सामाजिक कार्यकर्ता इसे भेदभाव को बढ़ावा देने वाला कदम बताते हैं तो वेबसाइट का कहना है कि जाति-धर्म जैसी जानकारियों से क्लाइंट ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं.
पिछले दिनों अखबारों में एक वेबसाइट का विज्ञापन प्रकाशित हुआ था. घरों में काम वाली बाई या ‘मेड’ उपलब्ध कराने वाली इस वेबसाइट का नाम है बुकमाईबाईडॉटकॉम और इसके विज्ञापन की पंचलाइन थी – डायमंड्स आर यूजलैस, गिफ्ट योर वाईफ, मेड (हीरे बेकार होते हैं, अपनी पत्नी को तोहफे के रूप में एक मेड दें).
महिला मुद्दों को लेकर अति संवेदनशील रहने वाले सोशल मीडिया पर इस विज्ञापन ने तुरंत ही सुर्खियां बटोर लीं. कुछ लोगों के हिसाब से यह महिला विरोधी विज्ञापन था क्योंकि इसमें उनकी ऐसी रुढ़िवादी छवि दिखाई गई थी जिसके हिसाब से वे सिर्फ घरेलू काम के लायक हैं. हालांकि कंपनी ने तुरंत इसका खंडन कर दिया. बुकमाईबाईडॉटकॉम के सहसंस्थापक अनुपम सिंघल का कहना था कि इस विज्ञापन में काफी हल्के-फुल्के और मनोरंजक ढंग से बात कही गई थी और महिलाओं की रुढ़िवादी छवि पेश करने का उनका कोई इरादा नहीं था. उन्होंने साथ में यह भी कहा, ‘यह पूरी तरह से विज्ञापन देख रहे व्यक्ति की समझ पर निर्भर है लेकिन हम ऐसा करने का सोच भी नहीं सकते क्योंकि महिलाओं की वजह से ही हमारा अस्तित्व है. घरों में काम करने वाले लोगों में 99 फीसदी महिलाएं ही हैं.’
क्लाइंट चाहे तो यह भी सर्च कर सकता है कि उसे मुंबई में ‘बुद्धिस्ट मराठी नॉन वेज कुक’ चाहिए. या फिर सूरत में ‘हिंदू भोजपुरी स्पीकिंग पार्ट टाइम गुजराती नॉनवेज फीमेल कुक’
बुकमाइबाईडॉटकॉम का दावा है कि पुणे और मुंबई में 10 हजार से ज्यादा कामगार महिलाएं उससे जुड़ी हैं. ये महिलाएं खाना बनाने और साफ-सफाई से लेकर बच्चों व बुजुर्गों की देखभाल तक कर सकती हैं. इस वेबसाइट के माध्यम से मेड ढूंढ़ने वालों को एक निश्चित फीस चुकानी होती है.
इस वेबसाइट के विज्ञापन को लेकर जो हंगामा सोशल मीडिया में मचा वह तो अलग बात है लेकिन इससे जुड़ी एक बात और है जो लोगों का ध्यान खींचती है. ये है कामगार महिलाओं का प्रोफाइल. इसके जरिए क्लाइंट अपनी जरूरत के हिसाब से मेड ढूंढ़ सकते हैं.
इन प्रोफाइल में महिलाओं के काम का अनुभव तो दर्ज है ही साथ में उनका धर्म, भाषा और जन्मस्थान की भी जानकारी है. उदाहरण के लिए वेबसाइट के एक तयशुदा फॉर्मेट में क्लाइंट चाहे तो यह भी सर्च कर सकता है कि उसे मुंबई में ‘बुद्धिस्ट मराठी नॉन वेज कुक’ चाहिए. या फिर सूरत में ‘हिंदू भोजपुरी स्पीकिंग पार्ट टाइम गुजराती नॉनवेज फीमेल कुक’.
