1977 में इंदिरा गांधी की सत्ता से विदाई और 1980 में उनकी फिर वापसी की परिस्थितियों पर वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने यह लेख 14 अक्टूबर 2002 को लिखा था. इंदिरा गांधी और उनके भ्रष्टाचारी-तानाशाही प्रतिष्ठान के विरुद्ध आंदोलन तो जेपी ने सन चौहत्तर में छेड़ा, लेकिन जवाहर भाई की इस बेटी से उनका मोहभंग दो साल पहले से हो चला था. चंबल घाटी और बुंदेलखंड में कोई चार सौ डाकुओं के समर्पण में इंदिरा गांधी, उनके गृह मंत्रालय, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की कांग्रेस सरकारों ने जेपी के प्रयोग में पूरा सहयोग दिया था. हालांकि उसका अंत सर्वोदय कार्यकर्ताओं से मध्य प्रदेश पुलिस की अशोभनीय होड़ के कारण खटास में हुआ था.

फिर भी इंदिरा गांधी चाहती थीं कि डाकू समस्या के सभ्य और मानवीय हल की शुरुआत के साथ जेपी देश से मृत्यु दंड समाप्त करने का अभियान भी चलाएं. उनने जेपी को इक्कीस और अट्ठाईस अप्रैल को पत्र लिखकर ऐसा अभियान शुरू करने का आग्रह भी किया था. लेकिन सन चौवन से विनोबा के साथ सर्वोदय में काम करते हुए जेपी ने जनआंदोलन और सरकार के बीच सहयोग का जो रवैय्या अपनाया था वह डाकुओं के समर्पण के इतने सफल प्रयोग के साथ छीजने लगा.

इंदिरा जी ने सन इकहत्तर के मध्यावधि चुनाव में भारी सफलता पाई थी. फिर बांग्लादेश का युद्ध उनने जीता और मार्च बहत्तर में विधान सभाओं के चुनावों में लगभग हर राज्य में कांग्रेस की जीत हुई और इंदिरा जी के चुने व्यक्ति हर जगह मुख्यमंत्री हुए. कांग्रेस इंदिरा जी के पल्लू में बंधी पार्टी हो गई और सर्वोच्च नेता के लिए पूरी और दयनीय वफादारी राजनीतिक व्यवहार की कसौटी बन गई. इंदिरा जी में सत्ता के इस अद्भुत विकेंद्रीकरण से जेपी चिंतित होने लगे. कांग्रेस के ही नेता उन्हें आकर बताते थे कि किस तरह पार्टी में पैसा इकट्ठा किया जा रहा है, कैसा अनाप-शनाप खर्च होता है और नीचे से लेकर ऊपर तक कितना भ्रष्टाचार है, जेपी ने देश के सोचने-समझने वालों की एक बैठक कर्नाटक के टिप्पुमुंडहल्ली नाम के हिल स्टेशन पर बुलाई. वहीं एक साप्ताहिक अखबार निकालने का भी तय हुआ जो बाद में एवरीमेन्स के नाम से दिल्ली में निकला.

उत्तर प्रदेश और ओडीशा के विधानसभा चुनावों के लिए चार करोड़ रुपए इकट्ठे किए गए. इससे जेपी इतने चिंतित हुए कि इंदिरा जी से मिलने गए और कहा कि कांग्रेस अगर इतने पैसे इकट्ठे करेगी और एक-एक चुनाव में लाखों रुपया खर्च किया जाएगा तो लोकतंत्र का मतलब क्या रह जाएगा. सिर्फ वही चुनाव लड़ सकेगा जिसके पास धनबल और बाहुबल होगा. मामूली आदमी के लिए तो कोई गुंजाइश रहेगी नहीं.

जेपी के दिए गए वर्णन के अनुसार ही इंदिरा जी इस बातचीत के दौरान नाखूनों से मैल निकालतीं और उन्हें काटती रहीं. फिर कहा-जेपी कहां से ये गलत-सलत जानकारी आपको मिलती है? हमने कोई चार करोड़ रुपए इकट्ठे नहीं किए. वहां के नेताओं-नंदिनी शतपथी और हेमवती नंदन बहुगुणा-ने क्या किया मुझे मालूम नहीं. लेकिन भ्रष्टाचार की ये सब गलत रपटें आप तक आती हैं. इंदिरा जी के रवैये से जेपी बहुत दुखी और बहुत गुस्से में आ गए लेकिन किया कुछ नहीं. प्रभावती के कैंसर से निधन के बाद जेपी बहुत अकेले हो गए. चिड़े-चिड़ी का घोंसला उजड़ जाने से और अकेलेपन की पीड़ा से उबरने में जेपी को लगभग एक साल लग गया. जेपी से ज्यादा प्रभावती इंदिरा को अपनी बेटी मानती थीं. वे उनकी सहेली कमला नेहरू की इकलौती बेटी थीं. प्रभावती रहतीं तो जेपी आंदोलन शुरू नहीं कर सकते थे.

