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अच्छे दिनों की उम्मीद में राजनाथ
वैसे तो राजनाथ सिंह ने उस साझा बयान पर दस्तखत कर दिए जो भाजपा के चार मार्गदर्शकों यानी लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार और यशवंत सिन्हा के साझा बयान के जवाब में जारी किया गया था. लेकिन सुनी-सुनाई बात यह है कि बिहार में भाजपा की करारी हार और उसके बाद जो हो रहा है, उससे राजनाथ सिंह खुश हैं. इसकी कई वजहें बताई जा रही हैं. सबसे पहली तो ये कि राजनाथ इस बात से अंदर ही अंदर खफा चल रहे हैं कि गृह मंत्री होने के बावजूद सरकार और पार्टी में उनकी वह भूमिका नहीं रही, जिसकी वे हकदार हैं. बिहार चुनावों में भी उनकी भूमिका बेहद सीमित रखी गई.
राजनाथ इससे खफा बताए जा रहे हैं कि बिहार चुनावों में भी उनकी भूमिका बेहद सीमित रखी गई.
कई मानते हैं कि बिहार के कुछ इलाकों में राजनाथ सिंह का ठीक-ठाक प्रभाव है. इसकी दो वजहें हैं. एक तो राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश के चंदौली से हैं, जो बिहार से सटा हुआ है. दूसरी वजह यह है कि वे जिस जाति के हैं, उस जाति का कोई बड़ा नेता बिहार में भाजपा के पास है नहीं. इसलिए जिन सीटों पर उनकी जाति के लोग अच्छी संख्या में हैं, वहां उनका ठीक—ठाक प्रभाव माना जाता है. बिहार में उनकी कुछ सभाएं हुईं तो उनमें 15 से 20 हजार लोगों की भीड़ आराम से आने लगी. लेकिन फिर पार्टी ने उनकी सभाओं की संख्या कम कर दी. सुनी-सुनाई बात यह है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की शह पर ही यह निर्णय लिया गया था. राजनाथ इसी बात से खफा चल रहे थे. वैसे उनके पास इस जोड़ी से नाराज होने की कई वजहें पहले से भी रही हैं. इसलिए अभी जो चल रहा है, उससे वे बेहद प्रसन्न हैं. उन्हें यकीन है कि अगर संघ को कभी भी पार्टी या सरकार में किसी वैकल्पिक नेतृत्व पर दांव लगाना होगा तो वे खुद एक मजबूत विकल्प होंगे.
अपनों के बीच बेगाने सा डर
मोदी सरकार के कामकाज को लेकर कई ओर से आलोचना हो रही है. अब आलोचनाएं उस ओर से भी हो रही हैं, जो पहले सरकार की तारीफ करते नहीं थकते थे. इसका खौफ भी मोदी सरकार के मंत्रियों के चेहरे पर दिख रहा है. सुनी-सुनाई यह है कि बीते दिनों कारोबारी जगत के प्रमुख लोगों के एक सम्मेलन से पहले केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली को भारी तनाव में देखा गया. वहां मौजूद लोगों की मानें तो आम तौर पर कॉरपोरेट जगत के लोगों के बीच हंसते-मुस्कुराते हुए बात करने वाले जेटली बहुत चुप—चुप रहे. वहां मौजूद कई लोगों को जेटली की इस चुप्पी का राज समझ नहीं आ रहा था. इसके बाद धीरे—धीरे यह बात खुली कि मंत्री जी सरकार की हर तरफ हो रही आलोचनाओं से इस कदर परेशान हैं कि उन्हें डर लग रहा था कि कहीं इस सम्मेलन में भी कोई सरकार की नीतियों या कामकाज को लेकर कोई टिप्पणी न कर दे. उन्हें यह डर भी सता रहा होगा कि जिस तरह के बेतुके बयान पार्टी के कई नेता दे रहे हैं और उनका बचाव जिस तरह से पार्टी करती दिख रही है, उससे कोई देश का कारोबारी माहौल खराब होने की बात न उठा दे.
परेशान पासवान
रामविलास पासवान की पलटीमार राजनीति के लिए लालू यादव ने उनका नाम 'मौसम विज्ञानी' रखा. बिहार में न सिर्फ भाजपा बल्कि पासवान की लोजपा की भी बुरी गत हुई. पार्टी लड़ी थी 40 सीटों पर, लेकिन जीती सिर्फ तीन पर. ऐसे में सुनी-सुनाई बात यह है कि आने वाले दिनों के​ सियासी मौसम को भांपते हुए, पासवान बेहद परेशान चल रहे हैं. कुछ खबरें ऐसी भी आई हैं कि जिन मंत्रियों की छुट्टी नरेंद्र मोदी अगले फेरबदल में करने वाले हैं, उनमें पासवान का भी नाम है. लेकिन उनकी असल परेशान यह नहीं है. उन्हें मालूम है कि उन्हें एकदम से हटाना तो मोदी के लिए आसान नहीं होगा. क्योंकि भले ही भाजपा को अपने बूते केंद्र में पूर्ण बहुमत हो लेकिन यह दौर गठबंधन राजनीति का है. अंदरखाने चल रही बातों के मुताबिक पासवान की असली चिंता यह है कि उन्हें मोदी कहीं कम महत्वपूर्ण मंत्रालय में न डाल दें. पहले से ही उन्हें जो मंत्रालय मिला है, उसमें वे बेहद खुश नहीं बताए जाते. उन्हें लगता है कि 90 के दशक में ही वे रेल मंत्री होते थे. इस​ लिहाज से मोदी सरकार में उन्हें जो मंत्रालय मिला वह रेलवे के मुकाबले कम महत्व का है. अब अगर यहां से भी उन्हें दूसरी जगह भेजा गया तो उन्हें लगता है कि उनकी 'वरिष्ठता' को काफी आघात पहुंचेगा.