एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मां बन चुकी एक 13 वर्ष की बलात्कार पीड़िता और उसके बच्चे की पूरी जिम्मेदारी सरकार को दी है
दिल्ली में उबर कैब बलात्कार कांड में स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट ने ग्यारह महीने में ही सुनवाई पूरी करके दोषी को उमर कैद का फैसला सुनाया है. अदालत ने माना है कि दोषी ने यह अपराध सिर्फ पीड़िता के नहीं बल्कि पूरे समाज के खिलाफ किया है. महिलाओं के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों के मामले में यह फैसला बहुत महत्वपूर्ण है.
लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण फैसला हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने दिया है. इसमें मां बन चुकी एक 13 वर्ष की बलात्कार पीड़िता की शिक्षा की पूरी जिम्मेदारी सरकार को दी गई है. इतना ही नहीं, बालिका को परिवार सहित पहचान छिपाकर कहीं भी रहने का अधिकार दिया गया है. कोर्ट ने नवजात शिशु की पूरी जिम्मेदारी भी सरकार को दी है और नाबालिग होते हुए भी पीड़ित बच्ची को इस बात का अधिकार दिया गया है कि वो नवजात को गोद दे सके.
इस परिवार को एक ओर तो अपनी बेटी के साथ हुए अपराध की यंत्रणा से जूझना पड़ रहा है, दूसरी ओर उस बेटी के मां बन जाने के कारण उसके सामने एक और भयावह स्थिति आ गई है.
इस मामले में 13 वर्षीय बच्ची से बलात्कार करने वाला तो अदालती कार्रवाई का सामना कर रहा है. लेकिन गर्भवती होने और फिर मां बन जाने के कारण उस पीड़ित बच्ची को अब भी तरह-तरह की प्रताड़नाएं झेलनी पड़ रही हैं. उसकी जिंदगी मे एक भयानक भूचाल चल रहा है. कमोबेश यही हाल उसके परिवार का भी है.
बाराबंकी के एक गांव की इस 13 साल की बच्ची के साथ गांव के ही एक नाबालिग युवक ने फरवरी में बलात्कार किया था. उसने बच्ची को धमकी भी दी थी कि अगर किसी को इसके बारे में बताया तो वह उसके पूरे परिवार को खत्म कर देगा. डरी सहमी बच्ची अपने साथ हुए जघन्य अपराध पर घुट कर रह गई. मगर जुलाई में जब उसकी तबियत बिगड़ने लगी तो उसे अस्पताल ले जाया गया. वहां हुई जांच में उसके गर्भवती होने का पता लगा. परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. पिता ने किसी तरह हिम्मत करके पुलिस में शिकायत की और फिर बाराबंकी मजिस्ट्रेट से गर्भपात ही इजाजत मांगी. कोर्ट ने उन्हें अस्पताल भेज दिया लेकिन अस्पताल ने गर्भपात से इनकार किया और उन्हें फिर से कोर्ट जाने को ही कह दिया.
एक ओर बेटी की जान पर बन रही थी, दूसरी ओर गरीब पिता न्याय के लिए भटक रहा था. गांव-समाज में उसकी स्थिति उपहास का विषय बन रही थी. समाज के ताने, बेटी का भविष्य और खुद उसके जीवन पर खतरा देखते हुए उसने एक बड़ा फैसला लिया. यह फैसला था बड़ी अदालत में जाने का. एक कम पढ़े लिखे ग्रामीण पृष्ठभूमि के व्यक्ति के लिए समाज, व्यवस्था और रूढि़यों के खिलाफ जाते हुए बड़ी अदालत में दस्तक देना आसान काम नहीं था.
अपने आदेश में अदालत ने कहा है कि पीड़ित बच्ची के नाम दस लाख रुपये सरकारी बैंक में जमा करवाए जाएं जो वह 21 साल की होने पर निकाल सकेगी.
लेकिन बच्ची के पिता ने यह साहस भरा कदम उठाया. उसने हाईकोर्ट में गुहार लगाई कि बेटी के गर्भपात की इजाजत दी जाए. इस पर कोर्ट ने बच्ची की मेडिकल जांच का आदेश दिया. जांच टीम ने सात महीने के भ्रूण का गर्भपात करने से इनकार कर दिया. इस बीच बच्ची का स्वास्थ्य लगातार बिगड़ रहा था. उसका वजन 30 किलो से भी कम रह गया था. अदालती निर्देश पर 26 अक्टूबर को बच्ची का आपरेशन किया गया और उसने एक बेटी को जन्म दिया. उसकी हालत अभी भी पूरी तरह से ठीक नहीं है.