दिसंबर तिहत्तर में जेपी ने ‘यूथ फॉर डेमोक्रेसी’ नाम का संगठन बनाया और देश-भर के युवाओं से अपील की वे लोकतंत्र की रक्षा में आगे आएं. गुजरात के छात्रों ने जब जनवरी चौहत्तर में चिमनभाई पटेल की भ्रष्टाचारी सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू किया तो जेपी वहां गए और उस नवनिर्माण आंदोलन का समर्थन किया. जेपी ने कहा कि उन्हें क्षितिज पर सन बयालीस दिखाई दे रहा है.

मार्च में पटना में छात्रों ने आंदोलन की शुरुआत की. यह शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक रहेगा, इस शर्त पर जेपी ने उसकी अगुवाई करना मंजूर किया. यही बिहार आंदोलन और बाद में जेपी के कारण संपूर्ण क्रांति आंदोलन बना. सालभर में आंदोलन बिहार के गांव-गांव में फैल गया. संघर्ष समितियां बनीं, जनता सरकारें बनीं. इंदिरा गांधी बिहार सरकार को डिसमिस करने को तैयार थीं लेकिन विधानसभा भंग करके ने चुनाव करवाने को उनने असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक करार दिया.

संघर्ष बढ़ता गया. जून पचहत्तर में गुजरात में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस हार गई, जनता पक्ष जीता. उसी दिन इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया. जेपी आंदोलन में शामिल विपक्ष ने इंदिरा गांधी से इस्तीफा मांगा. जेपी ने विपक्ष की मांग का समर्थन किया. देश में जो सरकार विरोधी माहौल बना और इंदिरा गांधी का सत्ता में रहना मुश्किल होने लगा तो उनने इमरजेंसी लगाई, सेंसरशिप लागू की, जेपी समेत सभी नेताओं को गिरफ्तार किया. विरोध न हो इसलिए कार्यकर्ता भी पकड़े गए. उत्तर भारत में संजय गांधी ने नसबंदी और गंदी बस्तियां हटाने की मुहिम शुरू की.

इमरजेंसी के उन्नीस महीने देश में काले महीने हो गए. फिर इंदिरा गांधी ने अपने किए पर जनादेश पाने के लिए आम चुनाव की घोषणा की. गुर्दे खराब हो जाने के कारण डायलिसिस पर जीते जेपी ने चुनाव की चुनौती मंजूर की. मार्च सतहत्तर के चुनाव में उत्तर भारत से कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया. इंदिरा और संजय गांधी दोनों चुनाव हार गए. यह पांच साल से चल रहे जेपी के इंदिरा विरोध का नतीजा था. जेपी को विश्वास हो गया था कि इंदिरा गांधी सारी सत्ता अपने हाथों में लेकर देश में संवैधानिक तानाशाही कायम करना चाहती हैं.

इंदिरा गांधी से उनका संघर्ष लोकतंत्र के लिए किया गया संघर्ष था. जेपी की नैतिक शक्ति और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान ने उन्हें वह अवसर दिया था कि वे इंदिरा गांधी और उनकी राज्य शक्ति को पराजित कर सकें. जेपी का आंदोलन नहीं होता तो विपक्ष एक नहीं होता और जेपी चुनाव अभियान की अगुवाई नहीं करते तो इंदिरा गांधी और उनकी कांग्रेस हारती नहीं. इंदिरा गांधी ने इस्तीफा दिया और जेपी के चुने गए मोरारजी देसाई ने चौबीस मार्च सतहत्तर को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली.

