आमिर खान गलत नहीं हैं. देश में निराशा की धुंध छा रही है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसा कुछ करते नहीं दिख रहे जिससे यह छंटे.
हम जानते हैं कि इस्लाम की उग्रता की भारत में उतनी आलोचना नहीं होती जितनी हिंदू उग्रता की. हम यह भी जानते हैं कि इस्लामिक स्टेट की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से तुलना सीधे-सीधे मूर्खता है. हमें पता है कि इस देश के बुद्धिजीवियों का एक वर्ग नरेंद्र मोदी की हमेशा बुराई करता रहेगा. हम यह भी जानते हैं कि मणिशंकर अय्यर को बहुत पहले राजनीति से रिटायर हो जाना चाहिए था. तो हमें यह भी जानना ही चाहिए कि अपने मन की बात कहने के लिए आमिर खान को पाकिस्तान भेजने की बात करना ठीक नहीं है.
बीते कुछ महीनों से मैं अमेरिका में हूं और भारत में हो रहे जिस बदलाव की आमिर खान ने बात की है, उससे मुझे भी चिंता हुई है. सोशल मीडिया मुझे बता रहा है कि भारत में आज वही सुरक्षित महसूस कर सकता है जो ऊंची जाति का हिंदू पुरुष हो. मैं इसी वर्ग में आता हूं और इसके बावजूद सच कहूं तो मुझे वापस आने में थोड़ा डर लग रहा है.
येल के हर इंस्टीट्यूट ने अपनी बैठकें आयोजित कीं ताकि छात्र बेहिचक अपने अनुभव बता सकें. वहां किसी ने नहीं कहा कि विरोध कर रहे लोगों को अफ्रीका भेज दो.
मैं फिलहाल येल में हूं. अवसरों से भरे इस शहर में 30 फीसदी लोग पढ़ना-लिखना नहीं जानते और यहां भी गरीबी और गंदगी की कमी नहीं है. अपराध दर ऊंची है और हर दूसरे दिन यूनिवर्सिटी पुलिस चीफ हमें किसी न किसी वारदात के बारे में खबर करते रहते हैं. हमले या डकैती की ये घटनाएं कई बार तो ऐसी जगह पर होती हैं जहां से हम कुछ ही मिनट पहले गुजरे थे.
इसके बावजूद प्रशासन अपना काम करता है. ऐसा महसूस होता है कि कोई है जो ऊपर से लगातार हम पर निगाह रख रहा है. हमें बस खतरे का बटन दबाना है और सरकार का कोई आदमी एक मिनट में हमारी मदद के लिए हाजिर हो जाएगा.
येल में जिस जगह मैं रहता हूं उसके पास हाल में हुई नस्लवाद की एक घटना ने तूफान खड़ा कर दिया था. पूरी यूनिवर्सिटी में खूब विरोध प्रदर्शन हुए. लेकिन इस दौरान कभी भी ऐसा नहीं लगा कि उच्च स्तर से इस मुद्दे की अनदेखी हो रही है. येल कॉलेज के डीन ने गुस्से से उबलती अश्वेत छात्रों की भीड़ के साथ कई घंटे बिताए और धैर्य के साथ उनकी शिकायतें सुनीं. येल के हर इंस्टीट्यूट ने अपनी बैठकें आयोजित कीं ताकि छात्र बेहिचक अपने अनुभव बता सकें. वहां किसी ने नहीं कहा कि विरोध कर रहे लोगों को अफ्रीका भेज दो.
इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका में नस्लवाद की समस्या हल हो गई है या कल कोई श्वेत पुलिसकर्मी न्यूयॉर्क में किसी अश्वेत व्यक्ति को बिना जुर्म दबोचेगा नहीं. लेकिन यहां बोलना जुर्म नहीं है. आप बोल सकते हैं, पर्चे लिख सकते हैं और ऐसा नहीं होगा कि इसके लिए राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ सेल्फी खिंचवाकर उसे अपनी डीपी बनाने वाला कोई शख्स आपको ट्विटर या फेसबुक पर गालियां दे या आप पर स्याही फेंक दे या फिर आपके दफ्तर में आकर आपको पीट जाए.
यहां आप बोल सकते हैं, पर्चे लिख सकते हैं और ऐसा नहीं होगा कि राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ सेल्फी खिंचवाकर उसे अपनी डीपी बनाने वाला कोई शख्स आपको इसके लिए गालियां दे
एक मायने में यहां प्रशासन साइकोथेरेपी की तरह है. थेरेपी काम करे या न करे, लेकिन मरीज को यह महसूस होता है कि वह डॉक्टर की निगरानी में है. मरीज कुर्सी पर बैठा है और डॉक्टर उसे बता रहा है, 'हां, मैं आपकी बात सुन रहा हूं.' लेकिन भारत में ऐसा लगता है जैसे कुर्सी पर बैठी सरकार जनता की तरफ पीठ किए हुए है.
