ग्रीस का आर्थिक संकट यूरोजोन की ऐसी चुनौती बन चुका है जो यूरोपीय इकाई के भविष्य को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर सकता है
यूरोप और पश्चिमी देशों के लिए 1989 का साल प्रतीकात्मक रूप से काफी महत्वपूर्ण रहा है. इस साल बर्लिन की दीवार ढहाई गई और जर्मनी का एकीकरण हुआ. इसपर इन देशों का कहना था कि साम्यवादी विचारधारा की स्थायी पराजय के साथ ही अब इतिहास में एक नए युग की शुरुआत हुई है. यूरोप के एकीकरण की दिशा में जर्मन एकीकरण मील का पत्थर माना जाता है. लेकिन पिछले महीने ग्रीस में आधुनिक यूरोप की पहली अति साम्यवादी झुकाव रखने वाली सरकार के गठन ने इस भविष्यवाणी पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.
यह भी संयोग है कि ग्रीस मूल के ही प्रसिद्ध लेखक और यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में प्रोफेसर कोस्टास डोजिनास पश्चिमी देशों के दावे को चुनौती देते रहे हैं. कई अंतरराष्ट्रीय सेमीनारों में उन्होंने यह बात दोहराई है कि बर्लिन की दीवार ढहना यदि एक नए युग की शुरुआत थी तो यह इतिहास का सबसे छोटा युग साबित होगा. जनवरी, 2015 के चुनाव के जरिए ग्रीस ने प्रधानमंत्री के रूप में 40 वर्षीय सिपरास को चुना है. आर्थिक संकट से जूझ रहे इस देश की जनता ने डोजिनास की बात पर अभी पूरी तरह मोहर तो नहीं लगाई लेकिन राजनीतिक और आर्थिक विश्लेषक इसे यूरोप के लिए बड़े बदलाव का संकेत जरूर मान रहे हैं.
यूरोजोन की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत जर्मनी की चांसलर मर्केल भी कह चुकीं हैं कि ग्रीस को पहले ही राहत दी जा चुकी है और अब कोई गुंजाइश नहीं है
साम्यवादी पार्टी सिरिजा व उसके नेता सिपरास ने चुनाव इसी नारे के साथ लड़ा था कि वे राहत पैकेज के बदले देश का सम्मान गिरवी नहीं रखेंगे. उन्होंने पिछले चार साल से चल रही बजट कटौती से लोगों को राहत देने का वादा भी किया था. ग्रीस पर इस समय तकरीबन 315 अरब यूरो का कर्ज है. इससे निपटने के लिए उसे यूरोपीय केंद्रीय बैंक (ईसीबी), अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और यूरोपीय आयोग से 240 अरब यूरो का राहत पैकेज मिला है. ग्रीस की पिछली सभी सरकारों ने इसके बदले कल्याण कार्यक्रमों में कटौती के प्रस्तावों को स्वीकार किया था. लेकिन सिपरास, सरकार गठन के साथ ही इनमें से कई प्रस्तावों को वापस ले चुके हैं. वे यूरोपीय यूनियन के देशों, खासकर जर्मनी और फ्रांस पर दबाव डाल रहे हैं कि ग्रीस को मिले कर्ज की शर्तों पर दोबारा मोलभाव हो. उधर कर्ज देने वाली संस्थाओं ने ग्रीस को फिलहाल किसी तरह की राहत से इनकार कर दिया है. यूरोजोन की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत जर्मनी की चांसलर मर्केल भी कह चुकीं हैं कि ग्रीस को पहले ही राहत दी जा चुकी है और अब कोई गुंजाइश नहीं है. यूरोजोन अपने गठन के बाद सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है. ग्रीस, उसके कर्जदार और यूरोप के बाकी देशों के बीच आनेवाले दिनों में जो भी समझौता होगा, उसके यूरोप के लिए कई दूरगामी परिणाम हो सकते हैं.
लेकिन इन परिणामों का आकार और प्रभाव समझने से पहले ग्रीस के आर्थिक पतन की कहानी समझना बहुत जरूरी है.
