हाल ही में बिहार से जुड़ा चुनाव सर्वेक्षण गलत होने पर एनडीटीवी के संस्थापक प्रणय रॉय ने दर्शकों से क्षमा मांगी. राजस्थान पत्रिका के संस्थापक कर्पूर चंद कुलिश से जुड़ा इससे भी कुछ आगे का एक वाकया 1984 के लोकसभा चुनावों का है.
एनडीटीवी का चुनावी हिसाब-किताब और विश्लेषण गलत साबित हुआ; चैनल के संस्थापक प्रणय रॉय ने ईमानदारी से उसके लिए विस्तार से सफाई दी और क्षमायाचना की. उससे कोई सहमत हो, चाहे न हो.
मुझे ठीक ऐसा प्रसंग याद आता है इकत्तीस साल पुराना. मैं तब जयपुर में राजस्थान पत्रिका में काम करता था. 1984 के लोकसभा चुनाव में अखबार के संस्थापक-संपादक कर्पूरचन्द कुलिश को उनके एक-दो निकट सहयोगियों ने गुमराह किया कि प्रदेश में कांग्रेस विरोधी लहर चल रही है. जल्द ही कुलिशजी का ऐसा अपना मत प्रकट होने लगा. उनकी धारणा के अनुकूल आकलन भी अखबार में छपने लगे. फिर उन्होंने खुद खुलकर लिखा. कुल मिलाकर अखबार की यह राय जाहिर हुई कि राज्य में सब जगह भाजपा की धूम है. यह कमोबेश वैसा ही उत्साह था, जब 1977 के लोकसभा चुनाव में कुलिशजी ने पहले पन्ने पर लिखा था - "आखिर कांग्रेस जीतेगी तो कहां से?" और कांग्रेस सचमुच 25 में से 24 सीटें हार गई. वह जनता-लहर थी. मगर 1984 के नतीजे कुलिशजी के अनुमान से बिलकुल उलटे निकले: कांग्रेस प्रदेश की हर एक सीट से जीत गई - वह लहर, दरअसल, राजीव गांधी के हक में निकली.
कर्पूरचन्द कुलिश को उनके एक-दो निकट सहयोगियों ने गुमराह किया कि प्रदेश में कांग्रेस विरोधी लहर चल रही है. जल्द ही कुलिशजी का ऐसा अपना मत प्रकट होने लगा.
उस शाम कुलिशजी को मैंने बेहद टूटा हुआ पाया. नतीजों के बाद हम कुछ पत्रकार, हमेशा की तरह, चाय के लिए केसरगढ़ (पत्रिका मुख्यालय) की चहारदीवारी से सटी एक दुकान के स्थाई ठिये पर जा बैठे - दुकान के बाहर कच्चे रास्ते पर रखे छुटके गोल मूढ़ों पर. अचानक हमने देखा - कुलिशजी हमारी ओर चले आ रहे हैं. अपनी रोबदार, भारी काया में. बूढ़े शेर की तरह भारी कदमों से चलते. उन्हें देख हम खड़े हो गए. वे आए और हमारे साथ एक मूढ़े पर बैठ गए. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. हमें उनके भीतर चल रही उथल-पुथल का ठीक से तो अंदाजा नहीं था लेकिन नतीजों पर वे महज हैरान नहीं, विचलित जान पड़ते थे. यह स्वाभाविक भी था. उनका विवेचन सिरे से गलत साबित होने के कारण अखबार की प्रतिष्ठा को गहरा धक्का लगने की आशंका उपस्थित थी.
