हरियाणा का यह उदाहरण बताता है कि कैसे एक बुराई रोकने के लिए बनी योजना दूसरी बुराई को बढ़ा सकती है
इस जनवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरियाणा के पानीपत से ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान की शुरुआत की थी. अभियान के लिए इस राज्य का चुनाव काफी सोच समझकर किया गया था. हरियाणा स्त्री-पुरुष अनुपात के लिहाज से देश में सबसे नीचे आता है. 2011 की जनसंख्या के आंकड़े बताते हैं कि यहां प्रति हजार पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या 879 है. इस सामाजिक असंतुलन का ही नतीजा है कि हरियाणा में कई जगहों पर लोगों को शादी के लाले पड़ गए हैं. उन्हें लड़कियां नहीं मिलतीं.  जाहिर है 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' की शुरुआत हरियाणा से करने के पीछे एक संदेश देने का मकसद था.
लेकिन इसी हरियाणा का एक उदाहरण बताता है कि प्रधानमंत्री की यह पहल यहां बुरी तरह असफल हो सकती है. इसी उदाहरण से यह भी पता चलता है कि कैसे हमारे समाज में एक अच्छी-अच्छी से योजना का इस्तेमाल किसी दूसरी सामाजिक बुराई को बढ़ाने में किया जा सकता है.
ज्यादातर लड़कियों की मां सरकारी योजना को कन्यादान योजना बताती हैं और उनके हिसाब से सरकार नकद राशि देकर शादी में मदद करना चाहती है
यहां हम हरियाणा की ‘अपनी बेटी, अपना धन’ योजना की बात कर रहे हैं. राज्य में 1994 से 1998 के बीच लागू की गई इस योजना के तहत उस समयावधि में जन्म लेने वाली हर लड़की को सरकार की तरफ से 25,000 रुपये दिए जाने का प्रावधान था. यह कंडीशनल कैश ट्रांशफर स्कीम थी जहां शर्त थी कि लड़की को ये पैसे तभी मिलेंगे जब उसकी शादी 18 साल की उम्र के पहले न हो. जन्म के 15 दिन के भीतर ही लड़की की मां को सरकार की तरफ 500 रुपये दिए जाते थे और बाकी पैसा लड़की के 18 साल के होने पर मिलने का नियम था.
लेकिन अब एक अध्ययन से यह बात सामने आई है कि इस योजना में खर्च हुआ ज्यादातर पैसा दहेज में जा रहा है. यह अध्ययन अमेरिका की एक गैर सरकारी संस्था इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन वूमेन (आईसीआरडब्ल्यू) ने किया है. अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि योजना के तहत जो नकद राशि लड़की को मिलनी होती है, वह उसकी शादी के समय ससुराल पक्ष को दी जा रही है.
यह अध्ययन 13,000 महिलाओं के सर्वे पर आधारित है. इसमें वे लड़कियां और उनकी मांएं शामिल हैं जिन्हें इस योजना का लाभ मिला है. सर्वे में वे लड़कियां और उनकी मांएं भी शामिल हैं जो इसके दायरे में नहीं आ पाईं. सर्वे में शामिल सभी महिलाएं निचली आय और सामाजिक दर्जे के परिवारों से आती हैं.
शादी कर चुकी लड़कियों में से तीन चौथाई लड़कियों को मिला पैसा उनकी शादी पर ही खर्च हुआ है. जिन्हें अभी पैसा नहीं मिला उनमें से 53 प्रतिशत इसे शादी पर ही करने का इरादा जाहिर करती हैं
इस योजना के दो मकसद थे – बाल विवाह को रोकना और लड़कियों की कम से कम स्कूली पढ़ाई पूरी करवाना. हालांकि सर्वे से यह बात तो स्पष्ट हुई है कि 18 साल की उम्र के पहले कम ही लड़कियों की शादी हो रही है. लेकिन जिन लड़कियों को योजना का फायदा मिला उसके बारे में यह रिपोर्ट कहती है, ‘योजना से लड़कियों की शादी 18 साल में करने को प्रोत्साहन तो मिला होगा, लेकिन जो मां-बाप जल्दी से जल्दी अपनी बेटियों की शादी करना चाहते थे उन्होंने नकद राशि मिलने के तुरंत बाद ही बेटी की शादी कर दी.’
रिपोर्ट के मुताबिक शादी कर चुकी लड़कियों में से तीन चौथाई लड़कियों को मिला पैसा उनकी शादी पर ही खर्च हुआ है. जिन्हें अभी पैसा नहीं मिला उनमें से 53 प्रतिशत इसे शादी पर ही करने का इरादा जाहिर करती हैं. सिर्फ 28 प्रतिशत लड़कियां ऐसी हैं जो अपनी शिक्षा के लिए इस पैसे का इस्तेमाल करना चाहती हैं.
सरकारी योजनाओं के प्रति जागरूकता का अभाव किस तरह उन्हें भटका देता है इसका एक उदाहरण इस रिपोर्ट में मिलता है. रिपोर्ट बताती है कि ज्यादातर लड़कियों की माएं इस योजना को कन्यादान योजना बताती हैं और उनके हिसाब से सरकार नकद राशि देकर शादी में मदद कर रही है.
इस अध्ययन से जुड़ीं प्रिया नंदा कहती हैं, ‘समाज में लड़कियों और उनकी शादी के प्रति गहराई से जड़ें जमा चुके भेदभाव को खत्म करने के लिए सिर्फ नकद हस्तांतरण जैसी योजनाएं कारगर नहीं हैं.’ इस तरह की योजनाओं को सफल बनाने का सुझाव देते हुए वे अपनी बात आगे बढ़ाती हैं, ‘इसके लिए जरूरी है कि हर स्तर पर योजनाएं बनें और लंबे समय तक उन्हें चलाया जाए ताकि लड़कियों के प्रति रवैए में बदलाव आ सके.’