इसके बाद भी उसके पिता ने अपनी लड़ाई नहीं छोड़ी. वे एक बार फिर हाईकोर्ट पहुंचे और वहां अपनी बेटी और उसकी संतान के मानवीय अधिकारों की बात रखी. उन्होंने कहा कि इस बच्ची की सुरक्षा और सम्मान को सुनिश्चित करना अब सरकार की जिम्मेदारी है. अदालत ने इस याचिका पर महत्वपूर्ण फैसला देते हुए पीड़ित बच्ची के अधिकारों की पूरी जिम्मेदारी सरकार को सौंपी है. अपने आदेश में अदालत ने कहा है कि पीड़ित बच्ची के नाम दस लाख रुपये सरकारी बैंक में जमा करवाए जाएं जो वह 21 साल की होने पर निकाल सकेगी. उसकी ग्रेजुएशन तक की शिक्षा की व्यवस्था भी सरकार को मुफ्त करनी होगी. साथ ही बालिग होने पर उसे योग्यतानुसार वरीयता के आधार पर सरकारी नौकरी दी जाएगी और पीड़िता के परिवार की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी सरकार की होगी.
अदालत ने नवजात को भी पीड़ित (सेकेंड विक्टिम) मानते हुए कहा है कि चूंकि पीड़िता नवजात बच्ची को अपने साथ नहीं रखना चाहती इसलिए गोद दिए जाने योग्य होने पर उसे चाइल्ड वेलफेयर कमेटी को सौंप दिया जाए. अदालत ने यह भी निर्देश दिया है कि जहां भी वह बच्ची पढेगी वहां के प्रधानाचार्य की यह जिम्मेदारी होगी कि उसकी पृष्ठभूमि के बारे में किसी को कोई जानकारी न दी जाए. बच्चे की गोद प्रक्रिया पर निगरानी के लिए अदालत ने हाईकोर्ट के एक वरिष्ठ वकील को नियुक्त किया है.
अदालत ने यह भी निर्देश दिया है कि जहां भी वह बच्ची पढेगी वहां के प्रधानाचार्य की यह जिम्मेदारी होगी कि उसकी पृष्ठभूमि के बारे में किसी को कोई जानकारी न दी जाए.
इस मामले में जहां पीड़ित के पिता ने तमाम खतरों, उलाहनों, अपमान और आर्थिक संकटों से जूझते हुए लड़ाई जारी रखी वहीं हाईकोर्ट के फैसले में भी इस तरह की समस्या के बारे में एक महत्वपूर्ण सलाह आई है. अदालत ने कहा है कि कई कड़े फैसले देने और बिटिया (निर्भया) मामले के बाद हुए क्रिमिनल ला अमेडमेंट 2013 के बावजूद बच्चियों और महिलाओं के खिलाफ यौन अपराध कम होने की जगह बढ़ रहे हैं. ऐसे में जरूरी हो गया है कि पीडि़तों के पुर्नवास के लिए बेहतर योजनाएं बनाई जाएं. केवल मुआवजे से काम नहीं चलेगा.
जानकार इस फैसले को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं. लेकिन उनका यह भी कहना है कि कानून से भले ही उस पीड़ित बच्ची को राहत मिल गई है मगर आने वाला समय उसके लिए बेहद मानसिक और शारीरिक कष्टों से भरा होगा. वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ नीलम सिंह कहती हैं, 'इसलिए उसे समाज की ओर से मलहम की भी बहुत जरूरत है.' बच्ची के पिता का कहना है, 'हमारी लड़ाई अभी पूरी नहीं हुई है. वह लड़ाई तो जुल्मी को सजा दिलाने के बाद ही पूरी होगी. मुझे अब भी धमकियां मिल रही हैं.’
इस ऐतिहासिक फैसले में न्यायालय ने जो पहल की है उससे सरकार की जिम्मेदारियां भी बढ़ गई हैं. इन निर्देशों का अनुपालन सरकार को ही करना है और पीड़ित बच्ची के साथ न्याय तभी होगा जब सरकार पूरी ईमानदारी से ऐसा करे.