उनकी बेचैनी का खुलासा सुबह हुआ. जब हम अपने-अपने घरों को लौट गए थे, उन्होंने दफ्तर में बैठकर पहले पन्ने के लिए नाम से संपादकीय लिखा - 'क्षमा'. कोई सफाई नहीं, न कोई कथा-कारण की पेशकश. निश्छल क्षमायाचना. लोगों ने उस संपादकीय के कई अर्थ लगाए, कुछ ने गैर-जरूरी भी कहा. लेकिन कालांतर में उसे उनकी ईमानदारी, साफगोई और साहस ही समझा गया. उन्होंने लिखा था: 'प्रधानमंत्री राजीव गांधी और कांग्रेस (इ) की ओर से लोकसभा के चुनाओं में जो कल्पनातीत उत्साह भारतीय मतदाता ने दिखाया है, उसके सामने तो उदार से उदार सर्वेक्षण के परिणाम भी पीछे रह गए. मुझे अतीव खेद है कि मैं मतदाता के मानस को भांपने में पूरी तरह विफल हुआ. मेरे पास कोई सफाई नहीं है और अपनी विफलता के लिए संपूर्ण विनम्रता के साथ मैं पाठको से क्षमा चाहूंगा. मैं यह विश्वास दिलाना चाहता हूं कि जो चुनाव परिणाम सामने आए हैं,  मुझे (उनकी) कोई कल्पना नहीं थी, वरना मैं छिपाने की तनिक भी चेष्टा नहीं करता. ...'
जब हम अपने-अपने घरों को लौट गए थे, उन्होंने दफ्तर में बैठकर पहले पन्ने के लिए नाम से संपादकीय लिखा - 'क्षमा'. कोई सफाई नहीं, न कोई कथा-कारण की पेशकश. निश्छल क्षमायाचना.
प्रसंगवश, उस चुनाव में राजस्थान पत्रिका में एक सीट (दौसा) का आकलन मैंने भी किया. मैं मुख्यतः उनके साप्ताहिक प्रकाशन इतवारी पत्रिका का काम देखता था, पर कुलिशजी ने दौसा सीट पर लिखने का जिम्मा मुझे सौंपा. वहां (अब दिवंगत) राजेश पायलट और भाजपा के नाथूसिंह में मुकाबला था. अत्यधिक उत्साह में मैं अपनी यज़्दी मोटरसाइकिल पर चुनाव क्षेत्र का बड़ा हिस्सा घूम आया. मुझे साफ अनुभव हुआ कि जीत राजेश पायलट की होगी.
जयपुर लौटकर पत्रिका के साथियों को अपनी अनुभूति जाहिर की तो उन्होंने आगाह किया कि कुलिशजी की लाइन जुदा है. मैं साहस कर उनके सम्मुख पहुंचा, कुछ अफसोस की-सी मुद्रा में. वे सीट का आकलन जानने को उत्सुक थे. मैंने हिम्मत जुटाई और कहा कि वहां तो पायलट ही जीतते लगते हैं! लगा कि उन्हें बड़ी हैरानी हुई. फिर मैंने अपनी यात्रा के कुछ अनुभव बयान किए. उन्होंने अंत में कहा - 'वही लिखो, जो देखा है.'
हरी झंडी पाकर डेस्क पर गया. रपट लिखी. रात के करीब दस बज चुके थे. डेस्क प्रभारी (स्व.) सौभागमलजी ने रपट पढ़कर किंचित आत्मीयता के साथ मुंह बनाया, बोले - अंदर बात हो गई? मैंने कहा - हां! तब उन्होंने खबर वापस मेरे सामने रखते हुए कहा कि अब इसका हैडिंग भी तुम्हीं लगा दो, मैं इसमें नहीं पड़ना चाहता. मैंने शीर्षक खोजने में कुछ वक्त लिया, फिर सांप मरे, लाठी भी न टूटे के अंदाज में लिखकर सुझाया - 'दौसा में पायलट से लोहा लेना पड़ रहा है नाथूसिंह को'. सौभागजी ने मुस्कुराते हुए उसे जस का तक कम्पोज में दे दिया. वह रपट पहले पन्ने पर ऐंकर के रूप में छपी.
वैसे बिहार चुनाव में भी मुझे सर्वेक्षणों के उलट महागठबंधन की महाजीत का कुछ अनुभव तो हो ही रहा था. 29 अक्टूबर को मैंने उसे 175 सीटें मिलने का अंदाजा जताया भी था. लेकिन यह जाति, टिकट, प्रचार, दुष्प्रचार और मित्र पत्रकारों के दौरों, टीवी-अखबारों की खबरों पर आधारित 'गट फीलिंग' ज्यादा थी. दौसा जैसा जन-जन का साक्षात्कार नहीं था! और इस बार के बताने और उसके सही निकलने का अनुभव भी वैसा नहीं था, जैसा 1984 का था.