अब तक बढ़ती असहिष्णुता की बातें कुछ व्यक्तियों या निजी संस्थाओं द्वारा ही की जा रही थीं. लेकिन आईडीएसए की कार्यकारी समिति में स्वयं रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर भी शामिल हैं
देश में बढ़ती असहिष्णुता का मुद्दा लंबे समय से चर्चा का केंद्र बना हुआ है. एक तरफ दर्जनों साहित्यकार, लेखक, वैज्ञानिक और बुद्धिजीवी इस मुद्दे को लेकर सरकार पर निशाना साधते आ रहे हैं तो दूसरी तरफ केंद्र सरकार इस पूरे मुद्दे को ही 'प्रायोजित' बताकर अपना पल्ला झाड़ती रही है. हाल ही में संसद में चल रही बहस के दौरान केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह का कहना था कि 'असहिष्णुता का बनावटी माहौल' विपक्ष के इशारे पर बनाया जा रहा है. लेकिन गृह मंत्री की इस बात से उलट अब रक्षा मंत्रालय के थिंक-टैंक ने भी कह दिया है कि देश में असहिष्णुता बढ़ी है. अब तक बढ़ती असहिष्णुता की बातें कुछ व्यक्तियों या निजी संस्थाओं द्वारा ही की जा रही थी. लेकिन अब एक ऐसी संस्था ने यह बात कही है जिसकी कार्यकारी समिति में स्वयं रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर भी शामिल हैं.
'इंस्टीट्यूट ऑफ़ डिफेन्स स्टडीज एंड एनालिसिस' (आईडीएसए) को रक्षा मंत्रालय का थिंक-टैंक माना जाता है. यह एक स्वायत्त संस्था है जिसकी फंडिंग रक्षा मंत्रालय से ही होती. आईडीएसए की स्थापना 1965 में तत्कालीन रक्षा मंत्री यशवंतराव चव्हाण के प्रयासों से हुई थी. इस संस्था की कार्यकारी समिति में वर्तमान रक्षा मंत्री के साथ ही सेना और अन्य भारतीय सेवाओं के कई उच्च स्तरीय अधिकारी भी शामिल हैं. संस्था का मुख्य उद्देश्य सुरक्षा मामलों में अनुसंधान करना, सैन्य अधिकारियों को प्रशिक्षण देना और सुरक्षा से सम्बंधित नीतियां बनाने में सहयोग करना है.
इसी सम्मलेन के लिए तैयार किये गए 'कांसेप्ट नोट' में बढ़ती असहिष्णुता से सम्बंधित तमाम बातें लिखी गई हैं. संस्था ने माना है कि देश में 'धार्मिक असहिष्णुता और भड़काऊ प्रवृत्ति' बढ़ी है.
आने वाले 9 दिसंबर को आईडीएसए द्वारा आंतरिक सुरक्षा पर तीसरे राष्ट्रीय सम्मलेन का आयोजन किया गया है. इस सम्मलेन का मुख्य विषय 'कट्टरता: भारत के लिए एक बढ़ती सुरक्षा चुनौती' है. इसी सम्मलेन के लिए तैयार किये गए 'कांसेप्ट नोट' में बढ़ती असहिष्णुता से सम्बंधित तमाम बातें लिखी गई हैं. संस्था ने माना है कि देश में 'धार्मिक असहिष्णुता और भड़काऊ प्रवृत्ति' बढ़ी है.
कांसेप्ट नोट के अनुसार बीती 1 अगस्त को केन्द्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई गई थी. इस बैठक में केन्द्रीय सुरक्षा एवं जांच एजेंसियों के उच्चाधिकारियों के साथ ही 12 राज्यों के पुलिस महानिदेशकों और गृह सचिवों ने भाग लिया था. आंतरिक सुरक्षा से जुड़े विभिन्न मामलों के साथ ही इस बैठक में यह भी चर्चा हुई कि देश के युवाओं का कट्टरता की ओर बढ़ना आज देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है. इस बैठक में जिन मुद्दों पर चर्चा की गई थी, उन्हीं मुद्दों को 9 दिसंबर के सम्मलेन का मुख्य आधार बनाया गया है.
कांसेप्ट नोट में कहा गया है कि बीते कुछ समय में 'धार्मिक असहिष्णुता और भड़काने वाली घटनाओं में तेजी आई है. चौबीसों घंटे चलने वाले इलेक्ट्रॉनिक और प्रभावी सोशल मीडिया के कारण भड़काऊ बातें आसानी से देश के कोने-कोने तक पहुंच रही हैं जिससे असुरक्षा और अलगाव का माहौल बन रहा है. यह अलगाव ही कट्टरता को बढ़ावा देता है. विशेष तौर से तब, जब कई संगठन इसी मौके की तलाश में हैं कि ऐसे भटके हुए और असुरक्षित युवाओं का वे फायदा उठा सकें.'
आईडीएसए ने माना है 'सोशल मीडिया पर एक जैसे विचार वाले लोगों ने अपनी-अपनी आभासी दुनिया बसा ली है जिसमें वे कट्टर विचारों का जहर बांट रहे हैं'
सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे कट्टर विचारों पर चिंता जताते हुए आईडीएसए ने माना है 'सोशल मीडिया पर एक जैसे विचार वाले लोगों ने अपनी-अपनी आभासी दुनिया बसा ली है जिसमें वे कट्टर विचारों का जहर बांट रहे हैं. इन कट्टर लोगों के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक आदर्श भी अतिवादी चेहरे ही होते हैं. यदि मौका मिले तो ये लोग हिंसा से भी नहीं चूकेंगे और देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाएंगे.'
दुनिया भर के सैकड़ों युवाओं द्वारा आइएस जैसे कट्टर संगठन से जुड़ने का जिक्र करते हुए कांसेप्ट नोट में कहा गया है कि इस मामले में भारत अब तक खुशनसीब रहा है कि यहां इस संगठन का असर नगण्य रहा. जबकि कई विकसित देशों और संपन्न परिवारों के युवाओं को भी ऐसे संगठनों ने प्रभावित किया है. लेकिन आईडीएसए ने यह भी चिंता जताई है कि देश की जो युवा पीढ़ी हमारी पूंजी होनी चाहिए, उसे यदि सही दिशा न मिली तो वही हमारे लिए विनाश का कारण भी बन सकती है.
राजनीतिक पार्टियों पर लग रहे सामाजिक ध्रुवीकरण के आरोपों का जिक्र करते हुए संस्था ने माना है कि उन कारणों पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है जो लोगों में अलगाव की भावना पैदा करते हैं. इस समस्या से निपटने के लिए एक संस्थागत तंत्र को स्थापित करने के साथ ही आईडीएसए ने धर्मनिरपेक्ष राजनीति को बढ़ावा देने की बात भी कही है. संस्था के अनुसार सामाजिक ध्रुवीकरण पर रोक लगाने के लिए 'राजनीति का धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण सहायक साबित हो सकता है.'