सवाल यह है कि आमिर खान ने ऐसा क्या कहा है जिस पर इतना गुस्सा जताया जा रहा है. उन्होंने कहा था कि भारतीय सुरक्षित महसूस करें, इसके लिए जरूरी है कि इंसाफ होता दिखे, कि जब माहौल में असुरक्षा हो तो लोग कोई आश्वस्ति भरी बात सुनने के लिए सरकार के मुखिया की तरफ देखते हैं. आमिर ने कहा कि एक मायूसी का माहौल बन गया है जिसमें लोग निराश महसूस कर रहे हैं.
आमिर खान ने जो कहा है कि उसे महसूस करने के लिए जरूरी नहीं कि आप अल्पसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखते हों. दादरी हो या कोई और मुद्दा, भारत में आज कहां इंसाफ होता दिख रहा है? यह सिर्फ अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की बात नहीं है. किस मुद्दे पर हमने मोदी से आश्वस्त करने वाले शब्द सुने हैं? क्या उन्होंने हरियाणा में अपनी पार्टी के मुख्यमंत्री से कहा कि गाय पर बयानबाजी बंद करें और इस पर ध्यान दें कि साइबर सिटी कहे जाने वाले गुड़गांव में जगह-जगह कीचड़ में लोटते सुअरों को कैसे हटाया जाए? क्या उनकी पार्टी ने उस गरीब ट्रक ड्राइवर के परिवार के लिए सांत्वना के दो शब्द भी कहे जिसे जम्मू-नेशनल हाइवे पर गुंडों ने मार डाला? क्या उन्होंने राजस्थान में अपनी पार्टी की सरकार से पूछा कि उसने एक पाठ्यपुस्तक से सफदर हाशमी की कविता हटाने का फैसला किस आधार पर किया?
यह सच्चाई है कि भारत में आज कइयों के मन में निराशा घर कर गई है और यह मायूसी सिर्फ अल्पसंख्यक समुदाय को नहीं है. मोदी की चुप्पी ने उपद्रवी तत्वों का उत्साह बढ़ा दिया है. वे इस चुप्पी को खामोश स्वीकृति की तरह देख रहे हैं और इंटरनेट से लेकर सड़क तक कहर बरपा रहे हैं.
क्या उन्होंने हरियाणा में अपनी पार्टी के सीएम से कहा कि गाय पर बयानबाजी बंद करके इस पर ध्यान दें कि साइबर सिटी कहे जाने वाले गुड़गांव में जगह-जगह कीचड़ में लोटते सुअरों को कैसे हटाया जाए?
लेकिन इसके इतर एक ऐसी बात भी है जो सिर्फ अल्पसंख्यक समुदाय का कोई सदस्य ही महसूस कर सकता है. बहुसंख्यक समुदाय का कोई सदस्य कितना भी कहे कि वह अल्पसंख्यक समुदाय का डर समझता है, लेकिन सच यह है कि वह इस डर को महसूस नहीं कर सकता. अमेरिका में मेरे एक दोस्त ने मुझे अपनी दादी के बारे में बताया जो मुंबई में रहती हैं और जिन्हें 1992 के दंगों के दौरान पड़ोसी के घर में शरण लेनी पड़ी थी. उनका कहना है कि दादरी की घटना के बाद वे उस दरवाजे को बार-बार चेक करती हैं जिससे वे दो दशक पहले पड़ोस के घर में दाखिल हुई थीं--यह देखने के लिए कि वह तुरंत खुलता है कि नहीं. उन्होंने कोई पुरस्कार नहीं लौटाया है. न ही उन्होंने अपने बेटे से विदेश बसने की बात कही है. लेकिन उन्हें डर लगने लगा है. और यह डर वास्तविक है, चाहे इसका कोई कारण न हो .
भक्तों ने आमिर खान के पोस्टरों पर स्याही पोतने का काम शुरू कर दिया है. कोई पूछेगा कि बाबरी मस्जिद गिरने के बाद उन्हें ऐसा क्यों नहीं लगा. हो सकता है लगा हो, लेकिन हमने उनसे पूछा न हो. हो सकता है तब न लगा हो, लेकिन अब लग रहा हो. हो सकता है उन्होंने सोचा हो कि हालात बेहतर हो जाएंगे. अच्छे दिन आएंगे. हो सकता है कि सोशल मीडिया पर हाल ही में प्रकट हुई एक महिला की माया कोडनानी के साथ सेल्फ़ी-जिसमें उसका चेहरा गर्व से भरा है-से आमिर डर गए हों.
ऐसा नहीं है कि इससे पहले ट्रकों में गायें ले जाते लोगों की हत्याएं नहीं हुईं. या मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान दलित बच्चों को प्रताड़ित करने की घटनाएं नहीं हुईं. लेकिन नरेंद्र मोदी की तरह उन्होंने हमें हॉलीवुड के संवादों से रिझाने का प्रयत्न नहीं किया. आज हमें महसूस हो रहा है कि मोदी के ये तमाम संवाद महज़ छलावा थे.