वो गझिन कांटेदार दाढ़ी और उससे टपकती क्रूरता. न दिखने वाली गर्दन में फंसा ताबीज, कंधे पर लटकी कारतूस की पेटी, कमर के बजाय हाथ में झूलती बेल्ट, वो ‘अरे ओ सांभा! कितने आदमी थे’ वाला सवाल, वो खूंखार हंसी और बात-बात के बाद आ..थू!

सही समझे हैं (ऐसा शायद ही कोई हो जो इसे न समझे). बात गब्बर सिंह की ही हो रही है. वही गब्बर जो धधकते ‘शोले’ से तपकर निकला था. वही गब्बर जिसके लिए अमजद खान पहली पसंद नहीं थे. (पहली पसंद डैनी थे, जो उन दिनों फिल्म धर्मात्मा की शूटिंग में व्यस्त थे) वही अमजद जिनकी आवाज को जावेद अख्तर ने यह कहकर नकार दिया था कि इस रोल के लिए यह कमजोर है. आज 24 बरस बीत गए अमजद जकारिया खान के निधन को, लेकिन उनकी वो अलहदा आवाज और जुदा अंदाज 100 साल से ऊपर के भारतीय सिनेमा में अमर है.

अमजद रंगमंच के आदमी थे. उनके बारे में विकीपीडिया लिखता है कि ‘नाजनीन’ उनकी पहली फिल्म थी. लेकिन नहीं, उन्होंने चार साल की उम्र में बाल कलाकार के रूप में पहला रोल अपने चाचा की ‘चार पैसा’ में किया था. कह सकते हैं कि खलनायकी अमजद को विरासत में मिली थी. अमजद ने जन्म ही 50-60 के दशक के टॉप विलेन जयंत खान के घर में लिया था. वो 1940 के 11वें महीने की 12 तारीख थी.

‘मेरे हिसाब से अमजद खान गब्बर के रोल में अद्भुत थे. लेकिन पूरी इंडस्ट्री फिल्म की शुरुआती नाकामी की वजह उन्हें ही मान रही थी. उनकी पर्सनेलिटी, उनकी आवाज सभी आलोचनाओं के घेरे में थी.’

कुछ साल पहले जब हिंदुस्तानी सिनेमा के 100 साल का जश्न मनाया जा रहा था तो इस एक सदी के टॉप 10 डायलॉग्स में गब्बर रूपी अमजद खान का ‘कितने आदमी थे’ भी शुमार था. इस डायलॉग के बारे में आज भी उसी अंदाज में पूछा जाता है- कितने रीटेक थे? जवाब है- 40 सरदार.

अमजद दर्शन शास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएट थे. शायद तभी वे यह डायलॉग इतने परफेक्शन से बोल पाये कि जो ‘डर गया, समझो मर गया.’ शोले फिल्म का उनका एक और डायलॉग तो खुद उस दौर का दर्शन था. वही डायलॉग जब गब्बर जय और वीरू से मात खाकर लौटे अपने आदमियों पर मारता है- ‘यहां से पचास-पचास कोस दूर जब बच्चा रात में रोता है तो मां कहती है, बेटा सो जा. सो जा नहीं तो गब्बर सिंह आ जाएगा. और ये तीन हरामजादे गब्बर सिंह का नाम पूरा मिट्टी में मिलाय दिए.’ यह डायलॉग तब के चंबल का आईना है. जाहिर है कि इस संवाद को लिखने वाले सलीम-जावेद का योगदान इसमें बहुत बड़ा है. लेकिन अमजद खान अगर इसे न बोलते तो?

शोले अगर सिनेमैटिक मास्टरपीस कही गई तो अमजद खान की ही वजह से. नसीरुद्दीन शाह ने अपनी किताब आत्मकथा ‘एंड देन वन डेः अ मेमॉयर’ में लिखा है- ‘मेरे हिसाब से अमजद खान गब्बर के रोल में अद्भुत थे. लेकिन पूरी इंडस्ट्री फिल्म की शुरुआती नाकामी की वजह उन्हें ही मान रही थी. उनकी पर्सनैलिटी, उनकी आवाज सभी आलोचनाओं के घेरे में थी.’ डैनी ने भी बाद में एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि ‘यदि मैंने शोले की होती तो भारतीय सिनेमा अमजद खान जैसे एक अद्भुत कलाकार को खो देता.’

डाकू गब्बर सिंह की कल्पना उस खाकी वर्दी के बिना नहीं की जा सकती. वो खाकी वर्दी किसी कॉस्ट्यूम डिजाइनर ने नहीं, बल्कि खुद अमजद खान ने सुझाई थी जिसे वे मुंबई के चोर बाजार से खरीदकर लाए थे.