कैसे ढहा ग्रीस और कैसे उभरी सिरिजा
सिरिजा पार्टी के नेता सिपरास अपने समर्थकों के साथ
सिरिजा पार्टी के नेता सिपरास अपने समर्थकों के साथ
ग्रीस में राजनीतिक बदलाव अचानक नहीं हुआ. इसकी शुरुआत 1999 में यूरोजोन (यूरोपीय यूनियन के द्वारा यूरो को एक मुद्रा के रूप में स्वीकार किया जाना) बनने से ही मानी जा सकती है. आर्थिक मॉडल के आधार पर दक्षिण यूरोप (स्पेन, ग्रीस, पुर्तगाल, साइप्रस इत्यादि) के देश अपने उत्तरी बंधु-बांधवों (जर्मनी, बेल्जियम, फ्रांस, नीदरलैंड इत्यादि) से काफी अलग हैं. ये देश सामाजिक कल्याण की मद में तकरीबन उसी अनुपात में खर्च करते हैं जैसे उत्तरी देश करते हैं. लेकिन आर्थिक मजबूती के लिहाज से काफी पीछे हैं. जब इन देशों ने यूरो अपनाया तो ये महाद्वीप के दूसरे बड़े देशों के साथ व्यापार के मुकाबले में पिछड़ने लगे. यहां श्रम की लागत तो बाकी यूरोप की तरह है लेकिन उत्पादन की मात्रा और गुणवत्ता में ये मार खा जाते हैं. इन देशों का सरकारी खर्च यूरोजोन बनने के बाद लगातार बढ़ता गया है. नतीजतन 2008 की वैश्विक मंदी इनके लिए कोढ़ में खाज बनकर आई और ग्रीस इसका पहला शिकार बना.
2004 में देश का कर्ज 167 अरब यूरो तक पहुंच चुका था जो उसकी जीडीपी का तकरीबन 120 फीसदी था. यूरोपीय यूनियन ने इस आधार पर ग्रीस को चेतावनी दे दी
ग्रीस 2001 में यूरोजोन का सदस्य बना था. उस समय भी वह तुर्की के साथ इस इकाई का सबसे गरीब देश था. यूरोजोन का सदस्य बनते ही यूरोप के निवेशकों को यह भ्रम हो गया कि ग्रीस भी उत्तरी यूरोप के बाकी देशों की तरह तेजी से आर्थिक विकास करेगा. उन्होंने यहां भारी निवेश करना शुरू कर दिया. ग्रीस की सरकारों ने भी बिना यह ध्यान दिए कि इस खर्च की भरपाई कैसे होगी, अंधाधुंध खर्च करना शुरू कर दिया. आर्थिक विशेषज्ञ कहते हैं कि 2004 का एथेंस ओलंपिक फिजूलखर्च की सबसे बड़ी मिसाल है. आधिकारिक रूप से इसपर छह अरब यूरो खर्च हुए जो पूर्वानुमान से दोगुना ज्यादा था.
ग्रीस पेंशन देने के मामले में दुनिया का सबसे उदार देश माना जाता है. यहां कामगारों के रिटायर होने पर तनख्वाह का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा पेंशन के जरिए जिंदगीभर मिलता रहता है. लेकिन इसके साथ ही विडंबना है कि ग्रीस दुनिया के उन देशों में भी शामिल है जहां जनसंख्या वृद्धि दर नकारात्मक है. यानी देश में कामगारों के बजाय रिटायर लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है. ग्रीस का यह खर्च भी लगातार बढ़ा. यूरोजोन में शामिल होने के बाद ग्रीस में न्यूनतम मजदूरी दर एक दशक के भीतर 50 फीसदी से ज्यादा बढ़ गई. सरकार यह पूरा खर्च यूरो की साख पर मिले कर्ज से पूरा कर रही थी. ग्रीस के आर्थिक संकट की ओर बढ़ने के संकेत उसी साल मिले जब वह ओलंपिक के जरिए दुनियाभर में अपनी साख बढ़ाना चाहता था. 2004 में देश का कर्ज 167 अरब यूरो तक पहुंच चुका था जो उसकी जीडीपी का तकरीबन 120 फीसदी था. यूरोपीय यूनियन ने इस आधार पर ग्रीस को चेतावनी दे दी. इसी के बाद पहली बार देश में कटौती वाला बजट बना और इसी साल ग्रीस के कुछ मजदूर संगठन, महिलावादी संगठन, पर्यावरण कार्यकर्ता और दूसरे आंदोलनकारियों ने मिलकर सिरिजा गठबंधन की नींव रखी.
