अंग्रेजी धारावाहिक ‘क्वांटिको’ कुछ समय पहले काफी चर्चा में रहा. इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह कही गई कि प्रियंका चोपड़ा के रूप में पहली बार कोई भारतीय किसी हॉलीवुड प्रोडक्शन में मुख्य भूमिका निभा रहा है. कुछ इसी तरह की चर्चा दीपिका पादुकोण की पहली हॉलीवुड फिल्म ‘ट्रिपल एक्स: रिटर्न ऑफ जेंडर केज’ को लेकर भी चली.

लेकिन यह सच नहीं है. यह कारनामा आज से करीब आठ दशक पहले अंजाम दिया जा चुका है- साबू दस्तगीर द्वारा. साबू दस्तगीर वह शख्स था जो पैदा तो मैसूर के एक महावत परिवार में हुआ लेकिन, पहले इंग्लैंड और फिर हॉलीवुड पहुंचकर उसने सफलता के ऐसे झंडे गाड़े कि किसी भारतीय कलाकार का हॉलीवुड में इस कदर छाना हाल-फिलहाल संभव नहीं दिखता.

साबू का जन्म 1924 में हुआ था. उनके पिता मैसूर के महाराजा के यहां महावत का काम करते थे. साबू की उम्र नौ साल की थी जब वे चल बसे. अब यह परिवार मैसूर दरबार से खाने के रूप में मिल रहे सहारे के भरोसे था.

नाटकीय मोड़

1936 में प्रसिद्ध फिल्म निर्माता एलेग्जेंडर कोर्दा के लिए एक डाक्यूमेंट्री बनाने के सिलसिले में रोबर्ट फ्लेहर्टी मैसूर आये. बस यहीं से साबू की ‘रियल लाइफ’ में ऐसे नाटकीय मोड़ आने शुरू हुए जो उनकी ‘रील लाइफ’ की शुरुआत करने वाले थे. डॉक्यूमेंट्री की शूटिंग के दौरान महाराज के 200 हाथियों का झुंड देखने वाले साबू के चाचा ने अपनी मदद के लिए उन्हें भी अपने साथ ले लिया था. रॉबर्ट फ्लेहर्टी की नज़र साबू पर पड़ी जो हाथियों को संभालने में सिद्धहस्त थे और देखने में काफी आकर्षक भी. उन्होंने साबू को इंग्लैंड ले जाकर सिनेमा के गुर सिखाने की ठानी. उन्हें लगा कि साबू को कोर्दा की फिल्म ‘द एलिफेंट ब्वॉय’ के लिए तैयार किया जा सकता है क्योंकि फिल्म के सबसे मुश्किल हिस्से यानी हाथी के साथ सामंजस्य के मामले में वे पहले ही निपुण थे.

‘द एलिफेंट ब्वॉय’ का एक दृश्य
‘द एलिफेंट ब्वॉय’ का एक दृश्य

1937 में साबू अपने भाई के साथ इंग्लैंड जा पहुंचे. सिनेमा की शुरूआती तालीम लेने के बाद उन्होंने अपनी पहली फिल्म की शूटिंग ‘द एलिफेंट ब्वॉय’ के साथ शुरू की. इसी साल साबू ने एक और फिल्म ‘ड्रम’ में भी अभिनय किया. 1940 में कोर्दा ने साबू को लेकर एक नयी फिल्म ‘द थीफ ऑफ़ बग़दाद’ की शुरुआत की. लेकिन इस फिल्म की निर्माण प्रक्रिया में ही कई नाटकीय मोड़ आने लगे. फिल्म ने तीन डायरेक्टरों, इतने ही राइटरों और तमाम रचनात्मक बदलावों के बाद एक और परेशानी का सामना किया. यह थी दूसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत और इसमें इंग्लैंड की सीधी भागीदारी.

हॉलीवुड

अब फिल्म को अमेरिका ले जाने की योजना बनी. फिल्म के साथ साबू दस्तगीर भी हॉलीवुड पहुंच गए. तमाम परेशानियों से निकलकर ‘द थीफ ऑफ़ बग़दाद’ ने सफलता का इतिहास रचा और साबू अमेरिका के घर-घर जा पहुंचे. इसके बाद उनकी अगली दो फिल्में ‘अरेबियन नाइट्स’ और ‘जंगल बुक’ भी सफल रहीं. 1943 में साबू को अमेरिका की नागरिकता मिली. इसी साल वे 11 महीनों की ट्रेनिंग के साथ अमेरिकी वायु सेना में बतौर टेल गनर शामिल हुए. अपनी बहादुरी के लिए साबू दस्तगीर को फ्लाइंग क्रॉस मैडल से सम्मानित किया गया.

यहीं से उनकी जिंदगी में एक और अहम मोड़ आया. सेना से वापस आने के बाद साबू के लिए सम्मान तो था, लेकिन इस बीच हॉलीवुड की दुनिया बदल चुकी थी. साबू को फिल्में तो मिलीं पर उनमें वह बात नहीं थी. 1948 में उन्होंने एक फिल्म अभिनेत्री मर्लिन कूपर से शादी रचाई. मर्लिन ही थीं जो साबू के साथ उनके बुरे वक़्त में भी हमेशा डटकर खड़ी रहीं.

उतार

अब साबू की वह देखने की बारी थी जो शायद कोई भी सितारा न देखना चाहे. काम की तंगी और खोती सफलता को देख अंततः साबू ने इंग्लैंड जाने का फैसला किया. यहां उन्हें एक सर्कस में काम करना था. सर्कस के साथ साबू सारे यूरोप में जा रहे थे और देखने वाले जैसे टूट पड़ रहे थे. इस सर्कस में पैसा तो था लेकिन, इतना नहीं कि वह साबू को तीन साल से ज्यादा रोक पाता. साबू एक बार फिर हॉलीवुड में थे और इस बार वाल्ट डिज्नी के साथ एक फिल्म ‘अ टाइगर वाक्स’ से अपनी वापसी की उम्मीद कर रहे थे.

लेकिन जिस तरह कभी सफलता ने साबू के घर डेरा डाला था उसी तरह अब असफलताएं और परेशानियां उन्हें घेरकर बैठ गई थीं. इंग्लैंड की एक अभिनेत्री ने कोर्ट में दावा किया कि साबू उसकी बेटी के पिता हैं. कचहरी के तमाम चक्करों के बाद फैसला साबू के पक्ष में हुआ. इसी बीच साबू ने अपने भाई के नाम एक व्यवसाय भी शुरू किया था. लेकिन दूकान में डकैती हो गई और इसमें साबू के भाई की हत्या कर दी गई. इस घटना ने साबू को गहरी चोट पहुंचाई. इसके बाद, साबू के बेहद खूबसूरत घर में आग भी लग गई. इसे कुछ लोगो ने बीमा कम्पनी से पैसा लेने की साजिश भी माना. यही वक़्त था जब साबू ने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘जो मेरे साथ हो रहा है वह किसी कुत्ते के साथ भी न हो’.

1963 में दिल के दौरे ने साबू को अचानक मौत की नींद में सुला दिया. तब उनकी उम्र सिर्फ 39 साल थी. ‘अ टाइगर वाक्स’ उनकी मौत के बाद 1964 में रिलीज हुई. इस तरह देखें तो साबू ने काम तो हॉलीवुड में किया लेकिन उनकी जिंदगी किसी हिंदी फिल्म से कम नहीं थी.