राजस्थान में सरकारी हॉस्टलों में रहने वाले छात्रों को अब रोज सुबह राष्ट्रगान गाना होगा. सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग का कहना है कि इससे छात्रों में देशभक्ति की भावना को जगाने में मदद मिलेगी. राज्य में करीब 800 सरकारी हॉस्टल हैं जो विभाग के तहत आते हैं और पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों के लिए बनाए गए हैं.

इससे पहले जयपुर नगर निगम ने भी अपने कर्मचारियों को रोज सुबह राष्ट्रगान और शाम को राष्ट्रगीत गाने का निर्देश दिया था. इस पर हो रही बहस के बीच इलाहाबाद की मेयर अभिलाषा गुप्ता नंदी का बयान आया कि राष्ट्रगान न गाने वाले किसी और मुल्क जा सकते हैं. उनका कहना था कि जो लोग राष्ट्रगान के विरोधी हैं, उन्हें भारत में रहने का अधिकार नहीं है.

दूसरी तरफ, सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाए जाने को लेकर भी बहस जारी है. इसका विरोध करने वालों को भी कई बार देशद्रोही बताया जाता है. उन्हें देश छोड़कर कहीं और जा बसने को कहा जाता है.

आखिर क्यों सरकार के विरोध में खड़ा हर व्यक्ति देशद्रोही या पाकिस्तानी हो जाता है? क्यों हारी जाती हर बहस देशप्रेम और राष्ट्रवाद की तरफ खींची जाती है?

आखिर क्यों सरकार के विरोध में खड़ा हर व्यक्ति देशद्रोही या पाकिस्तानी हो जाता है? क्यों जीती न जा सकने वाली हर बहस देशप्रेम और राष्ट्रवाद की तरफ खींच ली जाती है?

असल में यह एक जबरदस्त मारक क्षमता वाली रणनीति है. यह ऐसा छद्म राष्ट्रवाद है जिसका उपयोग तमाम दक्षिणपंथी पार्टियां और आतंकवादी संगठन दुनियाभर में करते आये हैं. इसी नकली राष्ट्रवाद का सहारा लेकर हिटलर सत्ता में आया था. इसी तरह के सिद्धांत पर आज आतंकवादी खुद को मुसलमान और अपने खिलाफ बोलने वालों को इस्लाम का दुश्मन बता देते हैं. भाजपा के पितृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने तो इस हथियार का इस्तेमाल आज़ादी की उस लड़ाई को लड़ने वालों के खिलाफ भी किया है जिसमें खुद उसका इतिहास संदिग्ध है.

इस छदम राष्ट्रवाद की मारक क्षमता का सबसे खतरनाक पहलू यह होता है कि इसका शिकार व्यक्ति खुद को अपेक्षाकृत बड़ा देशभक्त समझता है. सांप्रदायिक व्यक्ति को तो कहीं किसी कोने में अपने गलत होने या हो सकने का अहसास होता है. इसीलिए उसके दिल से नफरत मिटाई भी जा सकती है. लेकिन छद्म राष्ट्रवाद से संक्रमित व्यक्ति तो देश के लिए महान काम कर रहा होता है. उसे कैसे रोका और समझाया जाए!

छद्म और दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद हमें देश के लिए जान देने से ज्यादा जान लेना सिखाता है. यह वह राष्ट्रवाद है जो खुद की आलोचना को हमेशा देशद्रोह से जोड़कर देखता है. इस छद्म राष्ट्रवाद ने अपने नायकों को कभी भी उस काल में नहीं ढूंढा जिसमें भारत की स्वतंत्रता और उसके निर्माण में लगे लोग कुर्बानियां दे रहे थे. इसने उन्हें बहुत पीछे जाकर ढूंढा ताकि उन्हें अपने हिसाब से इस्तेमाल किया जा सके. जहां एक वीर नायक के हर पराक्रम को दूसरे धर्म के विरुद्ध लड़ा गया धर्म युद्ध बताया जा सके.

यह दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद हमें इतिहास के एक ख़ास समय में एक ख़ास धर्म में ही वैभव देखने को कहता है. दूसरी तरह से समझें तो यह उस राष्ट्रवाद के बिलकुल उलट है जो भारत की मिश्रित संस्कृति में अपना गौरव देखता है. जो अपने देश, अपनी सरकार और उसकी नीतियों की आलोचना को, आगे बढ़ने के मार्ग की सफाई मानता है.

यह उस राष्ट्रवाद के बिलकुल उलट है भारत की मिश्रित संस्कृति में अपना गौरव देखता है. जो अपने देश, अपनी सरकार और उसकी नीतियों की आलोचना को, आगे बढ़ने के मार्ग की सफाई मानता है.

आरएसएस ने इसी छद्म राष्ट्रवाद को अपना ब्रम्हास्त्र बनाया है. इस संगठन की नीति और उसके स्वभाव की दो बातें हमें समझ लेनी चाहिए जिन्हें यह आज तक छिपाने में कामयाब रहा है. एक तो यह कि आरएसएस हिंदू संगठन नहीं बल्कि सवर्ण हिंदू जाति का ब्राह्मणवादी संगठन है. दूसरी यह कि इसका प्राथमिक एजेंडा सांप्रदायिकता भी नहीं बल्कि छद्म राष्ट्रवाद है जो हमें देश को सही कारणों से प्यार और उसका सम्मान करने की दिशा से हमेशा भटकाए रखता है.

जब हम आरएसएस को एक हिंदू संगठन और उसकी सांप्रदायिक नीतियों को उसका पहला एजेंडा समझते हैं तो यही उसकी पहली जीत होती है. अल्पसंख्यक विरोध की उसकी नीति ज्यादातर बहुसंख्यक समाज को अपने झंडे के नीचे लाने के लिए है जो उसके हिंदू राष्ट्र की आवाज़ को बुलंद करने का सबसे ज़रूरी पहलू है. चूंकि भारत जैसे देश में सांप्रदायिकता ज्यादा दिनों तक काम नहीं करती. जिस सामाजिक ताने-बाने में यहां का नागरिक रहता है वह लोगों को दंगों के बाद भी जोड़ ही देता है. इसलिए छद्म राष्ट्रवाद जिसे हर घटना और कथन के साथ जोड़ कर सामने वाले को देशद्रोही या गलत ठहराया जा सकता है, संघ कुनबे का असली हथियार है. यह ‘देश में असहिष्णुता बढ़ रही है’ का जवाब ‘मेरे देश को असहिष्णु क्यों बोला’ जैसे वाक्यों से देता है. यह छद्म राष्ट्रवाद एक ख़ास धर्म के लिए और एक ख़ास धर्म के खिलाफ होता है. इसमें विरोधी धर्म का व्यक्ति हमेशा परीक्षा देने की अवस्था में ही रहता है. इस छद्म राष्ट्रवाद के परीक्षक जब जिसे चाहें उसे इस परीक्षा में फेल कर सकते हैं.

इन कुछ बातों की समझ और जानकारी हमारे सहिष्णु समाज को और सहिष्णु और हमें सही मायने में राष्ट्रवादी भी बना सकती है. आइये देश को सही कारणों के लिए प्यार करें जो हजारों हैं.