लाखों शरणार्थियों को शरण देकर जर्मनी की चांसलर अंगेला मेर्कल ने भले ही दुनिया भर में तारीफें बटोरी हों, लेकिन अपनी उदारता का सिक्का जमाने के लिए की गई इस कवायद से अब उनकी कुर्सी ही खतरे में आ गई है.
बीते 17 अक्टूबर की बात है. जर्मनी के चौथे सबसे बड़े शहर कोलोन के लोगों को अगले ही दिन एक सीधे मतदान में नए मेयर का चुनाव करना था. 58 वर्षीय हेनेरिएटे रेकर निर्दलीय लड़ रही थीं. शहर के एक व्यस्त चौक पर लगने वाले साप्ताहिक बाज़ार में उन्होंने अपने प्रचार के लिए एक स्टैंड लगाया था. लोगों को गुलाब का एक-एक फूल थमाते हुए अपने लिए वोट मांग रही थीं.
तभी, 44 साल के एक बेरोज़गार ने भी उनसे एक फूल मांगा. जैसे ही उन्होंने एक गुलाब उसकी ओर बढ़ाया, उसने लोगों से यह कहते हुए कि 'मैं तुम्हारे बच्चों को बचाने के लिए यह कर रहा हूं,' रेकर की गर्दन में छुरा घोंप दिया. खून के फ़व्वारे के बीच रेकर ज़मीन पर गिर पड़ीं और बेहोश हो गईं. आस-पास के लोगों में से कुछ ने हमलवार को पकड़ने की कोशिश की. लेकिन उसने एक दूसरे छुरे से यह कहते हुए चार और लोगों को घायल कर दिया कि 'यहां जो कुछ हो रहा है, सब ग़लत है. मैं तो तुम्हें इन लोगों से मुक्ति दिला रहा हूं.'
'रेफ्यूजीज़ वेल्कम' की तख्तियों के साथ कल तक जिन शरणार्थियों को सत्कारा जा रहा था, आज उन्हें दुत्कारा जा रहा है. जर्मनी के अनगिनत छोटे-बड़े नेता और मेयर जान की धमकियों के बीच जी रहे हैं.
सत्कार के बाद दुत्कार
सारा जर्मनी सन्न रह गया. घाव गहरा और जानलेवा था, लेकिन डॉक्टरों ने रेकर को किसी तरह बचा लिया. दो सप्ताह अस्पताल में रहने के बाद इस समय वे स्वास्थ्य लाभ कर रही हैं. चुनाव भी उन्होंने 52.7 प्रतिशत मतों से जीत लिया है. उन पर हमला करने वाला कोई मानसिक रोगी नहीं है. पुलिस से उसका कहना था, 'ये विदेशी हमारी रोज़ी-रोटी छीन लेते हैं.' पता चला कि 20 साल पहले तक वह एक उग्र दक्षिणपंथी गिरोह के संपर्क में रह चुका था. जर्मनी में मुस्लिम शरणार्थियों की वर्तमान आकस्मिक बाढ़ से विदेशियों के प्रति उसकी नफरत फिर भड़क उठी थी.
दरअसल 'रेफ्यूजीज़ वेल्कम' की तख्तियों के साथ कल तक जिन शरणार्थियों को सत्कारा जा रहा था, आज उन्हें दुत्कारा जा रहा है. दुत्कारने वाले सिरफिरे या घोर दक्षिणपंथी ही नहीं, पढ़े-लिखे, सफ़ेदपोश मध्यवर्गीय लोग भी हैं. नौबत यह आ गई है कि जर्मनी के अनगिनत छोटे-बड़े नेता और अनेक शहरों के मेयर जान लेने की धमकियों के बीच जी रहे हैं. क़रीब ढाई सौ शहरों के मेयरों ने एक साझे पत्र में केंद्र सरकार से तत्काल कुछ करने और लाखों शरणार्थियों की अनवरत बाढ़ रोकने की गुहार लगाई है. जनता के बीच शरणार्थियों के पक्ष में कम, विपक्ष में कहीं अधिक ध्रुवीकरण इस तेज़ी से बढ़ रहा है कि अब मीडिया ने भी अपना रुख बदल लिया है. वह शरणार्थियों के पक्षधर सरकार-समर्थक पुराने राग से परे हट रहा है.
शरणार्थियों के शिविरों और आवासों पर, अकेले इस साल, अब तक 600 हमले हो चुके हैं. इनमें से 543 दक्षिणपंथी अतिवादियों के खाते में जाते हैं. मारपीट की 95 और आगजनी की 49 घटनाएं हो चुकी हैं.
