा फिर खूंटा गाड़ चुके थे.

लेकिन नॉक आउट पंच तो अभी बाकी था. और वह आया अभिमान (1973) के साथ जब फिल्म के सभी सात गाने सुपर हिट हुए. ‘मीत ना मिला रे मन का’ से लेकर ‘पिया बिना पिया बिना’ तक इसमें संगीत के सभी रंग थे. इसके साथ ही उन्हें 20 साल बाद फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला. दरअसल ये अवार्ड सिर्फ बर्मन दा को ही नहीं मिला था बल्कि इससे फिल्मफेयर की आहत हुई प्रतिष्ठा पर भी कुछ मरहम लगा था.

1975 में फिल्म मिली के एक गाने की रिहर्सल चल रही थी. इसी दौरान एसडी बर्मन की तबीयत बिगड़नी शुरू हुई जिसके बाद वे कोमा में चले गए और फिर कभी होश में नहीं लौटे. यह गाना था - ‘बड़ी सूनी-सूनी है जिंदगी ये जिंदगी’. किशोर कुमार के गाए इस गीत में आज भी संगीत प्रेमी एक प्रियजन के बिछड़ने का दर्द महसूस कर सकते हैं.