हालांकि अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए यह बजट काफी नहीं था. ग्रीस यूरोप के सबसे भ्रष्ट देशों में गिना जाता है. यह भी एक वजह रही कि सरकारी कर्मचारी आनेवाले सालों में खुद की जेबें भरने के लिए मनमर्जी से खर्च करते रहे. सरकार की नींद 2008 की वैश्विक मंदी के दौरान तब टूटी जब उसका कर्ज बढ़कर 250 अरब यूरो को पार कर गया. इसके एक साल बाद ही क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने देश की रेटिंग निवेश के लिए नकारात्मक कर दी. यह ऐसा कदम था जिससे ग्रीस सरकार के सामने अपना अनिवार्य खर्च चलाने के लिए भी धन की कमी हो गई. इन हालात के चलते 2010 में उसने यूरोपीय आयोग, यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ईसीबी), व अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से राहत पैकेज की गुहार लगाई और उसे 110 अरब यूरो का पैकेज मिल भी गया. लेकिन इसके लिए ग्रीस को तीनों संस्थाओं की शर्तें माननी पड़ीं. बजट कटौती को कड़ाई से लागू किया गया. शिक्षा और स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च अचानक कम कर दिया गया. पेंशन सुधार कार्यक्रम के तहत पेंशन में कटौती की गई. इस मुहिम से हजारों लोगों की नौकरी चली गई.
सिरिजा का आम लोगों के लिए एक ही संदेश था कि ग्रीस को कर्ज देने वाली ‘तिकड़ी’ के सामने घुटने टेकने की जरूरत नहीं है
सिरिजा तत्कालीन सरकार के बजट कटौती वाले उपायों की खुलकर मुखालफत कर रही थी. इस पार्टी का आम लोगों के लिए एक ही संदेश था कि ग्रीस को कर्ज देने वाली ‘तिकड़ी’ के सामने घुटने टेकने की जरूरत नहीं है. देश में ज्यों-ज्यों कटौती वाले प्रावधान में लागू होते गए, जनता के विरोध प्रदर्शन बढ़ते गए और इसके साथ ही गठबंधन की लोकप्रियता भी देश में बढ़ती गई. 2012 में सिरिजा एक राजनीतिक पार्टी बन गई. उसने एलेक्सी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा. आश्चर्यजनक रूप से एक चुनाव पहले पांच फीसदी वोट पाने वाला गठबंधन इस बार देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गया. हालांकि ग्रीस में इसबार भी फिर उन्हीं पार्टियों की गठबंधन सरकार बनी जो बजट कटौती के प्रावधान लागू करके राहत पैकेज पाना चाहती थीं. नई सरकार के सामने इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं था. इस बार सरकार ने श्रम सुधार से जुड़े कानून पास किए जिनसे नाराज कामकाजी तबके का एक बड़ा हिस्सा सिरिजा के पक्ष में आ गया. इन परिस्थितियों ने पर्याप्त रूप से ऐसी जमीन तैयार कर दी थी कि आधुनिक यूरोप में पहली बार एक अति साम्यवादी विचारधारा की पार्टी सरकार में आ जाए. जनवरी, 2015 का चुनाव तो बस एक औपचारिकता था.
