पूर्व क्रिकेटर और अमृतसर से भाजपा सांसद रहे नवजोत सिंह सिद्धू आम आदमी पार्टी में शामिल हो सकते हैं. वे ऐसा भाजपा से अपनी उस नाराजगी के चलते कर सकते हैं जिसकी शुरुआत तब हुई जब 2014 के लोकसभा चुनाव में उनका टिकट काट दिया गया था.

कभी क्रिकेट की दुनिया में अपनी बल्लेबाजी से लोगों के दिलों पर छा जाने वाले नवजोत सिंह सिद्धू जब सियासत में आए तो यहां भी उनका प्रदर्शन शानदार ही रहा. अमृतसर सीट पर उन्होंने न सिर्फ 2004 में जीत हासिल की बल्कि 2009 में भी इसे बरकरार रखा. 2014 में जब उन्हें अरुण जेटली के लिए अमृतसर सीट खाली करने को कहा गया तो भाजपा से उनके मोहभंग की शुरुआत हो गई.

इस बार भी आम आदमी पार्टी में जाने को लेकर सिद्धू ने कहीं कुछ नहीं बोला है लेकिन उनकी पत्नी नवज्योत कौर के बयानों से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि सिद्धू भाजपा छोड़ सकते हैं.

वैसे देखा जाए तो सिद्धू के आम आदमी पार्टी में जाने की चर्चा इससे भी पुरानी है. दरअसल अरुण जेटली की उम्मीदवारी की घोषणा से काफी पहले ही उनकी पत्नी और अमृतसर की ही एक विधानसभा सीट से विधायक नवज्योत कौर सिद्धू ने पत्रकारों से एक बातचीत में कहा था, ‘सियासत को आम आदमी पार्टी ने नई राह दिखाई है. इस पर कई नेता और दल अब चलने की कोशिश करने लगे हैं. प्रमुख सियासी दलों को आप से राजनीति करना सीखनी चाहिए.’

2014 के चुनावों के ठीक पहले दिए नवज्योत कौर के इस बयान पर कहा गया कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर दबाव बढ़ाने के लिए उन्होंने ऐसा कहा है. इस बार भी आम आदमी पार्टी में जाने को लेकर सिद्धू ने कहीं कुछ नहीं बोला है लेकिन उनकी पत्नी नवज्योत कौर के बयानों से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि सिद्धू भाजपा छोड़ सकते हैं.

सिद्धू के आप में शामिल होने की अटकलों के बीच नवज्योत का कहना है कि अगर 2017 के चुनाव में अकाली दल से गठबंधन बना रहा तो वे भाजपा से चुनाव नहीं लड़ेंगी. यह भी कि उनके लिए सभी विकल्प खुले हैं, लेकिन अभी वे भाजपा की विधायक हैं और फिलहाल किसी पार्टी में शामिल नहीं हो रही हैं. यह बयान अपने-आप में बताता है कि सिद्धू और उनकी पत्नी कौन सी सियासी राह पकड़ने वाले हैं.

पिछले कुछ समय से वे भाजपा में लगातार हाशिये पर गए हैं. वे नितिन गडकरी की टीम में पार्टी के राष्ट्रीय सचिव होते थे. लेकिन अमित शाह की टीम में उन्हें कोई जगह नहीं दी गई.

सूत्रों की मानें तो नवजोत सिंह सिद्धू और आम आदमी पार्टी के नेताओं में कई दौर की बातचीत हो चुकी है. आप में एक तरह से सिद्धू को लाने पर सहमति है. आप के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल के बारे में भी बताया जा रहा है कि वे भी सिद्धू को पार्टी में लाने के प्रस्ताव पर सहमत हैं.

आज सिद्धू अगर आप में शामिल होना चाहते हैं तो उनके पास इसकी काफी मजबूत वजहें हैं जो टिकट न दिये जाने से कहीं आगे जाती हैं. पिछले कुछ समय से वे भाजपा में लगातार हाशिये पर गए हैं. उनसे न सिर्फ अमृतसर लोकसभा सीट की उम्मीदवारी पार्टी ने छीनी बल्कि सांगठनिक ढांचे में भी उनके पास जो जिम्मेदारी थी, उससे भी उन्हें अलग कर दिया गया. वे नितिन गडकरी की टीम में पार्टी के राष्ट्रीय सचिव होते थे. लेकिन अमित शाह की टीम में उन्हें कोई जगह नहीं दी गई.

सिद्धू को यह बात तब और नागवार गुजरी कि जब राष्ट्रीय टीम से उनकी छुट्टी करके अमृतसर के ही तरुण चुग को पार्टी का राष्ट्रीय सचिव बना दिया गया. चुग को सिद्धू सियासत में खुद से काफी जूनियर मानते रहे हैं.

अभी पार्टी के पास राज्य में कोई प्रमुख जट सिख चेहरा है भी नहीं. ऐसे में साफ-सुथरी छवि वाले सिद्धू आप के लिए और भी उपयोगी बन जाते है

दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी के पास अभी पंजाब में कोई ऐसा चेहरा नहीं है जिसकी पूरे सूबे में अपनी एक अलग पहचान हो. इसके अलावा पार्टी यह भी जानती है कि उसे ऐसे लोग भी चाहिए जिनकी युवाओं के बीच भी अपील हो. दिल्ली में पार्टी अपनी जीत में युवाओं की भूमिका बेहद अहम मानती रही है. नवजोत सिंह सिद्धू की वाकपटुता और प्रभावी भाषण शैली की वजह से भी आप के बड़े नेताओं को लगता है कि अगर वे उनके पाले में आ गए तो पार्टी की कई समस्याएं दूर हो सकती हैं.

पार्टी में एक सोच यह भी है कि अगर वह सही मायने में कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुवाई वाली कांग्रेस को चुनौती देकर भाजपा-अकाली दल की 10 साला सरकार से उपजे असंतोष का फायदा उठाना चाहती है तो उसे पंजाब में एक सिख चेहरे को ही आगे करना होगा. इसलिए आम आदमी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस बात पर भी बेहद गंभीरता से विचार कर रहा है कि क्या सिद्धू को पंजाब में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया जाए. सिद्धू जट सिख होकर पार्टी की इस योजना में फिट बैठते हैं. वैसे भी अभी पार्टी के पास कोई प्रमुख जट सिख चेहरा है भी नहीं. ऐसे में साफ-सुथरी छवि वाले सिद्धू आप के लिए और भी उपयोगी बन जाते है.

लेकिन नवजोत सिंह ​सिद्धू को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने में पार्टी के लिए एक बड़ी मु​सीबत भी है. इससे पार्टी की प्रदेश इकाईं में असंतोष पैदा हो सकता है. कहा जा रहा है कि सिद्धू को आप में लाने को लेकर अंतिम निर्णय लेने की राह की सबसे बड़ी बाधा यही है. इसलिए पार्टी पहले इस बात की तैयारी कर लेना चाहती है कि सिद्धू के आने के बाद या उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के बाद पार्टी में कोई खास विवाद न पैदा हो.