वह आज़ाद भारत के गांवों के टूटने-बिखरने और इसके बीच बनने की कोशिशों की शुरुआती दास्तानों में से है. राही मासूम रजा के ‘आधा गांव’ में संप्रदायों को जाने-अनजाने बांटने वाली जो कसक दिखती है और श्रीलाल शुक्ल के ‘राग दरबारी’ में ग्रामीण विडंबनाओं का जो व्यंग्य सामने आता है- उनको अगर एक साथ, उनकी करुण सांस्कृतिक-सामाजिक समग्रता में पढ़ना हो तो फणीश्वरनाथ रेणु का कालजयी उपन्यास ‘परती परिकथा’ पढ़ना होगा.

आम तौर पर आंचलिक कह कर निबटा दिए गए और ‘मैला आंचल’ की कीर्ति-छाया में कुछ कम चर्चित रह गए रेणु के इस उपन्यास का अपना एक लोकराग और रंग है जो समाज, संस्कृति और राजनीति की तरह-तरह की टकराहटों के बीच बड़े अनोखे ढंग से उभरता है. बेशक, बड़े बांधों और उद्योगों में विकास के मंदिर देखने वाला नेहरू का समाजवादी सपना आज की हमारी समझ के हिसाब से तार-तार है, लेकिन इस सपने की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है और नए भारत के निर्माण में अतुलनीय योगदान भी है, यह बात कैसे अनदेखी की जा सकती है.

आज़ादी के बाद की नई हवा में सांस लेते इस गांव में कांग्रेस भी है, जनसंघ भी, भूदानी भी और कम्युनिस्ट भी. गांव में शहर से पढ़कर आए लड़के हैं जो बदलती हवा में कुछ खुद बदले हुए हैं और कुछ गांव को बदलना चाहते हैं

उपन्यास की पृष्ठभूमि कोसी अंचल का परानपुर गांव है जहां विकास के यज्ञ के नाम पर ज़मीन ली जानी है. पूर्णिया से सैकड़ों मील दूर दिल्ली में बैठे योजनाकार अपनी मेज़ पर विकास का जो नक्शा खींच रहे हैं, वह इस इलाक़े में कैसे डर और कैसी दरारें पैदा कर रहा है, इससे वे बेखबर हैं. कोसी के शाप की अनगनित कहानियों से जूझते इस गांव में पुराने जमींदार का बेटा लौटा है जिसे गांव पागल समझता है. वह इस परती (जमीन) पर खेती के प्रयोग कर रहा है. इन प्रयोगों को भी गांव वाले संदेह से देखते हैं. आज़ादी के बाद की नई हवा में सांस लेते इस गांव में कांग्रेस भी है, जनसंघ भी, भूदानी भी और कम्युनिस्ट भी. गांव में शहर से पढ़कर आए लड़के हैं जो बदलती हवा में कुछ खुद बदले हुए हैं और कुछ गांव को बदलना चाहते हैं.

यह एक बड़ा उपन्यास है- उस समय की सामाजिक हलचलों को पकड़ता हुआ, विकास की विडंबनाओं को पकड़ता हुआ, लेकिन इससे कहीं आगे जाकर वह सपना देखता हुआ जिसमें सबके लिए समानता और सामाजिक सौहार्द की गुंजाइश हो. सबसे बड़ी बात यह है कि रेणु का यह उपन्यास अपनी समस्याओं के राजनीतिक नहीं, सांस्कृतिक हल खोजता है. टूटे हुए गांव को जोड़ने के लिए जित्तन, यानी जमींदार का पगला बेटा, शामा-चकेवा की पुरानी लोककथा और उससे जुड़े लोकनृत्य का सहारा लेता है. इसी में वह हिंदी की नई कहानी का नाट्य मंचन भी पिरो देता है.

निश्चय ही ‘मैला आंचल’ रेणु की सबसे चर्चित और कालजयी कृति है, लेकिन रेणु का कृतित्व अपनी पूरी समग्रता में जिस उपन्यास में खिलता है, वह ‘परती-परिकथा’ है

इन दिनों हिंदी में स्त्री विमर्श की चर्चा ख़ूब हुई है. लेकिन रेणु के उस उपन्यास की बेहद जीवंत लड़कियों को भुलाया नहीं जा सकता- नट्टिन टोले की ताजमनी, हरिजन टोले की मलारी और वह शहरी इरावती जो राजनीति के पाखंड देखकर टूटी हुई जीवन के मायने खोज रही है.

दरअसल यह पूरा उपन्यास रेणु की लेखकीय सूक्ष्मता का बहुत सुंदर बयान है. इस उपन्यास में वे जैसे एक हिलता-डुलता, सांस लेता गांव उसके सारे किरदारों के साथ खड़ा कर देते हैं. तरह-तरह की आवाज़ों, तरह-तरह के गीतों और बिल्कुल जादुई लोककथाओं से भरे इस उपन्यास को जितनी बार पढ़ें, कुछ और रीझ जाते हैं. निश्चय ही ‘मैला आंचल’ रेणु की सबसे चर्चित और कालजयी कृति है, लेकिन रेणु का कृतित्व अपनी पूरी समग्रता में जिस उपन्यास में खिलता है, वह ‘परती-परिकथा’ है. हिंदी के मास्टरपीस विश्व साहित्य की टक्कर ले सकते हैं- उनमें यह भी एक उपन्यास है- इसे ज़रूर पढ़ें.