गुप्तचर सेवाएं भी बेचैन
खुद देश की गुप्तचर सेवाएं भी व्यापक अशांति की आशंका से बेचैन होने लगी हैं. जर्मनी के संघीय अपराध निरोधक कार्यालय 'बीकेए' के अध्यक्ष होल्गर म्युइन्श ने 29 अक्टूबर को चेतावनी दी कि शरणार्थियों की अनवरत बाढ़ से 'आंतरिक सुरक्षा को ख़तरा लगातार बढ़ रहा है.' फ़ोकस नाम की जर्मन पत्रिका के साथ एक भेंटवार्ता में उन्होंने कहा, 'शरणार्थियों की संख्या बढ़ने के साथ ही (आंतरिक) सुरक्षा की स्थिति भी विकट होती जा रही है. स्वयं शरणार्थियों के बीच झगड़े-तकरार बढ़ रहे हैं और (देश के)  दक्षिणपंथी खेमे का रुख और भी गरम होने लगा है.' म्युइन्श का मानना था कि सरकार को जल्द से जल्द सामान्य परिस्थिति बहाल करनी होगी.
जर्मनी में सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन
जर्मनी में सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन
बीकेए के आंकड़े बताते हैं कि शरणार्थियों के शिविरों और आवासों पर, अकेले इस साल, अब तक 600 हमले हो चुके हैं. इनमें से 543 दक्षिणपंथी अतिवादियों के खाते में जाते हैं. मारपीट की 95 और आगजनी की 49 घटनाएं हो चुकी हैं. म्युइन्श ने कहा कि आने वाले दिनों में 'हो सकता है कि हमें और गंभीर घटनाएं झेलनी पड़ें.' ऐसी ही एक घटना थी अक्टूबर के अंतिम दिनों में एक शरणार्थी महिला के पांच वर्षीय बेटे का अपहरण. 32 वर्षीय अपहरणकर्ता ने यौनदुराचार करने के बाद एक बेल्ट से गला घोंट कर बच्चे को मार डाला.
एक नवंबर को ही पूर्वी जर्मनी के माग्डेबुर्ग और विसमार में कई लोगों की भीड़ ने सीरिया से आए शरणार्थियों को डंडों और बेसबॉल के बैटों से पीटा.
शरणार्थियों पर होने लगे हैं हमले
एक नवंबर को 700 शरणार्थियों से भरी एक ट्रेन को पूर्वी जर्मनी के सैक्सनी राज्य में स्थित मेराने में 200 लोगों की भीड़ ने रोक लिया. पुलिस के साथ झड़पों में दो पुलिसकर्मी घायल हो गए और तीन दंगाइयों को गिरफ्तार कर लिया गया. इससे एक हफ्ते पहले सैक्सनी के ही फ्राइबेर्ग शहर में भी शरणार्थियों से भरी एक ट्रेन को रोक कर इसी तरह के दंगे किये गए थे. एक नवंबर को ही पूर्वी जर्मनी के माग्डेबुर्ग और विसमार में कई लोगों की भीड़ ने सीरिया से आए शरणार्थियों को डंडों और बेसबॉल के बैटों से पीटा. इसी दिन जर्मनी के दूसरे कई स्थानों पर भी शरणर्थियों पर हमले करने या उनके रहने की जगहों पर आग लगाने की घटनाएं हुईं.
अधिकतर शरणार्थी अधकचरी उम्र के अकेले नौजवान हैं, इसलिए लोगों को यह भी शिकायत है कि जहां कही उन्हें ठहराया जाता है, वहां गंदगी, शोर-शराबा और जर्मन लड़कियों तथा महिलाओं के साथ छेड़-छाड़ और बलात्कार की घटनाएं भी बढ़ जाती हैं. लेकिन, होल्गर म्युइन्श को इससे भी बड़ा डर एक दूसरी वजह से है. उन्हें अब तक 100 से अधिक नए इस्लामी आतंकवादियों की भनक और 40 ऐसे प्रयासों की झलक मिली है, जिनमें जर्मनी में रहने वाले सलाफ़ी (इस्लामी कट्टरपंथी) नए आए शरणार्थियों पर डोरे डालने में लगे थे.
