मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते रघुबर दास
मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते रघुबर दास
भाजपा चाहती है कि बाबूलाल मरांडी उसमें शामिल हो जाएं. मरांडी पशोपेश में हैं. उनकी यही उलझन झारखंड में मंत्रिमंडल विस्तार के रास्ते की सबसे बड़ी उलझनों में से एक है.
झारखंड मंत्रिमंडल के गठन को एक माह से ज्यादा हो गया, लेकिन अभी तक उसका विस्तार नहीं हो पाया है. इसके चलते राज्य को मुख्यमंत्री रघुबर दास के अलावा सिर्फ चार मंत्रियों से ही काम चलाना पड़ रहा है. जबकि राज्य मंत्रिमंडल में मुख्यमंत्री सहित 12 सदस्य हो सकते हैं. इसमें कई पेंच हैं. एक मुख्य पेंच है झारखंड में खंड-खंड में बंटा भारतीय जनता पार्टी का संगठन और दूसरा भाजपा में झारखंड विकास मोर्चा के विलय की संभावना की तलाश. ऐसा न हो सकने पर किसी तरह का जोड़-तोड़ करके सरकार को एक आरामदायक बहुमत दिलाने की कोशिशें भी विस्तार के रास्ते में आ रही हैं. अगर कुछ लोग आएंगे तो उन्हें मंत्रिपद देने की जरूरत पड़नी ही है. तो क्यों न विस्तार उसके बाद ही किया जाए. इसके अलावा जिस तरह के कांटे का विधानसभा चुनाव दिल्ली का बन गया है उस हालत में केंद्रीय नेतृत्व को अभी झारखंड के बारे में सोचने की फुर्सत है भी नहीं.
एक तो झारखंड भाजपा में कददावर आदिवासी नेता का टोटा है और दूसरा भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व मुंडा को उतना पसंद भी नहीं करता है. इसलिए दिल्ली और रांची दोनों तरफ से कोशिश हो रही है कि मरांडी वापस बीजेपी में आ जाएं.
ज्यादातर लोग मानते हैं कि झारखंड के पहले सीएम बाबूलाल मरांडी की छवि अभी भी राज्य में सबसे अच्छी है. हालांकि नरेंद्र मोदी की आंधी में वे 2014 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव में हार गए. लेकिन राज्य के चुनाव में अर्जुन मुंडा भी हार गए. इसके बाद से एक तो झारखंड भाजपा में कददावर आदिवासी नेता का टोटा है और दूसरा भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व मुंडा को उतना पसंद भी नहीं करता है. इसलिए दिल्ली और रांची दोनों तरफ से कोशिश हो रही है कि मरांडी वापस बीजेपी में आ जाएं.
बहुत कम लोग जानते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव के वक्त मरांडी को भाजपा में शामिल करने के प्रयास किए जा रहे थे. लेकिन इसके साथ एक शर्त भी जुड़ी थी- मरांडी को अपनी पार्टी का भाजपा में विलय करना होगा. जबकि बाबूलाल मरांडी भाजपा से सिर्फ गठबंधन करना चाहते थे. एक अड़चन गोड्डा सीट को लेकर भी थी. वहां से भाजपा के निशिकांत दुबे सांसद थे और मरांडी के दाहिने हाथ प्रदीप यादव भी वहीं से चुनाव लड़ना चाहते थे. इसके बाद राज्य के विधानसभा चुनाव से पहले भी ऐसी ही कोशिश की गई. ठीक विधानसभा चुनाव से पहले हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार के वक्त उन्हें इसमें जगह देने की भी पेशकश की गई लेकिन बात बनी नहीं.
भाजपा में अपनी पार्टी का विलय न करने की एक वजह यह थी कि मरांडी दूध के जले थे इसलिए मट्ठे को भी फूंककर ही पीना चाहते थे. 2003 में जिस तरह से उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाया गया था. और 2005 में ज्यादातर विधायकों का समर्थन होने के बावजूद सीएम नहीं बनाया गया उससे वे शंकाग्रस्त थे. मार्च 2003 में बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ी. उस समय 18 मार्च 2003 को हुई भाजपा विधायक दल की बैठक में अर्जुन मुंडा ने अपनी तुलना भरत से की थी. उन्होंने कहा था कि जैसे ही मरांडी का वनवास खत्म होगा मुंडा स्वेच्छा से कुर्सी त्याग देंगे. परंतु कुर्सी पर बैठते ही मुंडा की चाल बदल गई. उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से बाबूलाल मरांडी को किनारे करना शुरू किया. ऐसा करने में उन्हें दिल्ली के एक बड़े नेता का आशीर्वाद था.
2005 में भी ज्यादातर विधायक बाबूलाल मरांडी को ही सीएम बनाना चाहते थे. आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो भी इसी शर्त पर समर्थन देने के लिए राजी थे. रात को पासा पलटा. दूसरे दिन भाजपा के सीनियर नेताओं ने मरांडी को मना लिया और उन्होंने खुद अर्जुन मुंडा का नाम विधायक दल के नेता के तौर पर प्रस्तावित किया. बाद में सुदेश महतो को भी समर्थन देने के लिए तैयार कर लिया गया. अर्जुन मुंडा ने एक बार फिर अपना असली रंग दिखाया और मरांडी हाशिये पर चले गए. विवश होकर मरांडी को पार्टी छोड़नी पड़ी और झारखंड विकास मोर्चा का जन्म हुआ. उन्होंने कोडरमा लोकसभा चुनाव जीता. 2009 के चुनाव में भी वे विजयी हुए. लेकिन 2014 के चुनाव में हालात बदले, मरांडी लोकसभा चुनाव हारे, विधानसभा चुनाव हारे. राजनीतिक तौर पर कहें तो बाबुलाल मरांडी अब कमजोर हैं. औऱ ऐसे समय में बीजेपी उन पर डोरे डाल रही है. झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, दोनों चाहते हैं कि बाबूलाल मरांडी भाजपा में शामिल हो जाएं. मरांडी पशोपेश में हैं. एक बार फिर रिस्क लें या फिर पांच साल इंतजार करें. उनकी यही उलझन भाजपा के मंत्रिमंडल विस्तार के रास्ते की सबसे बड़ी उलझन भी है.