अतीत के पांच चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि यह चुनाव नीतीश कुमार के मेहनत से साधे गये एक सीधे-साथे जोड़-भाग का नतीजा है
अगर बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार को मिल रही ऐतिहासिक जीत को एक बिलकुल आसान तरीके से देखेंं तो इसे नीतीश कुमार द्वारा बड़ी मेहनत से साधे गये सीधे-साधे अंकगणित का नतीजा कहा जा सकता है. 2015 के विधानसभा चुनाव से पहले के पांच चुनाव में हमेशा जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस के कुल वोट भाजपा और उसके सहयोगियों (जिसमें 2014 को छोड़कर जेडीयू भी शामिल है) के मिले-जुले वोटों से ज्यादा रहे हैं.
अगर 2014 के लोकसभा चुनाव की बात की जाए, जब नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता अपने चरम पर थी, तब भाजपा और उसके सहयोगियों को यहां कुल 38 प्रतिशत मत ही मिले थे. जबकि जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस के मिले-जुले मतों की संख्या थी 44 प्रतिशत. इसका सीधा सा मतलब यह है कि उस वक्त बिहार में भाजपा को इतनी सीटें मिली थीं तो अपने विरोधियों के मतों के बंटे होने की वजह से मिली थीं. अब जब जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस साथ आ गए तो भाजपा की हालत वैसे ही पतली हो गई है जैसी ऐसा होने पर 2014 के लोकसभा चुनाव सहित पिछले किसी भी चुनाव में हो सकती थी.
जब जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस साथ आ गए तो भाजपा की हालत वैसे ही पतली हो गई है जैसी ऐसा होने पर 2014 के लोकसभा चुनाव सहित पिछले किसी भी चुनाव में हो सकती थी.
आइये एक नजर डालते हैं बिहार में 2015 से पहले हुए पांच चुनावों के आंकड़ों पर यह जानने के लिए कि जो नीतीश कुमार कांग्रेस का विरोध करते और लालू यादव के जंगल राज को कोसते हुए बिहार की सियासत के शीर्ष तक पहुंचे थे उन्होंने आरजेडी और कांग्रेस से गठबंधन करने के लिए अपनी पूरी प्रतिष्ठा ही दांव पर क्यों लगा दी.
2004
2004 के लोकसभा चुनाव में राजद को कुल 30 प्रतिशत मत (22 सीट) मिला था, जदयू को 22 प्रतिशत (छह सीटें) और भाजपा को 14 प्रतिशत (पांच सीटें). उस समय कांग्रेस का वोट प्रतिशत था चार (3 सीटें). भाजपा+ यानी भाजपा और जदयू को मिलकर तब कुल 36 प्रतिशत वोट मिले थे. लेकिन अगर उस साल का जदयू, राजद और कांग्रेस का वोट प्रतिशत मिला दें तो यह आंकड़ा 57 प्रतिशत जितना विशाल हो जाता है.

2005

2005 में फिर एक बार बिहार में विधानसभा चुनाव हुए थे. इसमें जदयू को 20 प्रतिशत मत (88 सीटें) मिले थे, भाजपा को 15 प्रतिशत (55 सीटें), राजद को 23 प्रतिशत (54 सीटें) और कांग्रेस को 6 प्रतिशत (9 सीटें). भाजपा+ यानी भाजपा और जदयू को उस चुनाव में भी कुल 36 प्रतिशत मत मिले थे. लेकिन जदयू, राजद और कांग्रेस को मिलकर इससे 14 फीसदी ज्यादा यानी कि 50 फीसदी वोट मिले थे.
2009
2009 के लोकसभा चुनाव में जदयू को 24 फीसदी वोटों के साथ 20 सीटें मिली थीं, भाजपा को 13 फीसदी मतों के साथ 12 सीटें, राजद को 19 फीसदी वोटों के साथ चार सीटें और कांग्रेस को 10 फीसदी मतों के साथ दो सीटें. उस समय मिलकर चुनाव लड़ने वाले जदयू और भाजपा का मिला-जुला मत (भाजपा +) था 37 प्रतिशत. जबकि जदयू, राजद और कांग्रेस का मिला हुआ वोटों का आंकड़ा 53 फीसदी था.
 
इस चुनाव में भाजपा और जदयू की जिगरी यारी जानी दुश्मनी में बदल चुकी थी और लोजपा और भाजपा की जानी दुश्मनी, जिगरी यारी में.

2010

एक साल बाद ही 2010 में बिहार में फिर विधानसभा चुनाव की बारी आयी. इस चुनाव में भाजपा के लिए पिछली बार से ज्यादा नहीं बस थोड़ा ही कुछ बदला था. इसमें जदयू को 22 फीसदी वोट (115 सीटें) मिला था, भाजपा को 16 फीसदी (91 सीटें) और राजद को 19 फीसदी (सिर्फ 22 सीटें). कांग्रेस को 4 सीटों के साथ 8 प्रतिशत वोट मिले थे. इस विधानसभा चुनाव में भाजपा और जदयू (भाजपा +) को साथ मिलाकर 39 प्रतिशत वोट मिला था. अगर जदयू, राजद और कांग्रेस को मिलाकर वोट प्रतिशत को देखें तो यह 50 फीसदी था.

2014

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा और जदयू की जिगरी यारी जानी दुश्मनी में बदल चुकी थी और लोजपा और भाजपा की जानी दुश्मनी, जिगरी यारी में. उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेता नीतीश की परछाईं से निकलकर उदित हो रहे थे. नीतीश कुमार एक साथ भाजपा और लालू प्रसाद यादव, दोनों से लड़ने में ऊर्जा लगाये हुए थे. नरेंद्र मोदी अपने पूरे शबाब पर थे और कांग्रेस अपने ग्रहण के सबसे बुरे दौर में. इस दौर में (भाजपा +) यानी भाजपा, लोजपा और रालोसपा को लोकसभा की सीटें भले ही 31 मिली हों लेकिन उनका मत प्रतिशत केवल 38 फीसदी ही था. उधर अलग लड़ने वाले जदयू (दो सीटें), राजद (चार सीटें) और कांग्रेस का मिलकर वोट प्रतिशत का आंकड़ा 44 था. इसके बाद अगस्त में हुए उपचुनाव में जब आरजेडी और जेडीयू साथ आए तो मोदी के पक्ष में चल रही लहर का असर बिहार में लगभग न के बराबर हो गया.
अतीत के चुनाव के इन आंकड़ों को देखते हुए ही नीतीश कुमार ने हर कीमत पर आरजेडी और कांग्रेस का साथ लेने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया जिसका परिणाम आज उनकी दो तिहाई बहुमत से हो रही जीत के रूप में सामने आ रहा है.