‘कोठागोई (चतुर्भुज स्थान के किस्से)’ से : तुमको तो हमेशा जल्दी रहती है. जानते हो, किस्से-कहानी जल्दी-जल्दी में सुनाए जाएं तो अपना सत खो देते हैं, जो उसका सच होता है सब झूठ बन जाता है. अब तुमने टोक दिया, देखना तुमको कहानी का सत नहीं फलेगा...
नहीं वहां कोई वेश्यालय नहीं था. चतुर्भुज स्थान वेश्यालय बिल्कुल नहीं था. बहुत बाद में यह समझ में आया, शुक्ला रोड के चौराहे से निकलने वाले चार रास्ते आगे चतुर्भुज स्थान की सात गलियों में मिल जाते थे. सुर की गलियां, संगीत की गलियां, हुनर की गलियां, फेन की गलियां, उरूज की गलियां, जवाल की गलियां…


किताब - कोठागोई (चतुर्भुज स्थान के किस्से)
लेखक - प्रभात रंजन
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन
मूल्य - 295 रुपया



किस मिट्टी के बने होते हैं वो लोग जो वर्जित जगहें गुलजार करते हैं? कौन-सी तान उन्हें मुख्यधारा की डरपोक राह से अलग करती है? बेचैनियों की कौन-सी मूरतें ये लोग खुद में ही गढ़े होते हैं? कला की अनिवार्य शर्तें इन्हें जीवन के किन कोने अंतरों में खींचती है? क्यों चतुर्भुज स्थान बन जाता है? संगीत किसने बनाया? गीत? धुन? ईश्वर ने? गानेवाले किसने बनाए और नाचने वाले? रिझाने वाले? दिल बहलाने वाले? ईश्वर ने? तो फिर कोठे किसने बनाए? जिसने कोठे बनाए क्या उसने ही दोयम दर्जे की नागरिकता का आविष्कार किया?
कोठागोई नाम की यह किताब इन सवालों को जन्म देती है. अगर आप इन सवालों से पूर्व परिचित हैं और दुनियादारी में इन्हें बिसराए बैठे हैं तो फिर यह किताब आप में इन सवालों को जगाती है.
यह ‘कोठागोई’ समय की विभिन्न परतों में भी आवाजाही करती है. मसलन जिन गलियों में शरत बाबू टहलते हुए मिलते हैं, उन्हीं में अपना लेखक भी दो बार टहलता हुआ मिलता है
यह किताब मुजफ्फरपुर के चतुर्भुज स्थान नामक स्थान की कथा है. उसका मौखिक इतिहास है. नृत्य-गायन-वादन के लिए एक जमाने में मशहूर यह चतुर्भुज स्थान कितनी ही किंवदंतियों का गवाह है. या क्या पता वह सच की घटनाएं रही हों पर समय ने उन्हें किंवदंतियों में बदल दिया हो. मसलन, शरतचन्द्र चटोपाध्याय. देवदास. इस किताब के दूसरे अध्याय ‘सुना गुना समझा जाना बुना’ में दर्ज है. एक नहीं अनेक लोगों की श्रुति पर आधारित यह अध्याय बताता है कि कैसे और कब शरतचन्द्र यहां आकर रहे? कितना समय गुजारा? किन गलियों को झांका? कितने लोग उनकी सोहबत में रौशन हुए? जब शरतबाबू यहां से रुखसत हो रहे थे, तो कहने वालों ने कहा, कि देवदास नामक रचना का जन्म हुआ.
यह ‘कोठागोई’ समय की विभिन्न परतों में भी आवाजाही करती है. मसलन जिन गलियों में शरत बाबू टहलते हुए मिलते हैं, उन्हीं में अपना लेखक भी दो बार टहलता हुआ मिलता है : पहली बार बचपन में, जब वो बताता है कि स्कूल के दिनों में उसके लिए इन गलियों का महत्व क्या था और दूसरी बार उस ‘पहली दफे’ की स्मृति में. पर दोनों समय के वर्णन में आत्म और वस्तुनिष्ठता का फर्क है, जो कि वाजिब है.
यह किताब बहुत जगहों पर ‘नोस्तेल्जिक’ कर देती है, वह भी तब जब आप इस जगह और इन लोगों से दूर-दूर तक न जुड़े हों. जैसे, पन्ना बाई की स्मृति में लिखा अध्याय. ‘गुमनाम कवि बदनाम गायिका’ शीर्षक से वह अध्याय बेधक है. एक गायिका के जलवे, उसकी गायकी, उसकी शान और उसके नाम...यह सब पन्ना बाई के इस लगभग जीवनचरित में शामिल है. एक किस्सा जो किसी रईस को महफिल से बाहर निकालने को लेकर है, वह दरअसल चतुर्भुज स्थान के चरित्र को बयान करता है. ये पेशेवर लोग आत्मसम्मान को किस कदर बचाकर रखते हैं, इसकी नजीर उस घटना से जान पड़ती है.
इस किताब के वर्णन इतने जीवंत हैं कि लगता है, आप उन्हीं पात्रों के अगल-बगल कोई गाव-तकिया दबाए बैठे हैं. एक जगह के बनने-संवरने-उजड़ने की इस कथा में हर तरह के भाव हैं
इसी अध्याय में वो गुमनाम कवि हैं : जगतभ्रमर. इनके गीत पन्ना गाती हैं और क्या खूब गाती हैं :
जब इश्क है बेचैनी का सबब / क्यों मिल जाएं आराम धरें. तुम चाह करो हम चाह करें..........
इस अध्याय को लिखते हुए लेखक दरअसल अपने प्रिय लेखक गैब्रियल गार्सिया मार्खेज को श्रद्धांजलि दे रहा होता है. मार्खेज ने भी ‘शकीरा’ पर एक अद्भुत अध्याय लिखा है.
पन्नाबाई की तर्ज पर एक और शख्सियत आकार लेती है : गौहर खान. अपने अब्बा का एक कौल सुन कर उन्हें अपने जीवन का मकसद समझ आया. वह कौल काबिल-ए-गौर है :
यह कह के शाखे-गुल भी शजर से जुदा हुआ / इज्जत उसे मिली जो वतन से निकल गया.
कहना यह कि इस किताब में नगीने बिखरे हैं. उनके बारे में जानना उन्हें जज्ब करने जैसा है. बाज मर्तबा इस किताब के वर्णन इतने जीवंत हैं कि लगता है, आप उन्हीं पात्रों के अगल-बगल कोई गाव-तकिया दबाए बैठे हैं. एक जगह के बनने-संवरने-उजड़ने की इस कथा में हर तरह के भाव हैं.
कुछेक जगह और बस कुछेक जगह ही, पात्रों और जगहों के बारे में पढ़ना, मार्च महीने में पुलोवर पहनने जैसा भाव देता है. आप स्वेटर निकालना नहीं चाहते पर पहने रहना भी बेचैन करता है.
यह किताब हिंदी के लिए एक नया रास्ता खोलेगी. इसके लिए प्रभात रंजन बधाई के हकदार हैं. यह बहुत अच्छा होगा कि लोग ऐसी जगहें खोजें. वहां के अनाम-ग्राम किस्से खोजें. दर्ज करें. क्यों? क्योंकि हर वो जगह जहां इंसान हैं, चतुर्भुज स्थान है.