धर्म और जाति के आधार पर भेद अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के नियमों का भी उल्लंघन है हालांकि भारत अब तक इन्हें स्वीकार नहीं करता
इस वेबसाइट पर महिला कामगारों को खोजने के कुछ मानक जैसे जातीयता या धर्म, काम के लिहाज से बिलकुल गैरजरूरी हैं लेकिन ये दिखाते हैं कि हमारे यहां आम लोग इसको लेकर कितने संवेदनशील हैं. विश्लेषकों का मानना है कि यह ट्रेंड भारत जैसे देश के लिए चिंताजनक है. ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वूमैंस एसोसिएशन की सचिव कविता कृष्णन कहती हैं, ‘हमने पहले भी देखा है कि मुसलमान महिलाओं को हिंदू बहुल क्षेत्रों में काम करने के लिए अपना नाम और पहचान बदलनी पड़ती है और अब इस तरह की पृष्ठभूमि वाले विज्ञापन इन प्रवृत्तियों को और बढ़ावा ही देंगे.’
यदि वेबसाइट महिला कामगारों का प्रोफाइल इस तरह से देखने की सुविधा देती है तो इसे पूरी तरह से उसकी गलती भी नहीं कहा जा सकता. यह बस इस बात का प्रतीक है कि भारतीय समाज में हम अभी तक सामाजिक पूर्वग्रहों से छुटकारा नहीं पा पाए हैं. लेकिन कृष्णन के मुताबिक यदि बुकमाइडॉटकॉम जैसी कंपनियां इस तरह की प्रवृत्तियों को वैधता देने लगेंगी तो समाज में इनकी जड़ें और गहरी हो जाएंगी. वे कहती हैं, ‘हर कोई इसके लिए तो स्वतंत्र है कि वह अपनी जीवनशैली के हिसाब से मेड का चुनाव करे. यानी यदि वे नॉनवेज खाना चाहते हैं तो उसके हिसाब से मेड ढूढ़ सकते हैं लेकिन यह ठीक नहीं है कि मेड के चुनाव में किसी जिले या धर्म की भूमिका हो.’
कृष्णन वेबसाइट की इस नीति को गलत बताते हुए यह भी कहती हैं, ‘कंपनी यह कहकर इस जिम्मेदारी से नहीं बच सकती कि वह क्लाइंट की प्राथमिकताओं को तवज्जो दे रही है. यहां सिर्फ वह डेटा होना चाहिए जो काम के लिए जरूरी है. धर्म और जाति के आधार पर भेद अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के नियमों का भी उल्लंघन है हालांकि भारत अब तक इन्हें स्वीकार नहीं करता.’
‘चूंकि घरेलू कामगारों से जुड़ी आपराधिक गतिविधियां बढ़ रही हैं इसलिए हम कोशिश करते हैं कि जितनी ज्यादा से ज्यादा जानकारी हमारे पास हो हम वह लोगों को उपलब्ध करवा दें.’
हालांकि कंपनी इन सब दावों का खारिज करते हुए कहती है कि यह जानकारी सिर्फ ‘सुरक्षा कारणों’ से दर्ज की गई है. ‘चूंकि घरेलू कामगारों से जुड़ी आपराधिक गतिविधियां बढ़ रही हैं इसलिए हम कोशिश करते हैं कि जितनी ज्यादा से ज्यादा जानकारी हमारे पास हो हम वो लोगों को उपलब्ध करवा दें.’ सिंघल कहते हैं, ‘इसके साथ हम यह भी कहना चाहते हैं कि किसी व्यक्ति की जाति, धर्म या रंग के आधार पर न हमने न पहले भेद किया है और न करेंगे. हम क्लाइंट को उनकी पसंद के बारे में जानकारी देते हैं और हमेशा इसपर जोर देते हैं कि वह संबंधित व्यक्ति से जुड़े गैरजरूरी तथ्यों जैसे धर्म आदि के आधार पर भेदभाव न करे.’
सिंघल बेशक अपनी तरफ से तर्क देकर कंपनी का बचाव कर सकते हैं लेकिन इस तरह की जानकारी के आधार पर सेवाएं उपलब्ध करवाने वाली यह अकेली वेबसाइट नहीं है. मेडसर्विसडॉटइन भी अपने ग्राहकों को यह सुविधा देती है कि यहा भी आप मेड का चयन धर्म के आधार पर कर सकते हैं. इन तर्कों की आड़ यह वेबसाइट भी ले सकती है लेकिन आखिरी बात यही है कि इस तरह की कंपनियों को यह करने में कोई गुरेज नहीं है.
(यह स्क्रोलडॉटइन पर प्रकाशित आलेख का संपादित स्वरूप है)