दस साल पहले जस्टिस मार्कंडेय काटजू की जैसी छवि थी, कुछ वैसी ही मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस एन किरुबकरण की भी बनने लगी है. जस्टिस किरुबकरण के फैसले और बयान भी उतने ही चर्चित और विवादास्पद बन रहे हैं और सोशल मीडिया पर उनके नाम से बने पेज भी उतने ही लोकप्रिय हो रहे हैं
'बिहार के मतदाताओं को मेरी सलाह है कि वोट उसे दें जो बदले में चार बोतल वोदका दे'
'गांधी अंग्रेजों के एजेंट थे और सुभाष चंद्र बोस जापान के'
'असल में राष्ट्रपिता मुग़ल बादशाह अकबर को होना चाहिए'
'90 प्रतिशत भारतीय मूर्ख हैं'
जस्टिस मार्कंडेय काटजू अब अपने ऐसे ही बयानों के लिए चर्चित हैं. इसी का असर है कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश और भारतीय प्रेस परिषद् के अध्यक्ष रह चुके इस व्यक्ति को अब लाखों लोग 'सनकी', 'पागल', 'प्रचार का भूखा' और 'न्यायपालिका की राखी सावंत' जैसी संज्ञाएं तक दे चुके हैं.
लेकिन आज से लगभग दस साल पहले ऐसा नहीं था. उस दौर में जस्टिस काटजू आज जितने चर्चित तो नहीं थे लेकिन जितने भी लोग उन्हें जानते थे, उनके मुरीद हुआ करते थे. मशहूर कानूनविद फाली एस नरीमन ने तब शेक्सपियर के शब्दों में जस्टिस काटजू की प्रशंसा करते हुए लिखा था 'एक सच्चा न्यायकर्ता अब न्याय करने आया है. हां, एक सच्चा न्यायकर्ता. ऐ ज्ञानी न्यायाधीश, मैं किस तरह से तुम्हारा सत्कार करूं.’
दस साल पहले जस्टिस मार्कंडेय काटजू की जो छवि थी, वही अब जस्टिस एन किरुबकरण की भी बनने लगी है. उनके फैसले भी उतने ही साहसिक, चर्चित और विवादास्पद बन रहे हैं जितने जस्टिस काटजू के हुआ करते थे.
हालांकि न्यायाधीश रहते हुए भी जस्टिस मार्कंडेय काटजू विवादों से अछूते नहीं रहे. उस दौर में भी उनके कई बयान और टिप्पणियां विवादित हुई थीं. लेकिन तब उनके साहसिक और ऐतिहासिक फैसले ही ज्यादा चर्चित हुआ करते थे. दस साल पहले जस्टिस मार्कंडेय काटजू की जो छवि थी, कुछ वैसी ही छवि अब जस्टिस एन किरुबकरण की भी बनने लगी है. जस्टिस किरुबकरण के फैसले भी उतने ही साहसिक, चर्चित और विवादास्पद बन रहे हैं, उनकी टिप्पणियां जस्टिस काटजू की ही तरह देश भर में विवाद खड़ा कर रही हैं और सोशल मीडिया पर उनके नाम से बने पेज भी जस्टिस काटजू की तरह ही लोकप्रिय होने लगे हैं. दिलचस्प यह भी है कि जस्टिस किरुबकरण उसी मद्रास उच्च न्यायालय में न्यायाधीश हैं जहां ठीक दस साल पहले जस्टिस काटजू मुख्य न्यायाधीश हुआ करते थे.
जस्टिस किरुबकरण का सबसे नया और विवादित फैसला बीते 26 अक्टूबर को आया है. इस फैसले में उन्होंने केंद्र सरकार को सुझाव दिया था कि बच्चों का यौन शोषण या बलात्कार करने वाले अपराधियों को नपुंसक बना दिया जाना चाहिए. जस्टिस किरुबकरण ने इस फैसले में लिखा है, 'बलात्कारियों को नपुंसक बनाने के इस सुझाव को कई लोग बर्बर, मध्ययुगीन और अमानवीय भी कहेंगे. लेकिन बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम (पोक्सो) जैसे कड़े कानून होने के बावजूद बच्चों के खिलाफ अपराध लगातार बढ़ रह हैं. साल 2012 और 2014 के बीच ऐसे अपराधों की संख्या 38,172 से बढ़कर 89,423 तक पहुंच गई है. ऐसे में न्यायालय मूकदर्शक बनकर नहीं बैठ सकता. हमारा मानना है कि बच्चों के बलात्कारियों को बधिया करने से जादुई नतीजे देखने को मिलेंगे. रूस, पोलैंड और अमेरिका के नौ राज्यों में ऐसे अपराधियों को बधिया करने का प्रावधान पहले से मौजूद है.'
जस्टिस किरुबकरण के इस फैसले में जस्टिस काटजू के उन तमाम फैसलों की झलक भी मिलती है जिनमें उन्होंने कभी ऑनर किलिंग तो कभी फर्जी एनकाउंटर के दोषियों को फांसी देने के निर्देश जारी किये थे. जस्टिस किरुबकरण के इस निर्देश को उतना ही बर्बर भी माना जा सकता है जितनी जस्टिस काटजू की वह टिप्पणी थी कि 'भ्रष्टाचारियों को सार्वजनिक रूप से बिजली के खंभों पर फांसी दी जानी चाहिए.'
