भारत में स्थित विदेशी राजनयिकों का प्रदेशों में जाकर वहां की सरकारों से संपर्क स्थापित करना कोई नई बात नहीं हैं. इनमें से तकरीबन सभी दौरे व्यापार से जुड़े होते हैं और इसलिए ज्यादातर विकसित राज्यों की राजधानी में राजनयिकों का आनाजाना होता है. इस कड़ी में कुछ महीने पहले दक्षिण कोरिया के राजदूत जोंग्यू ली का उत्तर-पूर्वी राज्यों और इनमें भी खासकर मिजोरम का दौरा व्यापार से इतर भारत में विदेशों के सांस्कृतिक प्रभाव की नजर से एक अलग मिसाल कहा जा सकता है.
ली वैसे तो यहां निवेश के मौके तलाशने गए थे लेकिन वे यहां की भौगोलिक और सांस्कृतिक समानता से इतने अभिभूत हुए कि इसे तकरीबन अपने देश जैसा ही बता दिया. ली का कहना था कि भविष्य में उनका देश मिजोरम के साथ सांस्कृतिक संबंध और मजबूत करेगा. इसी कड़ी में फिर उनकी कोशिश के चलते भारत के बड़े-बड़े शहरों में आयोजित होने वाला कोरियन पॉप (के-पॉप) महोत्सव जुलाई के दौरान राजधानी आइजोल में आयोजित हुआ.
 
मिजोरम में कोरियाई कलाकारों की प्रसिद्धि के पीछे ‘हैल्लियूवुड’ फिल्मों का काफी योगदान है. यह चीनी शब्द ‘हैल्लियू’ से बना है. इसका मतलब है ‘कोरियाई लहर’

 कोरियाई राजदूत देश के इस राज्य में भले ही काफी बाद में आए हों लेकिन, उनका देश यहां सालों पहले आ चुका है. जहां शेष भारत पश्चिमी देशों की संस्कृति से प्रभावित है वहीं उत्तर-पूर्वी भारत के इस छोटे से राज्य में पूरब यानी दक्षिण कोरिया की लहर है.

बॉलीवुड के अंतर्राष्ट्रीय दूत बन चुके शाहरुख खान का नाम मिजोरम के युवाओं ने भी सुना है लेकिन, यदि आप उनके सामने ली मिन्ह हो का नाम ले दें तो वे आपके साथ ज्यादा दोस्ताना रुख दिखाने लगते हैं. हो कोरिया के गायक और अभिनेता हैं जो अब मिजो युवाओं का आदर्श हैं. हो के अलावा दूसरे कोरियाई कलाकार जैसे किम ह्यून जूंग, चा ताई ह्युम, पार्क जी यिओन आदि मिजोरम में घर-घर पहचाने जाने वाले नाम हैं.

मिजोरम में इन कलाकारों की प्रसिद्धि के पीछे ‘हैल्लियूवुड’ फिल्मों का काफी योगदान है. यह हॉलीवुड का बिगड़ा हुआ रूप नहीं बल्कि चीनी शब्द ‘हैल्लियू’ से बना है. इसका मतलब है ‘कोरियाई लहर’. चीन के कुछ हिस्सों में कोरियाई संगीत, फिल्में और टीवी सीरियल से लेकर कोरियाई फैशन और खाने के बढ़ते असर को चीनी मीडिया ‘हैल्लियू’ नाम से दर्ज करता है.

कोरियाई संस्कृति ने यहां युवाओं को इस कदर प्रभावित किया है कि वे कोरियाई लोगों की तरह पलंग पर नहीं बल्कि जमीन पर सोने लगे हैं

 यही कोरियाई लहर अब आइजोल की सड़कों पर साफ देखी जा सकती है. कोरियाई फैशन के कपड़े और वहां की फिल्मों की डीवीडी बहुतायत में सड़क किनारे की दुकानों पर मिलती हैं. स्थानीय अखबार से बात करते हुए यहां की एक महिला दुकानदार जानकारी देती हैं, ‘कोरियाई फिल्मों की डीवीडी हमारे यहां खूब बिकती हैं. बॉलीवुड या हॉलीवुड फिल्मों को मुश्किल से ही कोई पूछता है. युवा लड़कियां सबसे ज्यादा कोरियन फिल्मों की डीवीडी खरीदती हैं.’ आइजोल में रहने वाली 45 वर्षीय डिकी कहती हैं, 'ज्यादातर हॉलीवुड फिल्में और बॉलीवुड में बनने वाली नई फिल्में बच्चों के लिए ठीक नहीं है इसलिए हम बच्चों को कोरियन फिल्में देखने के लिए ही कहते हैं.'