'जातीय शुद्धता' के लिए गुंडागर्दी
सवा आठ करोड़ की जनसंख्या वाले जर्मनी में-- जहां हर पांचवां व्यक्ति या तो खुद या उसके माता-पिता या फिर दोनों में से कोई एक विदेशी मूल का है-- अकेले इस साल अब तक लगभग आठ लाख नए शरणार्थी आ चुके हैं. साल के आखिर तक यह आंकड़ा 10 लाख पहुंच जाने की आशंका है. अगले साल यह और बढ़ सकती है. जनसंख्या और क्षेत्रफल में भारत के महाराष्ट्र जितने बड़े जर्मनी में शिव-सैनिकों की तर्ज पर काम करने वाले लोगों की कमी नहीं है, जो देश की 'जातीय शुद्धता' बनाए रखने के लिए अधीर होने लगे हैं. सरकार की शरणार्थी-नीति के विरोध में पूर्वी जर्मनी के ड्रेस्डेन शहर में हर सोमवार की शाम को होने वाले तथाकथित 'पेगीडा' प्रदर्शन फिर से चल पड़े हैं. 12 अक्टूबर के प्रदर्शन में चांसलर मेर्कल और उप-चासंलर गाब्रिएल को फांसी पर लटका देने का इशारा करते दो ऐसे फंदे भी दिखे, जिन पर उनके नाम लिखे थे.
जनसंख्या और क्षेत्रफल में भारत के महाराष्ट्र जितने बड़े जर्मनी में शिव-सैनिकों की तर्ज पर काम करने वाले लोगों की कमी नहीं है, जो देश की 'जातीय शुद्धता' बनाए रखने के लिए अधीर होने लगे हैं
अकेला पड़ता जर्मनी
जिस चांसलर मेर्कल की अभी कुछ ही दिन पहले तक यूरोपीय संघ में एकछत्र हेकड़ी चला करती थी, आज उन्हीं की हर तरफ किरकिरी हो रही है. हंगरी, क्रोएशिया, स्लोवेनिया, सर्बिया इत्यादि पूर्वी यूरोपीय देश तो अपने यहां से गुज़र रही शरणार्थियों की अनियंत्रणीय भीड़ के लिए चांसलर मेर्कल को रात-दिन कोस ही रहे हैं, फ्रांस, इटली, ब्रिटेन या नीदरलैंड जैसे पश्चिमी पड़ोसी भी सिर खुजला रहे हैं कि उन्हें हो क्या गया है? क्या सोच कर उन्होंने शरणार्थियों को खुला निमंत्रण दे दिया और अब भी उस पर अटल हैं? स्थानीय दक्षिणपंथी पार्टियों के प्रति बढ़ते समर्थन व उनके कोप के डर से पश्चिमी यूरोप के स्वीडन जैसे सदैव उदार रहे देश भी शरणार्थियों के लिए अपने दरवाज़े अब बंद कर रहे हैं.
यूरोपीय संघ के 28 देशों में से केवल नौ ही, और वे भी सिर्फ 1,60,000 मान्यताप्राप्त शरणर्थियों के वितरण-कोटे पर सहमत हुए हैं. मन ही मन सब का यही मानना है कि शरणार्थियों को वही संभाले, जिसने इस अंतहीन बला को न्यौता दिया है-- यानी जर्मनी. जर्मनी यदि अपने आर्थिक बाहुबल के साथ-साथ अपनी मानवीयता और उदारता का भी सिक्का जमाना चाहता है, तो अकेले अपने ही बल-बूते पर जमाए! हंगरी के प्रधानमंत्री विक्तोर ओर्बान तो बार-बार कह चुके हैं कि शरणार्थी 'हमारी नहीं, जर्मनी की समस्या हैं.'
पूर्वी यूरोप के वे सभी दर्जन-भर भूतपूर्व कम्युनिस्ट देश आज जर्मनी को ठेंगा दिखा रहे हैं, जिन्हे एक दशक पहले जर्मनी ने ही ज़ोर देकर एक ही सांस में यूरोपीय संघ में भर्ती कराया था
केवल 20 लाख की जनसंख्या वाले स्लोवेनिया के प्रधानमंत्री मीरो सेरार का कहना है कि, 'बाल्कन प्रायद्वीप पर यूरोपीय एकता दांव पर लगी हुई है.' पूर्वी यूरोप के वे सभी दर्जन-भर भूतपूर्व कम्युनिस्ट देश आज जर्मनी को ठेंगा दिखा रहे हैं, जिन्हे एक दशक पहले जर्मनी ने ही ज़ोर देकर एक ही सांस में यूरोपीय संघ में भर्ती कराया था-ताकि रूस उन्हें कहीं दुबारा अपनी छत्रछाया में ना खींच ले.
