क्या पंजाब फिर से उसी भयावह दौर के मुहाने पर आ खड़ा हुआ है जिससे कुछ दशक पहले वह बड़ी मुश्किलों और कई नरसंहारों के बाद बाहर निकला था?
हर साल दीवाली की रात स्वर्ण मंदिर की खूबसूरती पर चार चांद लग जाते हैं. अमृतसर में बना यह भव्य मंदिर इस दिन दियों, लड़ियों और आतिशबाजी की रोशनी में नहाया हुआ ऐसा मनमोहक दृश्य बनाता है जिसकी खूबसूरती देखते ही बनती है. लेकिन इस दीवाली स्वर्ण मंदिर में न तो त्योहार वाली वह रौनक थी और न ही खुशियों वाला वह माहौल. इसके उलट दीवाली के दिन यहां गुरूद्वारे के भीतर ही तलवारें और काले झंडे लहराए गए.
यह अकेली ऐसी घटना नहीं है जो इन दिनों पंजाब के बिगड़ते माहौल की ओर इशारा कर रही है. पंजाब में बढ़ते तनाव के दर्जनों उदाहरण इन दिनों सामने आ रहे हैं. सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था 'अकाल तख़्त' के मुखिया, जिसे जत्थेदार कहा जाता है, को हटाने की मांग हो रही है. लाखों लोग सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन कर रहे हैं, सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है और दर्जनों पर 'देशद्रोह' का मुकदमा भी दायर किया गया है. 1986 के बाद पहली बार इतने बड़े 'सरबत खालसा' का आयोजन हुआ है जिसमें लगभग पांच लाख लोगों ने भाग लिया. देश के सैकड़ों गुरुद्वारों में इस साल रोशनी से जगमगाती नहीं बल्कि 'काली दीवाली' मनाई गई है. सिखों के इस बढ़ते असंतोष के बीच कट्टरपंथी ताकतें मजबूत हो रही हैं और खालिस्तान की मांग के दबे हुए अंगारे भी तेजी से सुलगते नज़र आ रहे हैं.
लाखों लोग सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन कर रहे हैं, सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है और दर्जनों पर 'देशद्रोह' का मुकदमा भी दायर किया गया है.
सवाल उठता है कि क्या पंजाब फिर से उसी भयावह दौर के मुहाने पर आ खड़ा हुआ है जिससे वह कुछ दशक पहले बड़ी मुश्किलों और कई नरसंहारों के बाद वह बाहर निकला था? जवाब तलाशने के लिए पंजाब की वर्तमान स्थिति को क्रमबद्ध तरीके से समझते हैं.
इसी साल जून में फरीदकोट के एक गांव में बने गुरूद्वारे से 'गुरु ग्रंथ साहिब' के चोरी होने की खबर सामने आई थी. इस घटना के कुछ समय बाद ही बरगारी नाम के एक गांव में सिखों की धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाले कुछ पोस्टर लगे देखे गए. इसी गांव में 12 अक्टूबर को कुछ फटे हुए पन्ने भी मिले. सिखों के अनुसार यह पन्ने उसी पवित्र ग्रंथ के थे जिसे कुछ समय पहले गुरूद्वारे से चोरी किया गया था. बरगारी गांव के आस-पास के इलाकों में विरोध प्रदर्शन शुरू होने लगे और उन लोगों की गिरफ्तारी की मांग हुई जो 'गुरु ग्रंथ साहिब' की 'बेअदबी' के जिम्मेदार थे.
14 अक्टूबर के दिन बरगारी के पास के ही एक गांव में प्रदर्शनकारियों ने सड़क जाम कर दी थी. इन्हें हटाने के लिए पुलिस ने पहले तो लाठी चार्ज किया लेकिन जब बवाल ज्यादा बढ़ने लगा तो पुलिस ने फायरिंग शुरू की. इसमें दो सिख प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए. इस घटना ने प्रदर्शनकारियों को और भी भड़का दिया और देखते ही देखते पूरे राज्य में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. इस बीच कुछ अन्य जगहों से भी 'गुरु ग्रंथ साहिब' की 'बेअदबी' की घटनाएं सामने आई जिसके चलते विरोध प्रदर्शन लगातार तेज ही होते चले गए. पिछले कई दशकों में यह पहली ही बार था जब ऐसी किसी घटना के लिए पूरे राज्य में प्रदर्शन होने लगे थे.