ग्रीस और कर्जदाताओं के बीच टकराव के क्या नतीजे हो सकते हैं
जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ग्रीस को और राहत देने के पक्ष में नहीं हैं
जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ग्रीस को और राहत देने के पक्ष में नहीं हैं
ग्रीस की इस नई सरकार और उसके नेता सिपरास की मजबूरी है कि वे जनता से किए अपने वादों से पलट नहीं सकते. इन परिस्थितियों में यूरोप के सामने ग्रीस संकट पर आगे बढ़ने के दो ही उपाय हैं.
यह बात लगभग साफ हो चुकी है कि ग्रीस की माली हालत ऐसी नहीं है कि वह निकट भविष्य में 315 अरब यूरो, जो उसकी जीडीपी का 175 फीसदी से ज्यादा है, लौटा पाए. कल्याण कार्यक्रमों में भारी कटौती के बाद भी पूरा कर्ज वापस कर पाना सरकार के लिए मुमकिन नहीं होगा. इन परिस्थितियों में ग्रीस ने ईसीबी, आईएमएफ और यूरोपीय कमीशन के सामने शर्त रखी है कि उसके कुछ कर्ज को माफ कर दिया जाए और बाकी को इस तरह से समायोजित किया जाए कि जब उसकी अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाए तब वह उधारी चुकाए. इस तरह की और भी शर्तें है जिनपर जर्मनी और बाकी संस्थाओं का तैयार होना जरूरी है. इस समय किसी ऐसे ही समाधान पर सहमति बनाने की कोशिश चल रही है जो सभी पक्षों के लिए मान्य हो.
यदि ग्रीस और बाकी पक्षों बीच कोई समझौता नहीं होता तो ग्रीस को यूरोजोन से बाहर होना पड़ेगा. यह विकल्प न तो ग्रीस चाहता है न ही यूरोप का कोई और देश. ऐसी हालत में ग्रीस को यूरो के बदले नई मुद्रा शुरू करनी पड़ेगी. इससे शुरुआत में उसकी आर्थिक हालत और खराब होगी. विदेशों से व्यापार के लिए इस मुद्रा की कीमत इतनी कम होगी कि देश में बेतहाशा महंगाई बढ़ सकती है. निर्यात अभी के मुकाबले इतना सस्ता हो जाएगा कि घरेलू उद्योग धंधे बंद हो सकते हैं. बेरोजगारी दर जो अभी 25 प्रतिशत के स्तर पर है वह और बढ़ जाएगी. ऊपर से दिवालिया घोषित हो चुके देश में कोई निवेश नहीं करना चाहेगा. जब तक उसकी मुद्रा स्थिर नहीं होगी देश में अराजकता का माहौल बना रह सकता है. ग्रीस को इसका एक फायदा जरूर मिलेगा कि तब उसके पास अपनी केंद्रीय बैंक से आर्थिक नीति संचालित करने का विकल्प होगा.
यदि ग्रीस और बाकी पक्षों बीच कोई समझौता नहीं होता तो ग्रीस को यूरोजोन से बाहर होना पड़ेगा. यह विकल्प न तो ग्रीस चाहता है न ही यूरोप का कोई और देश
जहां तक यूरोप की बात है तो तात्कालिक नतीजे में उसे ग्रीस को कर्ज में दिए 300 अरब यूरो से हाथ धोना पड़ेगा. इससे यूरो मुद्रा के कमजोर होने की संभावनाएं है. यूरोप को इस घाटे की भरपाई के लिए सार्वजनिक कल्याण कार्यक्रमों में कटौती कर निवेश को बढ़ाना होगा जो आज की वैश्विक परिस्थितियों में बहुत मुश्किल साबित होगा. यूरोप में भी सबसे बुरा असर जर्मनी पर हो सकता है क्योंकि ग्रीस के कर्ज में उसका भी एक बड़ा हिस्सा है.
यूरोप में स्पेन, इटली, पुर्तगाल व आयरलैंड की हालत भी ग्रीस की तरह है. एक आशंका यह भी जताई जा रही है ग्रीस के यूरोजोन से निकलने पर ये भी इस रास्ते पर चल सकते हैं. ऐसा होने पर पूरे यूरोजोन का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा और तब सच में यह इतिहास का सबसे छोटा युग बन सकता है.