उसी शाम दिल्ली के रामलीला मैदान में जनता गठजोड़ की तरफ से विजय रैली रखी गई थी. जनता के सभी विजयी नेताओं के अलावा जेपी भी उस सभा को संबोधित करने वाले थे. लेकिन अपनी राजनीतिक विजय के सबसे बड़े दिन जेपी विजय रैली में भाषण देने नहीं गए. यह वही रामलीला मैदान था जहां पच्चीस जून को भाषण देने के बाद जेपी को गिरफ्तार किया गया था. यहीं फरवरी सतहत्तर में जेपी ने जनता के चुनाव अभियान की शुरुआत की थी. अब इसी रामलीला मैदान में जनता का विजयोत्सव मनाया जा रहा था. लेकिन जेपी वहां नहीं गए. वे गांधी शांति प्रतिष्ठान के अपने कमरे से निकलकर सफदरजंग रोड की एक नंबर की कोठी में गए जहां पराजित इंदिरा गांधी रहती थीं. जैसे महाभारत के बाद भीष्म पितामह गांधारी से मिलने गए हों. इंदिरा गांधी के साथ उनके सिर्फ एक सहयोगी एचवाई शारदा प्रसाद थे और जेपी के साथ गांधी शांति प्रतिष्ठान के मंत्री राधाकृष्ण और मैं. अद्भुत मिलना था वह. मिलकर इंदिरा गांधी रोईं और जेपी भी रोए.

जेपी के बिना इंदिरा गांधी पराजित नहीं हो सकती थीं और जेपी उनसे संघर्ष नहीं करते तो देश में लोकतंत्र बच नहीं सकता था. लेकिन जेपी अपनी विजय पर हुंकार भरने के बजाय अपनी पराजित बेटी के साथ बैठकर रो रहे थे. ऐसा महाभारत लड़नेवाले एक ही कुल के दो योद्धा कर सकते थे. उस वक्त और आज की राजनीति में दो नेता तो ऐसा नहीं कर सकते. जेपी के लिए वे बेटी इंदु थी भले ही उनके खिलाफ जेपी ने आंदोलन चलाया और चुनाव अभियान की अगुवाई की. निजीतौर पर इंदिरा गांधी भी जेपी को अपना चाचा मानती रहीं लेकिन राजनीतिक लड़ाई उनने भी आखिरी दम तक लड़ी ही.

जेपी ने जैसे बेटी से पूछते हैं - इंदिरा जी से पूछा कि सत्ता के बाहर, अब काम कैसे चलेगा? घरखर्च कैसे निकलेगा? इंदिरा जी ने कहा कि घर का खर्च तो निकल आएगा. पापू (जवाहरलाल नेहरू) की किताबों की रॉयल्टी आ जाती है. लेकिन मुझे डर है कि ये लोग मेरे साथ बदला निकालेंगे. जेपी को यह बात इतनी गड़ गई शांति प्रतिष्ठान लौटते ही उनने उसी दिन प्रधानमंत्री बने मोरारजी देसाई को पत्र लिखा. कहा कि लोकहित में इंदिरा शासन की ज्यादतियों पर जो भी करना हो जरूर कीजिए लेकिन इंदिरा गांधी पर बदले की कोई कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए. सबेरे जेपी विमान से पटना गए लेकिन वहां उनका डायलिसिस बिगड़ा तो वायुसेना के विमान से उन्हें मुंबई और जसलोक अस्पताल भेजा गया.

लेकिन इंदिरा गांधी पर जेपी की सलाह न मोरारजी देसाई को ठीक न लगी, न उनके गृहमंत्री चौधरी चरणसिंह को. इंदिरा गांधी को उनने पराजित तो कर दिया था और वे सत्ता से बाहर भी हो गई थीं लेकिन सभी बड़े जनता नेताओं के मन में इंदिरा गांधी का खौफ समाया हुआ था. वे उनकी राजनीतिक खुराफात करने की अपार क्षमता से डरे हुए थे. वे सत्ता में थे लेकिन सहमे हुए थे और उन्हें लगता था कि इंदिरा गांधी न जाने कब और कैसे उनसे सत्ता छीन लेंगी.

एक किस्सा आपको बताता हूं. पराजित होने के कोई दो-तीन महीने बाद इंदिरा गांधी अपने पहले सार्वजनिक कार्यक्रम में नई दिल्ली के कमानी सभागृह में भाषण देने आईं. चूंकि पराजय के बाद उनका यह पहला कार्यक्रम था प्रेस उसमें अच्छी संख्या में कवर करने को आई थी. दूसरे दिन दिल्ली के सभी अखबारों में पहले पेज पर उनकी फोटू और उनका भाषण काफी महत्व के साथ छापा गया था. बिहार आंदोलन और इमरजेंसी में उनका विरोध करने वाले इंडियन एक्सप्रेस के पहले पेज पर भी इंदिरा गांधी का फोटू और भाषण छपा था.