शोले से पहले अमजद दो फिल्मों में असिस्ट कर चुके थे. ‘हिंदुस्तान की कसम’ में काम भी कर चुके थे. लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली थी. इसके बाद ही रमेश सिप्पी ने अमजद खान को शोले में लॉन्च किया था. यह लॉन्चिंग ऐसी रही कि शोले और गब्बर एक दूसरे के पर्याय बन गए. डाकू गब्बर सिंह की कल्पना उस खाकी वर्दी के बिना नहीं की जा सकती. वो खाकी वर्दी किसी कॉस्ट्यूम डिजाइनर ने नहीं, बल्कि खुद अमजद खान ने सुझाई थी जिसे वे मुंबई के चोर बाजार से खरीदकर लाए थे.

गब्बर हिंदी सिनेमा का पहला खलनायक था जिसने नायक-सी लोकप्रियता हासिल की. तभी तो ब्रिटैनिया ने गब्बर को अपने ग्लूकोज बिस्किट के विज्ञापन के लिए चुना. यह विज्ञापन ‘गब्बर की असली पसंद’ की पंचलाइन के साथ लोकप्रिय हुआ था. भारतीय समाज में यह पहली बार था जब किसी कंपनी ने अपने प्रोडक्ट के प्रचार के लिए किसी खलनायक को चुना था. हालांकि कई मानते हैं कि शोले का असली खलनायक तो ठाकुर था. जिसने अपने आदमी खड़े किए और अंत में गब्बर को मरवा दिया.

अमजद ने ‘चोर सिपाही’ और ‘अमीर गरीब आदमी’ नाम की दो फिल्मों का निर्देशन भी किया. लेकिन दूसरी फिल्म नहीं चली तो दोबारा निर्देशन में हाथ नहीं डाला. जब तक जिये गब्बर बनकर ही जिये और इस किरदार को इस कदर अमर कर गए कि गब्बर की चमक आज भी कायम है. तभी तो चार दशक बाद ‘गब्बर’ (अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म) वैसी ही दाढ़ी के साथ लौटता है और उस दौर के खलनायक का नाम इस दौर के नायक को दे दिया जाता है. गोया उस दौर का वह नायक ही हो.

ब्रिटानिया ने गब्बर को अपने ग्लूकोज बिस्किट के विज्ञापन के लिए चुना. भारतीय समाज में यह पहली बार था जब किसी कंपनी ने अपने प्रोडक्ट के प्रचार के लिए किसी खलनायक को चुना था.

फिल्मी पर्दे का यह दुर्दांत खलनायक असल जिंदगी में कैसा था, इसे शायद यह किस्सा सबसे अच्छी तरह बयां करता है. यह 1980 के दशक की बात है. शोले हिट हो चुकी थी और अमजद खान शिखर पर थे. उसी दौर में उन्होंने एक ऐसी फिल्म साइन की जिसमें उस वक्त के तमाम बड़े स्टार थे. फिल्म एक बड़े प्रोड्यूसर की थी. लेकिन डायरेक्टर की यह पहली फिल्म थी तो जिसका अंदेशा था वही हो रहा था. सारे स्टार सेट घंटों लेट आते. अपने डॉयलॉग खुद लिखने लगते और कई बार तो स्क्रिप्ट को अंगूठा दिखाते हुए अपने लिए नए सीन भी. मतलब कुल जमा ये कि डायरेक्टर को कोई कुछ समझ ही नहीं रहा था. एक दिन उसका सब्र जवाब दे गया. वह एक कोने में बैठकर सुबकने लगा.

संयोग से अमजद खान की नजर उस पर पड़ गई. उन्होंने माजरा पूछा. डायरेक्टर का कहना था कि बहुत हुआ, उसे नहीं करनी यह फिल्म. अमजद ने उसे ढांढस बंधाया और फिर एक फॉर्मूला सुझाया. उन्होंने कहा कि अगले दिन वे सबसे लेट आएंगे और जैसे ही वे सेट पर पहुंचें, वह उन्हें लेट होने के लिए सबके सामने, बिना हिचके ऊंची आवाज में डांट लगाए. प्लान यह था कि इसके बाद अमजद माफी मांग लेंगे.

यही हुआ. अगले दिन वे बाकी स्टारों के आने के बाद सेट पर पहुंचे. डायरेक्टर भी पूरी तैयारी करके बैठा था. कुछ समय पहले यह किस्सा सुनाते हुए अमजद खान के बेटे शादाब का कहना था कि इसके बाद तो न कोई स्टार लेट हुआ और न ही किसी की स्क्रिप्ट में कोई बदलाव करने की हिम्मत हुई. फिल्म सुपरहिट हुई. वह डायरेक्टर भी बड़ा नाम बना और अमजद खान की दरियादिली उसे हमेशा याद रही.