इंटरनेट ने लोगों तक हर किस्म की जानकारी को पहुंचाने का रास्ता सुगम बना दिया है. लोग अब इसका इस्तेमाल करके उन चीजों तक सीधी पहुंच बना सकते हैं जिनके लिए वे पहले अखबार टीवी और कही-सुनी बातों पर निर्भर रहते थे. मिसाल के तौर पर असहिष्णुता के मुद्दे पर आमिर खान ने जो कहा उसे सुन-पढ़ के समझने की बजाय सीधे यूट्यूब पर जाकर देखा जा सकता था. फिर सहमत या असहमत भी हो सकते थे.
 
इस देश को पता है कि 2014 में जिसे उसने जिन कारणों से प्रधानमंत्री बनाया था वह अगर बाद में उनसे दाएं-बाएं होने की चूक करे तो उसे दिल्ली, बिहार, उत्तर प्रदेश के गांवों और झाबुआ-रतलाम के रास्ते कैसे रास्ते पर लाया जाता है

लेकिन अफसोस, कई लोग इंटरनेट की मदद से खुद को जागरूक, जानकार और सशक्त बनाने की बजाय इसे गलत करने का जरिया बना रहे हैं. इसकी भी मिसाल आमिर खान ही हैं जिन्हें और जिनकी कही बातों का समर्थन करने वालों को सोशल मीडिया पर कई लोग ढूंढ़-ढूंढ़ कर गरिया, और धमका रहे थे. ऐसा गरियाने का काम तो तब भी नहीं होना चाहिए था जब आमिर ने वह कहा भी होता जिसके लिए उन्हें गरियाया जा रहा था.

जो लोग ऐसा दूसरों की बातों में आकर अनजाने में कर रहे थे वे अगर एक बार इंटरनेट पर आमिर खान का वीडियो देखते तो उनकी समझ और साहस के कायल ही होते, उन्हें गरियाते नहीं. हमारे आस-पास ऐसे लोगों की कमी नहीं जो कलाकारों, साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों आदि को रोज ही इसलिए कोसते हैं कि वे महत्वपूर्ण मुद्दों पर बोलने की बजाय 'कोउ नृप होय...' वाली अवस्था में रहते हैं. यदि हम आमिर खान की तरह सोच-समझकर बोलने वालों के साथ ऐसा व्यवहार करेंगे तो सही वजहों से कलाकार-बुद्धिजीवी बोलेंगे भी तो कैसे!

आमिर ने अपने साक्षात्कार में तीन बातें कहीं: एक, उन्हें कलाकारों आदि के विरोध दिखाने का पुरस्कार लौटाने वाला तरीका गलत नहीं लगता, बल्कि उन्हें विरोध का कोई भी अहिंसक तरीका गलत नहीं लगता; दूसरा, उन्हें भी लगता है कि पिछले 5-6 महीने से माहौल में थोड़ी निराशा, असुरक्षा और असहिष्णुता है; और तीसरा, इसे ठीक से समझाने के लिए उन्होंने कहा कि उनकी पत्नी किरण ने एक दिन उनसे कहा कि क्या उन्हें विदेश में जाकर रहना चाहिए.

हम भारतीय तो श्रीलाल शुक्ला के राग दरबारी का वह ट्रक हैं जो एक तरफ से देखने पर सड़क के बीच लगता है और दूसरी तरफ से सड़क के किनारे

इसका मतलब उन्होंने जो आरोप उनपर लगे वह यानी कि यह कहा ही नहीं कि वे विदेश जाकर बसना चाहते हैं और बिना सूत-कपास के लट्ठम-लट्ठा शुरू हो गया. अगर वे विदेश में बसना चाहते भी तो उसमें गलत क्या होता? और अगर ऐसा करने की उनकी वजहें हमें सही नहीं लगती तब उन वजहों को गलत दिखाने का हमारा तरीका क्या उन्हें अपनेआप ही सही नहीं ठहरा रहा था.

वैसे आमिर कई मायनों में गलत कह रहे थे और किरण भी, कुछ ज्यादा ही संवेदनशील होने की वजह से. हम भारतीय तो श्रीलाल शुक्ला के राग दरबारी का वह ट्रक हैं जो एक तरफ से देखने पर सड़क के बीच लगता है और दूसरी तरफ से सड़क के किनारे. हम हमारे साथ दिन भर तरह-तरह से होने वाले गलत को जी से ज्यादा भर कर सहते हैं फिर भी आरटीआई की एक एप्लीकेशन, लगाने तक की जहमत नहीं उठाते. यह सहिष्णुता की अति नहीं तो और क्या है! फिर अचानक हमें कोई भड़काता है और हम धर्म के नाम पर की गई हर बकवास, जाति के नाम पर फैलाये गए हर भ्रम को पत्थर की लकीर मानकर अंधरे की दिशा में मुंह उठाकर चल देते हैं.

लेकिन इनके अलावा कुछ और भी है जो हमारी समझ का हिस्सा है. जिसने इस लोकतंत्र को मजबूत आधारों पर टिकी तरह-तरह की आशंकाओं और नकारात्मक भविष्यवाणियों के बावजूद दुनिया के सबसे मजबूत प्रकाश स्तंभों में से एक बनाया है. यही वह समझ है जो एक नये-नवेले देश के पहले, दूसरे और तीसरे प्रधानमंत्रियों के आकस्मिक निधन के बाद भी हमारी धरती को कांपने नहीं देती. जो आपातकाल के बाद एक रास्ता चुनती है और दो साल बाद आपातकाल चुनने वालों को ही चुनकर अपने रास्ते पर ला खड़ा करती है.

हम अपने साथ दिन भर तरह-तरह से होने वाले गलत को जी से ज्यादा भर कर सहते हैं फिर भी आरटीआई की एक एप्लीकेशन, लगाने की जहमत नहीं उठाते. क्या यह सहिष्णुता की अति नहीं है!

इस समझ को पता है कि 2014 में जिसे उसने जिन कारणों से प्रधानमंत्री बनाया था वह अगर बाद में उनसे दाएं-बाएं होने की चूक करता है तो उसे दिल्ली, बिहार, उत्तर प्रदेश के गांवों और झाबुआ-रतलाम के रास्ते कैसे रास्ते पर लाया जाता है. इस समझ को पता है कि एक बार चुने जाने के बाद अपनी नाराजगी जाहिर करने के पंचायत चुनाव से लेकर विधानसभा चुनाव तक के असंख्य मौकों को कैसे इस्तेमाल करना है.

हमारी समझ के इस चमत्कार की राह के सबसे बड़े साथी हैं किसी लोकतंत्र की नींव की तरह काम करने वाले उसके तमाम संस्थान. अगर अदालत, चुनाव आयोग जैसे संस्थान मजबूत हैं तो अपनी विशेष समझ वाला यह देश हर अंधेरे और कालेपन से निपट सकता है. ये संस्थान ही हमारी जादुई समझदारी के साथ मिलकर एक ऐसा तंत्र बनाते हैं जो बार-बार किसी और ही दिशा में जाते देश और उसे चलाने वालों को वापस उनकी राह पर ले आता है. इन उपकरणों की मजबूती और निष्पक्षता के साथ समझौता नहीं किया जा सकता. इन्हें चलाने वालों की योग्यता और ईमानदारी सुनिश्चित करने के प्रयासों से समझौता नहीं किया जा सकता. अगर हमें असहिष्णु होना है तो इसके लिए हो सकते हैं.

अगर देश को सही राह पर चलते देखना है तो ऐसी असहिष्णुता जरूरी है.