ऐसी कई वजहें हैं जिनके चलते यूरोप में गैरमुस्लिमों और मुस्लिमों के बीच क्रिया-प्रतिक्रिया का एक लंबा सिलसिला शुरू हो सकता है.
पेरिस में हुए आतंकी हमले ने एक बार फिर दुनिया को हिलाकर रख दिया है. शहर में कम से कम छह जगहों पर हुए इस हमले में 120 से ज्यादा लोगों की मौत की खबर आ रही है. लगभग 200 लोग घायल हुए हैं. फ्रांस में आपातकाल घोषित कर दिया गया है. दूसरे विश्व युद्ध के बाद इसे फ्रांस में सबसे बड़ा हमला बताया जा रहा है. फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने तीखी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कहा है कि अब वे भी इससे बेदर्दी से निपटेंगे. उन्होंने कहा, 'हमें पता है कि इसके पीछे कौन हैं और वे कहां से आए हैं. अब हम भी इसका जवाब उनके लहजे में देंगे.'
देखा जाए तो इस तरह के हमलों ने मुस्लिम और गैर-मुस्लिम जगत को एक बार फिर 'संस्कृतियों के बीच संघर्ष' के कगार पर पहुंचा दिया है. अमेरिकी राजनीतिशास्त्री सैमुएल हंटिग्टन की इस नाम वाली पुस्तक की चाहे जितनी बौद्धिक आलोचना हो, पिछले डेढ़ दशक की घटनाएं उसकी पुष्टि ही करती लगती हैं. 9/11 वाले हवाई हमलों के बाद से अमेरिका पहले ही बौखलाया हुआ था. एक स्वर में बोलने में अक्षम यूरोप भी अब बार-बार हो रहे हमलों के चलते साथ उठ खड़ा होने पर मजबूर हो गया है.
इसका पहला संकेत तो यही है कि वहां मुसलमानों और उनकी मस्जिदों और दुकानों पर हमलों या उनकी धमकियों के मामले बढ़ते जा रहे हैं.
इस हमले की जिम्मेदारी आईएस ने ली है. इससे पहले इसी साल पत्रिका शार्ली एब्दो के दफ्तर पर हुए हमले की जिम्मेदारी भी इसी आतंकी संगठन ने ली थी. फ्रांस सीरिया में आईएस के खिलाफ चल रहे अभियान में अमेरिका का सहयोगी है. कुछ दिन पहले उसने वहां अपना सबसे बड़ा जंगी जहाज भेजने का ऐलान किया था ताकि आईएस के ठिकानों पर बमबारी कर रहे उसके लड़ाकू विमानों को हमला करने में कम समय लगे. माना जा रहा है कि इसके चलते ही आईएस ने फ्रांस पर उसके घर में घुसकर हमला किया है.
लेकिन अब यूरोप में भी जवाबी हमलों की झड़ी लग सकती है. इसका पहला संकेत तो यही है कि वहां मुसलमानों और उनकी मस्जिदों और दुकानों पर हमलों या उन्हें धमकियों देने के मामले बढ़ते जा रहे हैं. स्वीडन में कुछ समय पहले दो मस्जिदों को आग लगा दी गई. वहां के उपसला विश्वविद्यालय में इस्लामी धर्मशास्त्र के प्रोफ़ेसर मोहम्मद फ़ज़लहशमी का एक साक्षात्कार में कहना था, 'हम स्वीडिश समाज में इस्लाम से डर के नतीजे में उपजे शब्दयुद्ध में बढ़ोत्तरी पहले ही देख रहे थे... अब बदले की कार्रवाइयां भी देखनी पड़ सकती हैं.' एक दूसरे बयान में यूरोपीय सरकारों पर ताना कसते हुए नीदरलैंड (हालैंड) की दक्षिणपंथी फ्रीडम पार्टी के सर्वेसर्वा गेर्ट विल्डर्स का कहना था, '(प्रधानमंत्री) रुटे और अन्य पश्चिमी राजनेताओं के आखिर कब पल्ले पड़ेगा कि यह युद्ध है!'