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाए कि 'पवित्र ग्रंथ' की बेअदबी के पीछे राम रहीम के समर्थकों का हाथ है जिन्हें हाल में 'ईशनिंदा' के आरोपों के मामले में माफी दी गई.
प्रदर्शनकारियों ने यह भी आरोप लगाए कि 'पवित्र ग्रंथ' की बेअदबी के पीछे डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरु राम रहीम के समर्थकों का हाथ है. उनका कहना था कि हाल में गुरु राम रहीम को 'ईशनिंदा' के आरोपों में जो माफ़ी दी गई है उससे उनके समर्थकों का दुस्साहस बढ़ गया है. दरअसल साल 2007 में गुरु राम रहीम पर आरोप लगे थे कि उन्होंने सिख गुरु गोविंद सिंह की नक़ल की थी. इस मामले में गुरु राम रहीम पर पुलिस केस भी दर्ज हुआ था लेकिन 2012 में हुए विधान सभा चुनावों से ठीक पहले पुलिस ने इस मामले अंतिम रिपोर्ट दाखिल करते हुए उन्हें दोषमुक्त कर दिया था. इसके बावजूद भी सिख समुदाय का गुरु राम रहीम के प्रति रोष बरकरार ही था और अकाल तख़्त ने उन्हें दोषमुक्त नहीं किया था.
बीती 24 सितम्बर को अचानक ही सिख धर्मगुरुओं ने गुरु राम रहीम को माफ़ी देने की घोषणा कर दी. यह फैसला लाखों सिखों के लिए चौंकाने वाला था और उन्होंने इसका जमकर विरोध भी किया. हालांकि अकाली दल के नेताओं ने सफाई देते हुए कहा कि इस फैसले में उनका कोई हाथ नहीं है लेकिन आम धारणा यही है कि राजनीतिक कारणों के चलते अकाली दल के कहने पर ही यह फैसला लिया गया है. लगभग एक साल बाद पंजाब में विधान सभा चुनाव होने हैं. ऐसे में कई लोगों का मानना है कि डेरा सच्चा सौदा के लाखों समर्थकों के वोट पाने के लिए अकाली दल ने 'शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति' (एसजीपीसी) के जरिये यह फैसला करवाया है. एसजीपीसी पर अकाली दल का काफी प्रभाव माना जाता है और एसजीपीसी ही सिखों के जत्थेदारों का चयन करती है. इसे सिखों की संसद के रूप में भी जाना जाता है.
गुरु राम रहीम को माफ़ी देने के फैसले का विरोध इतना व्यापक हुआ कि समिति को 16 अक्टूबर को यह फैसला वापस लेना पड़ा. सिख इतिहास में ऐसा पहली बार ही हुआ था लेकिन अब तक काफी देर हो चुकी थी. इस घटना ने लोगों में मौजूदा जत्थेदारों के प्रति आक्रोश भर दिया था और इसलिए उनका विरोध जारी ही रहा. साथ ही इससे कई कट्टरपंथी ताकतों को भी बल मिल गया. शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) के नेता सिमरनजीत सिंह मान और यूनाइटेड अकाली दल के मोहकम सिंह की पहल पर 10 नवम्बर को अमृतसर के पास 'सरबत खालसा' आयोजित करने की घोषणा कर दी गई. इन दोनों ही नेताओं को खालिस्तान समर्थक माना जाता है. मोहकम सिंह तो उस 'दमदमी टकसाल' के प्रवक्ता भी रह चुके हैं जिसकी कमान कभी जरनैल सिंह भिंडरावाले के पास हुआ करती थी.
कई लोगों का मानना है कि डेरा सच्चा सौदा के लाखों समर्थकों के वोट पाने के लिए अकाली दल ने 'शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति' (एसजीपीसी) के जरिये यह फैसला करवाया है.
'सरबत खालसा' सिखों की सबसे बड़ी धार्मिक सभा को कहा जाता है. इसकी शुरुआत 18वीं सदी में सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविन्द सिंह की मृत्यु के बाद उन राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक मुद्दों पर चर्चा करने के लिए की गई थी जो समुदाय के लिए बेहद महत्वपूर्ण हों. ऐतिहासिक तौर से युद्ध की नीति बनाने के लिए ही 'सरबत खालसा' का आयोजन होता रहा है लेकिन 1920 में गुरुद्वारों के प्रबंधन के लिए भी ऐसा आयोजन किया गया था. इसके बाद ही एसजीपीसी का गठन हुआ था. बीती 10 नवम्बर को हुए 'सरबत खालसा' से पहले से 26 जनवरी 1986 के दिन इस तरह का आयोजन किया गया था जिसमें अकाल तख़्त पर कार सेवा की चर्चा हुई थी जो कि 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' में खंडित हो गया था.