जस्टिस किरुबकरण का सबसे नया और विवादित फैसला बीती 16 अक्टूबर को आया है. इस फैसले में उन्होंने केंद्र सरकार को सुझाव दिया था कि बच्चों का यौन शोषण या बलात्कार करने वाले अपराधियों को नपुंसक बना दिया जाना चाहिए
2009 में न्यायाधीश नियुक्त होने के बाद से ही जस्टिस किरुबकरण ने दर्जनों चर्चित फैसले दिए हैं. उनके फैसलों की एक विशेषता यह भी है कि उनमें अक्सर सरकार के लिए कई सुझाव या निर्देश होते हैं. कुछ समय पहले ही केंद्र सरकार को जारी किये गए उनके निर्देश देश भर में चर्चा का विषय बने थे. इन निर्देशों में उन्होंने फर्जी और आपराधिक प्रवृति के वकीलों पर नकेल कसने के साथ ही वकालत के तीन वर्षीय पाठ्यक्रम को पूरी तरह समाप्त करने के बात कही थी. इस फैसले का कई लोगों ने स्वागत किया तो कई लोग इसका विरोध करते भी नज़र आए.
जिस तरह जस्टिस मार्कंडेय काटजू के सुझावों से लाखों लोग सहमत होते हैं और लाखों असहमत, वही स्थिति जस्टिस किरुबकरण के सुझावों की भी है. बीते साल के अंत में उनकी अदालत में नपुंसकता के आधार पर तलाक मांगने का एक मामला आया था. इस पर फैसला देते हुए जस्टिस किरुबकरण ने केंद्र तथा राज्य सरकार को निर्देश जारी कर दिए कि शादी से पहले दोनों पक्षों की चिकित्सकीय जांच अनिवार्य कर दी जाए. उनका मानना था कि ऐसा होने से न सिर्फ किसी की नपुंसकता का पहले ही पता चल जाएगा बल्कि गुप्त रोगों के संक्रमण को भी रोका जा सकेगा और अदालतों का समय भी बचेगा. उनके इस फैसले का कुछ लोगों ने स्वागत किया तो कुछ ने इसका जमकर विरोध भी किया. सर्वोच्च न्यायालय की अधिवक्ता कामिनी जयसवाल ने इस फैसले को लोगों की निजी जिंदगी में हस्तक्षेप मानते हुए कहा था कि ऐसे तो आने वाले समय में मर्द भी शादी से पहले लड़की का कौमार्य जांचने की मांग करने लगेंगे.
जस्टिस किरुबकरण के फैसले समय-समय पर सरकारों के लिए सरदर्द भी बनते रहे हैं. उनके फैसले का ही असर था कि तमिलनाडु सरकार को दुपहिया वाहनों के लिए हेलमेट अनिवार्य करना पड़ा. उनके आदेश के बाद मात्र 12 दिनों में प्रदेश भर के डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों को हेलमेट न पहनने पर चालान भुगतना पड़ा था. इस फैसले में भी उन्होंने केंद्र सरकार को सुझाव दिया था कि वह दुपहिया वाहन बनाने वाली सभी कंपनियों को निर्देशित करे कि हर वाहन के साथ दो हेलमेट और हेलमेट लॉक भी अनिवार्य रूप से दिए जाएं.
जस्टिस किरुबकरण ने पिछली साल दिसंबर में केंद्र तथा राज्य सरकार से यह सवाल पूछा था कि 'जब संविधान शराब पर प्रतिबंध की बात करता है तो सरकार खुद ही कैसे इसका व्यापार कर सकती है?'
जस्टिस किरुबकरण ने सरकार के लिए असल मुश्किलें तब खड़ी कर दी थी जब पिछली साल दिसंबर में उन्होंने केंद्र तथा राज्य सरकार से 16 सवालों का जवाब मांगा था. इन सवालों में प्रमुख था 'जब संविधान शराब पर प्रतिबंध की बात करता है तो सरकार कैसे खुद ही शराब का व्यापार कर सकती है?' इसके साथ ही उन्होंने शराब पीकर गाडी चलाने को एक गैर-जमानती अपराध बनाने की भी सलाह दी थी. उनका यह भी कहना था कि चिकित्सकीय कार्यों के अलावा शराब को पूरी तरह से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए. सरकार को ऐसी ही आफत में उन्होंने तब भी डाल दिया था जब साइबर अपराधों की बढती संख्या के आंकड़े उन्होंने मांग लिए थे और सरकार की नाकामी पर जमकर फटकार भी लगाई थी.
जस्टिस काटजू की ही तरह जस्टिस किरूबकरण के सिर्फ फैसले ही नहीं बल्कि बयान भी कई बार विवादित हुए हैं. जिस तरह से 90 प्रतिशत भारतीयों को मूर्ख कहने पर जस्टिस काटजू को कुछ लोगों ने कानूनी नोटिस तक भेज दिया था लगभग वैसा ही जस्टिस किरुबकरण के साथ भी हुआ है. एक फ़ास्ट ट्रैक महिला कोर्ट के उद्घाटन के लिए पहुंचे जस्टिस किरुबकरण ने पत्रकारों से बात करते हुए बयान दिया था कि निर्भया मामले की पीड़ित लड़की गलत समय पर घर से बाहर निकली थी और क्यों महिलाएं ऐसा करके अपने लिए मुसीबतों को आमंत्रित करती हैं. उनके इस बयान की सारे देश में निंदा हुई और मशहूर अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र लिखकर इस घटना का संज्ञान लेने की मांग की थी.
तमाम समानताओं से इतर जस्टिस काटजू और जस्टिस किरुबकरण में एक असमानता भी है. जहां जस्टिस किरुबकरण गांधी को आदर्श मानते हुए पूरे देश में शराब प्रतिबंधित करने की बात कहते हैं, वहीं जस्टिस काटजू गांधी को अंग्रेजों का एजेंट घोषित करते हैं और खुलेआम स्वीकार करते हैं कि 'मैं शराब पीता हूं. मैं ब्राह्मण परिवार से हूं और मेरे पूर्वज भी सोमरस पिया करते थे.'