दरअसल पश्चिमी यूरोप के लगभग सभी देशों में लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष संविधानों से बंधी हुई सरकारों और स्थानीय मूल जनता की भावनाओं के बीच खाई चौड़ी होती जा रही है. ऐसे में पेरिस जैसे आतंकवादी हमले आग में घी का ही काम करेंगे.
यूरोप में क्रिया-प्रतिक्रिया की यह प्रक्रिया चलते रहने का एक कारण और भी है. यूरोप के कई देशों के युवा इराक और सीरिया जाकर आईएस के लिए लड़ रहे हैं.
यूरोप में क्रिया-प्रतिक्रिया की यह प्रक्रिया चलते रहने का एक कारण और भी है. यूरोप के कई देशों के युवा इराक और सीरिया जाकर आईएस के लिए लड़ रहे हैं. आशंका है कि ट्रेनिंग के बाद उन्हें वापस भेजकर आईएस उनका इस्तेमाल यूरोप में आतंकी हमलों के लिए कर सकता है. ये आशंकाएं निराधार नहीं हैं. कुछ समय पहले बेल्जियम में एक देशव्यापी आतंकवाद-निरोधी अभियान के तहत एक दर्जन छापे पड़े. वहां वेवियेर नामक स्थान पर पुलिस के साथ मुठभेड़ में दो संदिग्ध इस्लामी आतंकवादी मारे गए जबकि एक को जिंदा गिरफ्तार कर लिया गया. वहां की सरकार का कहना था कि भारी हथियारों से लैस ये तीनों संदिग्ध सीरिया से वापस लौटे थे. वे बेल्जियम के पुलिसकर्मियों को मारने और यहूदी स्कूलों में खून बहाने के लिए पेरिस जैसे आतंकवादी हमलों की तैयारी कर रहे थे. ऐसे ही छापे जर्मनी में भी मारे गए और कई लोगों को गिरफ्तार किया गया जो आईएस  के लिए धन और समर्थन जुटाने का काम कर रहे थे.
जर्मन पुलिस का कहना है कि अकेले बर्लिन में 'सलाफ़ी' कहलाने वाले 570 सुन्नी कट्टरपंथी रहते हैं, जिनमें से 290 हिंसक प्रवृत्ति के हैं. हिंसा पर उतारू इन 'सलाफ़ियों' में 10 प्रतिशत ऐसे जर्मनवंशी मुसलमान नागरिक हैं, जो पहले ईसाई थे. जर्मनी की आंतरिक गुप्तचर सेवा 'संविधान रक्षा कार्यालय' के अध्यक्ष हांस-गेओर्ग मासन का कहना है कि पूरे देश में फैले सलाफि़यों की कुल संख्या जो कुछ साल पहले 2800  थी अब बढ़ कर 7000 का आंकड़ा पार गई है. सवा आठ करोड़ की जनसंख्या वाले जर्मनी के 41 लाख मुसलमानों के बीच सलाफ़ियों व अन्य उग्रवादी मुसलमानों की कुल संख्या 43 हजार से अधिक बताई जा रही है. इनमें से 600 इस समय आईएस के लिए लड़-भिड़ रहे हैं. 300 मामलों में मुकदमे चल रहे हैं या चलाए जाने वाले हैं. जानकारों के मुताबिक जर्मनी में सीरिया से पहुंचते मुस्लिम शरणार्थियों के बाद यह समस्या और बढ़ेगी. अकेले इस साल ही यहां ऐसे शरणार्थियों की तादाद आठ लाख तक हो सकती है.
जर्मन पुलिस का कहना है कि अकेले बर्लिन में 'सलाफ़ी' कहलाने वाले 570 सुन्नी कट्टरपंथी रहते हैं, जिनमें से 290 हिंसक प्रवृत्ति के हैं.
इस्लामी जगत की टालमटोल
क्रिया-प्रतिक्रिया की प्रक्रिया चलते रहने का एक और कारण है. वैसे हर छोटी-बड़ी बात पर फतवा जारी करने के शौकीन इस्लामी जगत के नेता, धर्माधिकारी और बुद्धिजीवी इस्लामवादी आतंकवादी गिरोहों की दोटूक निंदा करने, फ़तवा जारी करने या आतंकवादियों को दंडित करने के प्रश्न पर कुछ करने-धरने से कतराते रहे हैं. वे यह कह कर हाथ झाड़ लेते हैं कि 'आतंकवाद का इस्लाम से कोई संबंध ही नहीं है' या 'आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता.' इस तोतारटंत से लोगों के कान पक गए हैं. उनका यह संदेह पक्का होने लगा है कि इस्लामी जगत मन ही मन आतंकवादियों के साथ है.