रामनाथ गोयनका जब दिल्ली में होते तो गेस्ट हाऊस में सभी संपादकों के साथ लंच खाया करते थे. उस दिन भी लंच चल रहा था कि फोन आया. प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई का था और वे रामनाथ गोयनका से बात करना चाहते थे. भोजन करते हाथ से ही रामनाथ जी फोन लिया. मोरारजी शिकायत कर रहे थे कि यह क्या एक्सप्रेस में पहले पेज पर इंदिरा गांधी का इतना बड़ा फोटू और भाषण छापा गया है. अगर आप लोग ही उनको इस तरह की पब्लिसिटी देने लगे तो उनकी तो जनता में फिर मान्यता हो जाएगी. रामनाथ जी ने मोरारजी को कहा कि उनकी तो संपादकों पर कुछ चलती नहीं है और आप जानते ही हैं कि मैं कोई दखल नहीं देता. ये मुलगावकर यहीं बैठे हैं इनसे आप बात कीजिए. फोन उनने मुलगावकर दे दिया जो मार्च में ही इंडियन एक्सप्रेस के फिर प्रधान संपादक हो गए थे. मुलगावकर की मोरारजी से बात चल ही रही थी कि उन्हें उंगली गड़ाकर हाथ के इशारे से रामनाथ जी ने कहा कि बात करके फोन मुझे फिर देना. मुलगावकर ने उन्हें दे दिया. रामनाथ जी ने पूरी टेबल सुन सके इतनी जोर से मोरारजी को कहा – एक बात मुझे भी कहना है मोरारजी भाई – जनखों के हिमायती मारे जाते हैं और फोन रख दिया.

मोरारजी की शिकायत से रामनाथ गोयनका को ही नहीं हम सबको भी लगा था कि उन्हें डर है कि ऐसी पब्लिसिटी मिलती रही तो इंदिरा गांधी तो फिर प्रतिष्ठित हो जाएंगी और उनकी वापसी को कौन रोक सकेगा. इसीलिए जब बिहार के बेलची गांव में दलितों पर हिंसा हुई और इंदिरा गांधी वहां जाने के लिए निकलीं और बिहार में जैसा उनका स्वागत हुआ उससे छह महीने पहले ही चुनी गई जनता सरकार दहल गई.

चरणसिंह को लगा कि अब भी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई तो और समय निकलने के बाद तो इमरजेंसी थोपने और भ्रष्टाचार करने जैसे ‘अपराधों’ पर कोई कार्रवाई हो ही नहीं सकेगी क्योंकि जनता उनकी तरफ हो चुकी होगी. इसलिए तीन अक्तूबर सतहत्तर को सीबीआई उन्हें भ्रष्टाचार निरोधक कानून के अंतर्गत गिरफ्तार करने पहुंची. इंदिरा गांधी ने वो नाटक किया कि सीबीआई तो ठीक राजनेता भी दंग रह गए. उनने अपने हाथ आगे कर दिए और कहा कि पकड़ने आए हो तो लगाओ हथकड़ी, लगाओ. सीबीआई के पुलिसवाले इसके लिए तैयार नहीं थे. वे किसी तरह उन्हें गाड़ी में बैठाकर दिल्ली के बाहर ले जाने लगे. इंदिरा गांधी अड़ गईं. वे गाड़ी से उतरकर पुलिया पर बैठ गईं और कहा कि मुझे आप दिल्ली से बाहर नहीं ले जा सकते. किसी तरह उन्हें घुमाफिरा कर सीबीआई वाले पुलिस लाइंस ले गए और वहां अफसरों की मेस में उन्हें एक कमरे में रखा गया. उनने जमानत पर छूटने से इनकार कर दिया. दूसरे दिन दिल्ली के चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के सामने उन्हें लाया गया. सीबीआई ने उन्हें न्यायिक हिरासत में रखने की मांग नहीं की. मजिस्ट्रेट दयाल ने इंदिरा गांधी को बिना शर्त रिहा कर दिया.

इस तरह इंदिरा गांधी को पकड़ने, जेल भेजने और सजा देने की जनता सरकार की कोशिश नौटंकी में समाप्त हुई. इंदिरा गांधी ने बहुत चतुराई से इसका पूरा लाभ लिया. उनने इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई कहा. चरणसिंह और मोरारजी लाख इनकार करते रहे लोगों ने वही माना जो इंदिरा गांधी ने कहा था. जेपी ने कहा था कि बदले की कार्रवाई मत करना. मोरारजी और चरणसिंह ने वही करके इंदिरा गांधी की वापसी का रास्ता तैयार किया.