2014 के लोकसभा चुनावों के बाद पस्त पड़ी कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी को बिहार विधानसभा के नतीजे क्या नई ऊर्जा दे पाएंगे
आजादी के बाद लंबे समय तक बिहार की सत्ता में काबिज रही कांग्रेस 2010 के विधानसभा चुनावों में महज चार सीटों पर सिमट गई थी. तब लग रहा था कि राज्य में कांग्रेस खत्म हो गई. पार्टी के पास प्रदेश स्तर पर कोई ऐसा नेता नहीं था जिसकी अपील पूरे सूबे में हो. सांग​ठनिक ढांचा छिन्न-भिन्न होने की बात कही जा रही थी. कहा जा रहा था कि बिहार के लोगों ने कांग्रेस को एक विकल्प के तौर पर देखना बंद कर दिया है. लेकिन राजनीति में कब किसके दिन फिर जाएं, कहा नहीं जा सकता.
कांग्रेस के साथ आज भी बिहार में ये सारी दिक्कतें बनी हुई हैं. इसके बावजूद इस बार के विधानसभा चुनावों में उसे 27 सीटों पर जीत मिली है. वह भी तब जब पार्टी सिर्फ 41 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. यह बात अलग है कि इस बार कांग्रेस बिहार में नीतीश कुमार और लालू यादव के साथ महागठबंधन में चुनाव लड़ी थी. बिहार में यह पिछले तकरीबन 25 सालों में कांग्रेस का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है.
पार्टी में एक मजबूत धड़ा है जो चाहता है कि बिहार के नतीजों का श्रेय राहुल गांधी को देते हुए कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर उनकी ताजपोशी करा दी जाए.
इस जीत से न सिर्फ बिहार में कांग्रेस को संजीवनी मिली है बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी पार्टी में ऊर्जा का संचार होता दिख रहा है. यही वजह है कि जिस दिन बिहार विधानसभा के नतीजे आए तो मीडिया में नीतीश कुमार और लालू यादव से भी पहले कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की प्रतिक्रिया आई. राहुल ने इस नतीजे को केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ मिला जनादेश बताया और कहा कि मोदी सरकार अपना कामकाज सुधारे नहीं तो आने वाले दिनों में ऐसे नतीजे उसे और राज्यों में भी देखने को मिलेंगे.
इसके बाद तो पटना से लेकर दिल्ली तक बिहार में भाजपा की करारी हार के लिए राहुल गांधी को श्रेय देने का सिलसिला शुरू हो गया. बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष अशोक चौधरी ने कहा कि महागठबंधन के नेता नीतीश कुमार थे लेकिन इस गठजोड़ को आकार देने में राहुल गांधी की सबसे अहम भूमिका थी. यही बात राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले कांग्रेस महा​सचिव सीपी जोशी और संजय निरूपम ने भी दोहराई. शकील अहमद ने भी महागठबंधन का श्रेय राहुल गांधी को दिया और यहां तक कहा कि अगर राहुल गांधी न सक्रिय हुए होते तो यह महागठबंधन नहीं बन पाता.
हालांकि ऐसा नहीं होता तब भी कांग्रेस के नेता यही कहते लेकिन इस बार उनकी बात गलत नहीं है. दरअसल, जब​ बिहार में भाजपा का मुकाबला करने के लिए जदयू, राजद और कांग्रेस तीनों के एकजुट होने की जरूरत पर बात चल रही थी तब इसमें सबसे बड़ी बाधा थी लालू यादव और नीतीश कुमार का एक साथ आना. शुरुआती दौर में इन दोनों में से कोई भी दूसरे को नेता मानने को तैयार नहीं था. यहीं पर राहुल गांधी की भूमिका अहम बताई जाती है.
सोनिया गांधी के कई सलाहकारों को ऐसा लगता है कि बिहार के नतीजे चाहे कुछ भी रहे हों लेकिन 2016 में जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, वहां कांग्रेस का कुछ होने वाला नहीं है.