मिजोरम में अब ज्यादातर नए लड़के लंबे बाल रखना और उन्हें रंगना पसंद करते हैं. यह फैशन, कोरियाई युवाओं की पहचान है और यहां हाल के सालों में ही चलन में आया है. इतना ही नहीं कोरियाई भाषा के शब्द जैसे अन्यान सायो (हैलो), सरंग (मुझे तुमसे प्यार है), वाटुके (अब क्या किया जाए), वजु वजु (हां) जैसे शब्द युवाओं के बीच आम बोलचाल में इस्तेमाल होते हैं. बेहद दिलचस्प बात है कि कोरियाई संस्कृति ने यहां युवाओं को इस कदर प्रभावित किया है कि वे कोरियाई लोगों की तरह पलंग पर नहीं बल्कि जमीन पर सोने लगे हैं.

उत्तर-पूर्व में इस समय कोरिया की ‘सॉफ्ट पॉवर’ का केंद्र मिजोरम है लेकिन, इसका तकरीबन ऐसा ही असर नागालैंड और मणिपुर में भी देखा जा सकता है. नगालैंड की राजधानी कोहिमा में पिछले साल के-पॉप महोत्सव हुआ था और उसे यहां भारी समर्थन मिला था.

उत्तर पूर्व में कोरियाई लहर आने की शुरुआत मणिपुर से मानी जा सकती है. सन 2000 में यहां एक अलगाववादी संगठन ने भारतीय फिल्मों और टीवी चैनलों पर पाबंदी लगा दी थी. कोरियाई टीवी चैनल इसके पहले भी यहां चलते थे, लेकिन वे लोगों के लिए एकमात्र विकल्प नहीं थे. लेकिन भारतीय चैनलों और फिल्मों पर पाबंदी के बाद स्थानीय केबल टीवी चैनलों ने यहां कोरियाई चैनलों का प्रसारण शुरू कर दिया. कोरिया की राजधानी सियोल से चलने वाला एरिरंग टीवी यहां तेजी से लोकप्रिय हुआ और साथ में कोरिया की संस्कृति भी नई पीढ़ी को लुभाने लगी. एरिरंग के अलावा कोरिया का केबीएस वर्ल्ड चैनल यहां खूब देखा जाता है.

उत्तर-पूर्व में भले ही इस समय कोरिया की ‘सॉफ्ट पॉवर’ का केंद्र मिजोरम हो लेकिन तकरीबन ऐसा ही असर नागालैंड और मणिपुर में भी देखा जा सकता है

 मणिपुर के इस बदलते मनोरंजन परिदृश्य का असर धीरे-धीरे मिजोरम में भी फैल गया. 2006 में यहां के एक स्थानीय केबल चैनल एलपीएस विजन ने कोरियाई सीरियलों को मिजो भाषा में डब करके दिखाना शुरू किया और वे जल्दी ही लोगों को पसंद आने लगे.

मणिपुर की अपेक्षा मिजोरम में कोरियाई चैनलों की लोकप्रियता और असर काफी ज्यादा है. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि मणिपुर में हिंदी बहुत अच्छे से बोली-समझी जाती है. यहां हिंदी सीरियल और फिल्मों को लेकर नकार का भाव नहीं है जबकि मिजोरम के बारे में यह बात नहीं कही जा सकती. एक मीडिया रिपोर्ट में एलपीएस विजन के मालिक लल्सामिलियाना पचुआऊ कहते हैं, ‘मुझे मणिपुर में कोरियाई असर के बारे में पता था. हमारे यहां हिंदी फिल्में कभी लोकप्रिय नहीं रहीं और हॉलीवुड फिल्मों को लेकर भी कोई उत्साहित नहीं होता. इसलिए मैंने कोरियाई सीरियलों के साथ प्रयोग करना शुरू किया और उन्हें भारी सफलता मिली.’

विदेशों में अक्सर कहा जाता है कि भारत एक सांस्कृतिक महाशक्ति है. भारतीय संस्कृति से यूरोप और अमेरिका तक प्रभावित हैं. लेकिन जब अपने घर की बात आती है तो उत्तर-पूर्व के इन राज्यों को दक्षिण कोरिया एक बड़ी ताकत दिखाई देता है. हालांकि इसकी वजह समझना मुश्किल बात नहीं है. हम इसकी बुनियाद संस्कृति की निकटता के सिद्धांत में खोज सकते हैं. यह बताता है कि एक जैसी संस्कृति वाले क्षेत्र भौगोलिक रूप से भले ही दूर हों, लेकिन मीडिया या अन्य माध्यम से संपर्क में आने पर एक-दूसरे को आसानी से प्रभावित करते हैं. इस बारे में मिजोरम के एक समाजविज्ञानी ललरिंडिकी कहते हैं, 'हमारे यहां के युवा जब कोरियाई फिल्में देखते हैं तो वे वहां के सितारों के साथ आसानी से जुड़ाव महसूस करते हैं. यह बॉलीवुड और हॉलीवुड फिल्मों के साथ संभव नहीं है.'