मेर्कल की हड़बड़ी
अपने यूरोपीय सहयोगियों के असहयोग से परेशान चांसलर मेर्कल अपनी हताशापूर्ण हड़बड़ी में एक दूसरी भूल करने पर उतारू लग रही हैं. वे अपनी बातों से मुकरने के लिए सुपरिचित तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैय्यब एर्दोआन को मनाने के लिए 18 अक्टूबर को अंकारा पहुंच गयीं. जर्मनी पहुंचने वाले सभी शरणार्थी तुर्की में ही मानव तस्करों के चुंगुल में फंसते और वहीं नावों में बैठते हैं. वहीं से वे तुर्की और ग्रीस (यूनान) के बीच वाले एजियन सागर को पार करते हुए पहले ग्रीस और फिर वहां से बाल्कन देशों में अटकते-भटकते हुए जर्मनी पहुंचते हैं. यह सच है कि तुर्की यदि मन बना ले, तो वह शरणार्शियों की इस तस्करी को रोक सकता है. पर, वह फ़िलहाल रोक नहीं रहा है, क्योंकि जर्मनी के ही अनमनेपन के कारण यूरोपीय संघ का सदस्य बनकर यूरोपीय देश कहलाने की उसकी लालसा दशकों से पूरी नहीं हो पा रही है.
अपने यूरोपीय सहयोगियों के असहयोग से परेशान चांसलर मेर्कल अपनी हताशापूर्ण हड़बड़ी में एक दूसरी भूल करने पर उतारू लग रही हैं.
चांसलर मेर्कल ने तुर्की के आगे घुटने टेकते हुए एक प्रस्ताव रखा था. इसके मुताबिक यदि तुर्की यूरोपीय संघ की बाहरी सीमाओं की रक्षा में सहयोग दे-यानी नए शरणार्शियों को अपनी भूमि पर से होकर यूरोप जाने से रोकने और यूरोपीय देशों द्वारा लौटाए गए शरणार्थियों को वापस लेने के लिए राज़ी हो जाए-- तो तुर्की के नागरिकों को यूरोपीय संघ के देशों की यात्रा के लिए वीसा देने में उदारता 2016 से ही लागू की जा सकती है. साथ ही तुर्की की जेब भी गरम की जा सकती है, राष्ट्रपति एर्दोआन की अलोकतांत्रिक मनमानी की अनदेखी कर उन्हें यूरोपीय संघ के किसी शिखर सम्मेलन में आमंत्रित किया जा सकता है और यूरोपीय संघ में तुर्की की सदस्यता के लिए बातचीत फिर शुरू की जा सकती है.
एर्दोआन जानते हैं कि जर्मनी और उसके वर्चस्व वाले यूरोपीय संघ को दोनों हाथ से दुहने का यही सुनहरा मौका है. इसलिए उन्होंने अपनी संभावित सेवाओं के लिए इन सारी सुविधाओं के अलावा कम से कम सात अरब यूरो की मांग की है. इसमें से तीन अरब यूरो उन्हें तत्काल नकद चाहिए. पहली नवंबर को तुर्की में दोबारा हुए संसदीय चुनवों से ठीक पहले चांसलर मेर्कल की इस यात्रा से एर्दोआन के अघोषित यूरोपीय बहिष्कार का न केवल अंत हुआ, बल्कि तुर्की में उनका कद और भी ऊंचा हो गया. उनकी पार्टी को इस बार वह पूर्ण बहुमत भी मिल गया, जिसके बल पर वे तुर्की को राष्ट्रपति की सत्ता वाली शासन प्रणाली में बदल सकते हैं.
जर्मनी में सत्तारूढ़ गठबंधन की तीनों पार्टियों-- चांसलर मेर्कल की सीडीयू, बवेरिया राज्य की सीएसयू और उप-चांसलर गाब्रिएल की एसपीडी-- के बीच राजनीतिक खींच-तान बढ़ती जा रही है.
चांसलर की कुर्सी डावांडोल
वास्तव में चांसलर अंगेला मेर्कल को नहीं, बल्कि यूरोपीय सरकार-जैसे यूरोपीय आयोग के अध्यक्ष ज़ौं क्लूद युंकर या संघ की विदेशनीति प्रभारी फ़ेदरिका मोग़ेरीनी को तुर्की जाना चाहिये था. पर, मजबूरी मेर्कल की ही थी, क्योंकि उनकी कुर्सी डावांडोल होने लगी है. जर्मन जनता में, उनके सत्तारूढ़ गठबंधन में और स्वयं उनकी अपनी ही पार्टी में हवा का रुख बहुत प्रतिकूल होता जा रहा है. उन्हें ऐसा कुछ कर दिखाना था कि वे कह सकतीं कि देखा, बिना दरवाज़ा बंद किये और निष्ठुर बने भी शरणर्थियों का आना थमने लगा है!