हालांकि इस्लामी सोच में अब कुछ आत्मचिंतन भी जरूर आया है, लेकिन पश्चिमी संवेदनाओं के हिसाब से वह काफी नहीं है. इस्लाम के जन्मस्थान सऊदी अरब के सर्वोच्च धर्माधिकारियों को आतंकवाद के विरुद्ध फ़तवा जारी करने में एक दशक से भी ज्यादा का वक्त लग गया. 21 सदस्यों वाली वहां की संबद्ध परिषद ने आईएस के नाम 17 सितंबर 2014 को पहली बार फ़तवा जारी करते हुए कहा था कि आतंकवाद एक घृणित अपराध है. अमेरिका में यदि 9/11 वाले हवाई हमलों को पश्चिमी जगत में इस्लामी आतंकवाद का जन्मदिन माना जाये तो इसके 13 साल बाद आतंकवाद के विरुद्ध यह फ़तवा जारी किया गया था. लेकिन सरकार के विशेष आग्रह पर यह फ़तवा भी इसलिए जारी किया गया, ताकि सऊदी वायुसेना अमेरिकी सहयोग से आईएस के विरुद्ध बमबारी कर सके. सऊदी अरब के महामुफ्ती शेख अब्देल अज़ीज अल शेख संभवतः कोई फतवा जारी करना ही नहीं चाहते थे. जो खुद ही हाथ-पैर काटता और सरेआम सिर कलम करता है, वह दूसरों के इसी काम को ग़लत कैसे ठहराता!
इस्लाम के जन्मस्थान सऊदी अरब के सर्वोच्च धर्माधिकारियों को आतंकवाद के विरुद्ध फ़तवा जारी करने में एक दशक से भी ज्यादा का वक्त लग गया.
'इस्लामी ख़लीफ़त' के विरुद्ध दूसरा उल्लेखनीय फ़तवा इस्लामी धर्मशास्त्र के कई देशों के 120 सुन्नी विद्वानों और इमामों ने 27 सितंबर 2014 को जारी किया था. उस पर मिस्र के महामुफ्ती शेख शवकी अल्लाम, काहिरा के प्रसिद्ध अल अज़हर विश्वविद्यालय के कई विद्वानों, येरुशलम और फ़िलस्तीन के मुफ़्ती, संयुक्त अरब अमीरात, मोरक्को, ट्यूनीसिया, चाड, भारत, पाकिस्तान, सूडान और इंडोनिशिया के धर्मशास्त्रियों तथा इमामों के हस्ताक्षर हैं.
इस 24 सूत्री फ़तवे के अनुसार 'संदेशवाहकों, दूतों और राजनयिकों की हत्या इस्लाम में वर्जित है. इसलिए पत्रकारों और विकास सहायता कर्मियों की हत्या भी वर्जित है.' इसी प्रकार 'जिहाद इस्लाम में आत्मरक्षा का युद्ध है. बिना वैध कारण, वैध लक्ष्य और सही आचरण के वह निषिद्ध है.' अन्य बिंदुओं के अनुसार 'दूसरे धर्मों अनुयायियों को कोई क्षति पहुंचाना, दास-प्रथा को पुनः प्रचलित करना या जबरन धर्मांतरण भी वर्जित है.
यह स्पष्ट फतवा स्वागत-योग्य है, लेकिन यह न केवल बहुत देर से आया है, बल्कि मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग इससे अनजान है. जो लोग मुसलमान नहीं हैं, वे पूछते हैं कि यही बातें अमेरिका में 9/11 वाले हवाई हमलों के बाद डंके की चोट क्यों नहीं कही जा सकीं? आज भी क्या इस्लामी मस्जिदों के इमाम उन्हें अपने भक्तसमाज के सामने रखते हैं? शायद नहीं, वर्ना यूरोप से पांच हज़ार जिहादी आईएस के लिए खून बहाने नहीं जाते. फ्रांस के सात हज़ार यहूदी न तो इसराइल भागते और न 700 यहूदी स्कूलों पर 10 हज़ार फ्रांसीसी सैनिक पहरा दे रहे होते.
