आर्थिक नाकेबंदी से जूझते नेपाल में घरेलू गैस की भारी किल्लत हो गई है. इसके चलते वहां की एक बड़ी आबादी खाना बनाने के लिए फिर लकड़ियों का इस्तेमाल कर रही है. इसका जितना नुकसान नेपाल को हो सकता है उससे ज्यादा भारत को.
नेपाल में 20 सितंबर से नया संविधान लागू होने के बाद से उथल-पुथल मची है. उसका आरोप  है कि भारत ने अनाधिकारिक रूप से उसकी आर्थिक नाकेबंदी कर रखी है. नेपाल सामान ले जाने वाले सैकड़ों ट्रक सीमा पर खड़े हैं. इसके चलते वहां तेल और गैस सहित कई जरूरी चीजों की किल्लत हो गई है.
नई दिल्ली को उम्मीद रही होगी कि नाकेबंदी की यह रणनीति काम करेगी. भारत के साथ लगते तराई के इलाके में रहने वाले मधेशी समुदाय को नए संविधान में और ज्यादा अधिकार मिलेंगे जिसकी वे मांग कर रहे हैं. लेकिन हो उल्टा रहा है. ऐसा लगता है कि भारत ने कई मायनों में अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने वाला काम किया है. आर्थिक नाकेबंदी की वजह से न सिर्फ नेपाल अब चीन की तरफ झुक रहा है बल्कि इससे भारत के लिए एक और खतरा भी पैदा हो रहा है. यह है बिहार में आगे और भी भयानक बाढ़ का खतरा.
नेपाल में हिमालय की पहाड़ियों में जंगल कटते जा रहे हैं. जब से नेपाल में आर्थिक नाकेबंदी के चलते ईंधन की किल्लत हो रही है तब से वनों की यह कटाई बढ़ी ही है.
नेपाल पहाड़ी देश है. जब भी यहां बारिश होती है तो वह पानी उन नदियों में जाता है जो कुछ समय तक नेपाल में पहने के बाद भारत के मैदानों में दाखिल होती हैं. हर साल जून से सितंबर के बीच नेपाल से आने वाली नदियों का पानी भारत में तबाही मचाता है. कोसी का उदाहरण सभी जानते ही हैं जिसे बिहार का शोक कहा जाता है. भारत में बाढ़ से हर साल जितना नुकसान होता है उसमें करीब आधी हिस्सेदारी बिहार की है.
जब भी बिहार में बाढ़ आती है तो भारत में राजनेता अक्सर नेपाल को दोष देने लगते हैं. लेकिन सच यह है कि नेपाल इसमें कुछ नहीं कर सकता. उसके पास इतनी जलाशय क्षमता ही नहीं है कि वह बरसात के दौरान उफनती नदियों का पानी संभाल सके.
बिहार में बाढ़ कई कारणों से आती है. इनमें से एक अहम कारण यह भी है कि नेपाल में हिमालय की पहाड़ियों में जंगल कटते जा रहे हैं. जब से नेपाल में आर्थिक नाकेबंदी के चलते ईंधन की किल्लत हो रही है तब से वनों की यह कटाई में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है. यह सभी जानते हैं कि जंगलों के कटने का मतलब है बाढ़ की विभीषिका का बढ़ना
नेपाल का ज्यादातर आयात भारत से होता है. तेल और गैस के मामले में तो यह पूरी तरह से भारत पर निर्भर है. लंबे समय से जारी आर्थिक नाकेबंदी के चलते वहां गैस की भारी किल्लत हो गई है. यही वजह है कि नेपाल की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अब ईंधन के लिए लकड़ी का इस्तेमाल कर रहा है. नेपाल में वन प्रबंधन के काम में लगे लोगों से बात करने पर भी यह पता चलता है. उन सबकी यह साझा शिकायत है कि आर्थिक नाकेबंदी के चलते वहां जंगलों की कटाई तेजी से बढ़ी है.
ईंधन की किल्लत के बाद से ज्यादातर एयरलाइनों ने अब काठमांडू जाने वाली उड़ाने रद्द कर दी हैं. जो फ्लाइट वहां जा भी रही हैं उन्होंने अपना रूट बदल लिया है.
ईंधन की किल्लत के बाद से ज्यादातर एयरलाइनों ने अब काठमांडू जाने वाली उड़ाने रद्द कर दी हैं. जो फ्लाइट वहां जा भी रही हैं उन्होंने अपना रूट बदल लिया है. अब वे पहले भारत में उतरती हैं और यहां ईंधन भरवाती हैं.  काठमांडू में सड़कें अब लगभग कारों से खाली हैं और टैक्सी आपको तभी मिलेगी अगर आप किस्मत वाले हुए, वह भी चार गुना ज्यादा रेट पर.
मुझे नेपाल में घूमते हुए एक हफ्ते से ज्यादा का वक्त हो चला है. मुझे साफ महसूस हो रहा है कि यह वह नेपाल नहीं है जो मैंने दो साल पहले देखा था. हालांकि इसकी वजह इस साल अप्रैल में आया भयावह भूकंप भी है, लेकिन ऐसा लगता है कि उससे ज्यादा नुकसान भारत की आर्थिक नाकेबंदी ने कर दिया है.
नेपाल में सिलेंडर लेने के लिए मीलों लंबी गैस लाइन अब आम बात है. मेरा ठहरना उस लामजुंग में भी हुआ जो अप्रैल में आए भूकंप का केंद्र था. मेरे होटल में भी गैस नहीं थी और दो दिन तक मैंने लकड़ी के चूल्हे पर पका हुआ दाल चावल खाया. नेपाल में ज्यादातर आबादी का यही हाल है. लेकिन साफ है कि भारत के लिए भी यह कोई शुभ संकेत नहीं है.