फिलहाल तो ऐसा नहीं है, क्योंकि तुर्की के साथ अभी कोई समझौता नहीं हुआ है. इसमें समय लगेगा. दूसरी ओर, हर बीत रहे दिन के साथ जर्मनी में सत्तारूढ़ गठबंधन की तीनों पार्टियों-- चांसलर मेर्कल की सीडीयू, बवेरिया राज्य की सीएसयू और उप-चांसलर गाब्रिएल की एसपीडी-- के बीच राजनीतिक खींच-तान बढ़ती जा रही है. एक नवंबर को चांसलर कार्यालय में तीनों के बीच 10 घंटे तक शिखरवार्ता चली, पर कोई परिणाम नहीं निकला.
'सीमा तो बंद होगी, चाहे मेर्कल की सहमति से हो या असहमति से. जनता के बहुमत की यही मांग है वर्ना वे चांसलर नहीं रह पायेंगी.'
सीएसयू के नेता चांसलर मेर्कल को बार-बार अल्टीमेटम दे रहे हैं कि वे ऑस्ट्रिया के साथ लगती जर्मन सीमा बंद करें या सीमा पर से ही शरणार्थियों को बैरंग वापस करें. जर्मनी में प्रवेश करने वाले शरणार्थी बवेरिया से सटे ऑस्ट्रिया से आते हुए पहले बवेरिया में ही भीड़ लगाते हैं. जर्मनी अपनी सीमा आसानी से बंद नहीं कर सकता, क्योंकि जर्मनी और ऑस्ट्रिया यूरोप के 26 देशों के बीच हुए शेंगन समझौते के सदस्य हैं. इस समझौते के अनुसार इन देशों के बीच की सीमाएं हर कोई, हर समय बिना रोक-टोक पार कर सकता है. इसे जानते हुए भी सीएसयू के गृहनीतिक प्रभारी हांस-पेटर ऊल ने धमकी दी है कि 'सीमा तो बंद होगी, चाहे मेर्कल की सहमति से हो या असहमति से.' उनका कहना है कि जनता के बहुमत की यही मांग है, 'वर्ना वे चांसलर नहीं रह पायेंगी.'
चांलसर मेर्कल की अपनी पार्टी सीडीयू के कई नेता भी ऊंचे या दबे स्वर में 'शरणार्थियों के लिए खुले दरवाज़े' की उनकी नीति की आलोचना करने लगे हैं. उनका तर्क है कि शरणार्थियों का तांता तो न जाने कब तक चलेगा, जबकि जर्मनी की सांस अभी से बुरी तरह फूलने लगी है. जिन लोगों को क़ानूनी शरण मिलेगी, उनके रहने-खाने और काम-धंधे की व्यवस्था करने के अलावा उन के परिवारों को भी जर्मनी आने और रहने का अधिकार देना होगा. दशकों तक चलने वाला यह बोझ जर्मनी तो क्या, कोई भी देश संभाल नहीं सकता.
चांसलर मेर्कल के भावी विकल्प का भी नाम लिया जाने लगा है. वे हैं अपनी नीति में कठोरता के लिए सुपरिचित, वित्तमंत्री वोल्फ़गांग शौएब्ले, जो कर्ज़ में डूबे ग्रीस को इस वर्ष खूब रुला चुके हैं. बताया जाता है कि उन्हें सीडीयू के ही नहीं, दूसरी पार्टियों के भी कई सांसदों और विधायकों का बढ़ता हुआ समर्थन मिल रहा है. वे नहीं चाहते कि सीरिया के शरणार्थियों को बिना किसी जांच-परख के आंख बंद कर शरण मिले और बाद में वे स्वदेश में रह गए अपने परिवारों को भी जल्द ही जर्मनी बुला सकें. इससे सारी समस्य़ा का आयाम इतना विकराल हो जायेगा कि जर्मनी न तो शरणार्थियों को संभाल पाएगा और न शरणार्थियों पर अपनी भड़ास निकाल रहे दक्षिणपंथियों को रोक पाएगा. इससे देश हिंसा और टकराव के दुष्चक्र में फंस सकता है.
यही वजह है कि अंगेला मेर्कल के सामने अब इधर कुआं, उधर खाई वाली स्थिति है.