टूटता सब्र
इस्लामी आतंकवाद से सबसे अधिक पीड़ित इस्लामी जगत ही है. लेकिन वही इसके प्रति सबसे ज्यादा उदासीनता भी दिखाता है. जर्मनी के म्युंस्टर विश्वविद्यालय में इस्लामी शिक्षाशास्त्र के प्रोफ़ेसर और लेबनान में जन्मे स्वयं एक मुसलमान मौहनाद खोर्शीदी कुछ ऐसा ही मानते हैं. वे कहते हैं, 'यह कहना बकवास है कि इस आतंकवाद का इस्लाम से कोई सरोकार नहीं है. आतंकवादी आखि़रक़ार मुसलमान ही तो हैं.'
'वे झूठ बोलते हैं जब वे कहते हैं कि इस्लाम और इस्लामवाद का एक-दूसरे से कोई संबंध नहीं है या इस्लाम और लोकतंत्र की एक-दूसरे के साथ संगति बैठ सकती है.'
19 वर्षों से वे जर्मनी में रह रहे मिस्री इस्लामशास्त्री हामेद अब्देल समद की 2013 में एक किताब प्रकाशित हुई. 'इस्लामी फ़ासिज्म-एक विश्लेषण' नाम की यह किताब छपते ही उन्हें धमकियां मिलने लगीं. मिस्र में उन्हें मार डालने का एक फ़तवा भी जारी हुआ. अपनी पुस्तक में समद का कहना है कि धार्मिक इस्लाम के धरातल पर एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में इस्लामवाद की शुरुआत इतालवी फ़ासीवाद और जर्मन नाज़ीवाद के लगभग समानांतर 1920 वाले दशक में हुई. उसकी जड़ें आदिकालीन इस्लाम तक जाती हैं. कुरानशरीफ़ अल्लाह के प्रति जिस एकनिष्ठ, आजीवन एवं संपूर्ण समर्पण की मांग करता है, समद के अनुसार, वह सिर्फ एकेश्वरवाद नहीं है बल्कि राजनीतिक संदर्भ में अपने नेता के प्रति फ़ासीवादी असीम निष्ठा की अटल शपथ भी है. यही नहीं, कुरान हर जगह अपने एक से अनुपालन, इस्लाम को सर्वोपरि रखने और काफिरों से घृणा करने का जो आग्रह करती है, वह भी फासीवादी तानाशाही जैसा ही है.
बीते साल एक जर्मन पत्रिका के साथ साक्षात्कार में समद ने, जर्मन इतिहासकारों और राजनेताओं को यह कह कर अपना दुश्मन बना लिया कि 'वे झूठ बोलते हैं जब वे कहते हैं कि इस्लाम और इस्लामवाद का एक-दूसरे से कोई संबंध नहीं है. वे जनता को गुमराह करते हैं, जब वे बार-बार दुहराते हैं कि इस्लाम और लोकतंत्र की एक-दूसरे के साथ संगति बैठ सकती है.' अपने अनुभवों के आधार पर समद का मानना है कि जर्मन व यूरोपीय जनता का बहुमत दक्षिणपंथी या अतिवादी नहीं, पूरी तरह सामान्य है. उनकी चिंताएं पूरी तरह स्वाभाविक हैं. उनका कहना था, 'यूरोप में उग्रवादी मुसलमानों की संख्या 2001 के बाद से दस गुना बढ़ गई है. और भी ख़तरनाक बात यह है कि वे स्कूली बच्चों पर भी डोरे डालने और समाज में फूट पैदा करने लगे हैं.' समद कहते हैं कि इस्लाम में जब तक कुरान को ईश्वर-रचित न कि मनुष्य-लिखित माना जाता रहेगा, जब तक उसकी समय-सापेक्ष व्याख्या असंभव व अस्वीकार्य बनी रहेगी, आतंकवादी पैदा होते रहेंगे.