सूत्रों की मानें तो राहुल गांधी की ओर से राजद को साफ तौर पर बता दिया गया कि वे या तो नीतीश कुमार को महागठबंधन का नेता मानें या फिर अकेले चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो जाएं. क्योंकि कांग्रेस हर हाल में नीतीश के साथ ही रहेगी. माना जा रहा है कि नीतीश और राहुल की जो मुलाकात दिल्ली में हुई थी, उसके बाद राहुल ने राजद पर दबाव बढ़ा दिया था. इसके बाद ही लालू प्रसाद यादव नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार मानने को तैयार हुए. ऐसा होने के बाद ही लालू यादव ने विष पीने की बात कही थी.
अब यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बिहार के अनुकूल चुनावी नतीजों का कांग्रेस कोई फायदा उठा पाएगी? खबरों के अनुसार कांग्रेस में इसके लिए अंदर ही अंदर तैयारियां तेज हैं. पार्टी में एक मजबूत धड़ा है जो चाहता है कि बिहार के नतीजों का श्रेय राहुल गांधी को देते हुए कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर उनकी ताजपोशी करा दी जाए. इसके संकेत सीपी जोशी के एक बयान से भी मिलते हैं. नतीजों के बाद उन्होंने कांग्रेस मुख्यालय पर पत्रकारों से बातचीत में कहा कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं को यह लगता है कि राहुल गांधी को जल्दी से जल्दी कांग्रेस अध्यक्ष पद संभाल लेना चाहिए.
पार्टी सूत्रों से जो संकेत मिल रहे हैं, उसके मुताबिक आने वाले दिनों में राहुल गांधी को कांग्रेस की बागडोर सौंपने को लेकर आधिकारिक घोषणा हो सकती है. संभव है कि पार्टी इसके लिए कांग्रेस अधिवेशन का वक्त कुछ पहले कर दे. शुरुआती योजना के मुताबिक इसका आयोजन साल के अंत में प्रस्तावित है. इसमें मुख्य तौर पर कांग्रेस कार्यसमिति के उस फैसले पर मुहर लगनी थी जिसके तहत बतौर अध्यक्ष सोनिया गांधी का कार्यकाल और साल भर के लिए बढ़ाया गया है. लेकिन बिहार के नतीजों के बाद शायद कांग्रेस की रणनीति बदल गई है.
पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को लगता है कि बिहार के नतीजों के बाद जो थोड़ा अनुकूल माहौल बना है उसका फायदा उठाते हुए कमान राहुल गांधी के हाथ में सौंप दी जानी चाहिए.
अब पार्टी इस मौके का फायदा उठाकर राहुल को अध्यक्ष बना देने पर एकमत होती दिख रही है. सोनिया गांधी के कई सलाहकारों को ऐसा लगता है कि बिहार के नतीजे चाहे कुछ भी रहे हों लेकिन 2016 में जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, वहां कांग्रेस का कुछ होने वाला नहीं है. पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में कांग्रेस की बुरी हालत है. ले-देकर असम से थोड़ी उम्मीद थी लेकिन जिस तरह से वहां भाजपा ने पार्टी तोड़ दी है, उससे वहां भी स्थितियां आसान नहीं रहीं.
2017 में भी पंजाब और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को मौजूदा स्थितियों के चलते बहुत उम्मीदें नहीं हैं. ऐसे में पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को लगता है कि बिहार के नतीजों के बाद जो थोड़ा अनुकूल माहौल बना है उसका फायदा उठाते हुए कमान राहुल गांधी के हाथ में सौंप दी जानी चाहिए. इन लोगों को यह भी लगता है कि अगर अभी से राहुल को आगे नहीं किया गया तो 2019 को ध्यान में रखकर जो भाजपा विरोधी राजनीति होगी उसके केंद्र में कांग्रेस और राहुल नहीं रह पाएंगे.
माना जा रहा है कि राहुल गांधी की टीम में कौन-कौन लोग होंगे, इसे लेकर पार्टी के अंदर विचार—विमर्श का दौर चल रहा है. यह बात भी चल रही है कि राहुल गांधी अगर आएंगे तो सिर्फ पार्टी का नया अध्यक्ष नहीं मिलेगा बल्कि हर स्तर पर वे अपने हिसाब के लोगों को लाएंगे. कोशिश यही हो रही है कि कोई ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिससे नए और पुराने नेताओं के सामंजस्य से पार्टी आगे की सियासी चुनौतियों को सामना करने के लिए तैयार हो सके.