बीती 10 नवम्बर को हुए 'सरबत खालसा' में भटिंडा के याग्वेंद्र सिंह बरार भी शामिल हुए थे. उनके अनुसार इस आयोजन में लगभग पांच लाख लोगों ने भाग लिया था. इस 'सरबत खालसा' में कुल 13 प्रस्ताव पारित किये गए. इन प्रस्तावों में उन तीन जत्थेदारों को 'बर्खास्त' करना भी शामिल था जिन्होंने गुरु राम रहीम को माफ़ी देने का फैसला लिया था. इसके साथ ही पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के जुर्म में चंडीगढ़ जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे जगतार सिंह हवारा को अकाल तख़्त का जत्थेदार बनाने का प्रस्ताव पारित भी किया गया. यही नहीं, पंजाब के मौजूदा मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को अकाल तख़्त द्वारा दिए गए 'फक्र-ए-कौम' और 'पंथ रत्न' रद्द करने का प्रस्ताव भी इसी 'सरबत खालसा' में पारित किया गया.
इसी 'सरबत खालसा' में पंजाब के मौजूदा मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को अकाल तख़्त द्वारा दिए गए 'फक्र-ए-कौम' और 'पंथ रत्न' जैसे सम्मान रद्द करने का प्रस्ताव भी पारित किया गया.
एसजीपीसी द्वारा इस 'सरबत खालसा' के आयोजन को सिख धर्म के सिद्धांतों के खिलाफ बताया जा रहा है. इस आयोजन के बाद कई लोगों को गिरफ्तार भी कर लिया गया है और कइयों पर देशद्रोह के आरोप भी लगाए गए हैं. याग्वेंद्र सिंह बरार बताते हैं, 'मेरे पिता सरदार गुरजीत सिंह को 12 नवम्बर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. पंजाब से लगभग सौ लोगों को 'सरबत खालसा' का आयोजन करने के चलते पुलिस ने गिरफ्तार किया है. लेकिन पूरा सिख समुदाय उन लोगों के साथ है.'
बीते कुछ समय से पंजाब में सत्ताधारी अकाली दल पर भी चरमपंथियों को बढ़ावा देने के आरोप लग रहे हैं. कभी इंदिरा गांधी के हत्यारों के परिजनों को सम्मानित करना तो कभी चरमपंथी देविंदर पल सिंह भुल्लर और गुरदीप सिंह खेड़ा को दिल्ली व कर्नाटक की जेलों से पंजाब की जेलों में लाना, इसके उदाहरण भी हैं. सरकार के इन फैसलों से कट्टरपंथी ताकतें मजबूत ही हुई हैं. लेकिन हालिया 'सरबत खालसा' के आयोजन ने चरमपंथियों के ध्रुवीकरण का बेहतर विकल्प भी तैयार कर दिया है. 'सरबत खालसा' के आयोजक अब अकाली दल के समानांतर नेतृत्व के रूप में सामने हैं और अधिकाशं लोग भी उनके साथ ही नज़र आ रहे हैं. कई जानकारों का मानना है कि इस आयोजन में प्रवासी सिखों और खालिस्तान समर्थकों ने वित्तीय मदद करने के साथ ही इसकी सफलता के भरसक प्रयास किये हैं.
पंजाब में माहौल कुछ हद तक वैसा ही होता नज़र आ रहा है जैसा खालिस्तान आन्दोलन के समय था. हालांकि खालिस्तान की मांग फिलहाल कहीं भी खुले तौर से नहीं हो रही है लेकिन हालिया 'सरबत खालसा' के दौरान ऐसा हुआ भी था. यहां आए कई लोगों ने खालिस्तान समर्थन के नारे लगाए. देश भर की जेलों में कैद खालिस्तानी कट्टरपंथियों की रिहाई की मांग लगातार तेज हो रही है. 'सरबत खालसा' में पारित किये गए उग्र प्रस्तावों का भी एक बड़े वर्ग द्वारा स्वागत किया जा रहा है. ऐसे में जिस तरह पंजाब का धार्मिक माहौल तनावपूर्ण बन रहा है, वह कट्टरपंथियों को ही मजबूत करता नज़र आता है.