यदि मासिक धर्म या पीरियड्स पूरे परिवार और समाज के लिए भी कोई जरूरी मुद्दा है, तो इसे घर के पुरुषों से दूर और दबाकर क्यों रखना चाहिए?
कुछ समय पहले केरल के अयप्पा मंदिर के पुजारियों ने यह तय किया कि मासिक धर्म यानी पीरियड्स के दौरान कोई भी लड़की मंदिर में प्रवेश नहीं करेगी. त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड के अध्यक्ष गोपालकृष्णन ने कहा कि मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक ऐसी मशीन लगाई जानी चाहिए जो यह सुनिश्चित करे कि मंदिर में प्रवेश करने वाली लड़कियों/स्त्रियो के पीरियड्स नहीं चल रहे.
घोर भेदभाव से भरे मंदिर प्रशासन के इस फैसले के विरोध में 20 साल की निकिता आजाद ने ‘हैप्पी टू ब्लीड‘ अभियान चलाया. फेसबुक पर शुरू हुए इस अभियान में निकिता ने युवतियों से अपील की कि वे किसी बोर्ड या सेनिट्री नैपकिन पर ‘हैप्पी टू ब्लीड‘ लिखकर अयप्पा मंदिर के पुजारी के फैसले के प्रति अपना कड़ा विरोध जताएं. इस अभियान को लेकर अंग्रेजी के एक चैनल सीएनएन आईबीएन पर एक कार्यक्रम भी आया. यह पहला मौका था जब किसी समाचार चैनल (सार्वजनिक मंच) पर लड़कियों के जीवन के इस ‘बेहद अहम लेकिन गुप्त‘ मुद्दे पर इतनी खुलकर चर्चा हुई.
यदि यह सिर्फ स्त्रियों की समस्या है तो किसी भी पुरुष, पंडे-पुजारी या पितृसत्तात्मक सोच में पगी स्त्री को इसके बारे में एक शब्द तक नहीं बोलना चाहिए.
भारत के ज्यादातर घरों के मंदिरों में आज भी, अयप्पा मंदिर के फैसले जैसे अघोषित नियम सदियों से लागू हैं! लड़कियों को महीने-दर-महीने होने वाली ब्लीडिंग कोई खुश होने जैसा मुद्दा तो कतई नहीं है, पर यह ‘हैप्पी टू ब्लीड‘ अभियान एक स्वागतयोग्य पहल जरूर है. ऐसे अभियान इस सोच को मजबूत करते हैं, कि लड़कियों के पीरियड्स नहीं, बल्कि समाज की ऐसी सोच कलंक और शर्म का विषय है. अपने इस अभियान के बारे में निकिता कहती हैं, ‘यह अभियान मंदिर में लड़कियों के प्रवेश के लिए नहीं है, बल्कि समाज में होने वाले लिंगभेदी पितृसत्तात्मक व्यवहार के प्रति एक विरोध प्रदर्शन है.'
ब्लीडिंग यानी खून बहना. खून बहना अपने आप में सिर्फ दो चीजों का प्रतीक है. या तो बीमारी या हिंसा! जाने-अनजाने में हुई कैसी भी हिंसा. पर हम न तो बीमार हैं और न ही किसी ने हमें जीवन भर का कोई ऐसा जख्म दिया है जो कि जब-तब रिसता रहता है. यह प्रकृति की देन है कि आजीवन (जिंदगी के लगभग 35-40 सबसे कीमती और ऊर्जावान साल) हम इस खून-खराबे में रहती हैं. एक तरह से देखा जाए तो पीरियड्स स्त्री देह के साथ प्रकृति द्वारा की जाने वाली हिंसा है! गुपचुप हिंसा. न कहीं कोई शोर-शराबा. न हाथों में हथियार. न खून में उबाल, न वैचारिक मतभेद, न कोई पुश्तैनी दुश्मनी और न ही आत्मघाती हमला या बम विस्फोट. न ही खून खराबे पर कोई रोना-धोना. दवा, मरहम. मातम या फिर कोई अफसोस.
है तो बस गंदगी, उबकाई ला देने वाली बदबू, चिपचिपापन, दर्द, डिप्रेशन, चिड़चिड़ापन, कमर और पेडू का दर्द, भूख मरना और कमजोरी. आने-जाने की दिक्कत, खुद के कपड़ों और बैडशीट पर खून के धब्बे उग आने का डर. पैड के खत्म होने की चिंता. गंदे पैड्स को ठिकाने लगाने की योजना. किसी को कुछ पता न चले की चिंता में बिना मतलब खपता दिमाग. कितने सारे अनछुए पहलू हैं इस ब्लीडिंग के!
खून बहना अपने आप में सिर्फ दो चीजों का प्रतीक है. या तो बीमारी या हिंसा! जाने-अनजाने में हुई कैसी भी हिंसा. पर हम न तो बीमार हैं और न ही किसी ने हमें जीवन भर का कोई जख्म दिया है
सबसे ज्यादा ऊर्जा, उत्साह, जोश, सपनों और योजना से भरे हमारे जीवन के साल इसी मासिक धर्म के खून में सने होते हैं. नैपकिन की सुविधा मिलने के बवाजूद यह अपने आप में बेहद परेशान करने वाली घटना है. और जिनको नैपकिन भी नसीब नहीं उनके पीरियड्स के दिनों की कल्पना तो स्वयं उन लड़कियों के लिए भी असंभव है जिन्हें पैड्स नसीब हैं, फिर पुरुषों की बात ही क्या करें! आज भारत में पीरियड्स से गुजरने वाली लगभग 35 करोड़ से भी ज्यादा लड़कियां/स्त्रियां गांवों में रहती हैं. इनमें से सिर्फ 12 प्रतिशत पैड्स का प्रयोग करती हैं. देश की लड़कियों/स्त्रियों का एक बड़ा प्रतिशत ऐसा है जो पीरियड्स के दौरान कई-कई महीने एक ही कपड़े को धोकर इस्तेमाल करता है, और जिन्होंने पैड्स देखे तक नहीं हैं.
एक लड़की/स्त्री अपनी लगभग पूरी जिंदगी खून के इसी रिसाव के साथ इस उम्मीद में बिता देती है कि कब यह आफत टले. लेकिन यह तब टलती है जब जीवन का सबसे बेहतरीन समय चूक जाता है. हालांकि जब मां बनने का समय आता है तो कुछ समय के लिए प्रकृति की यही हिंसा सबसे बड़ा वरदान भी लगती है.
बेहद अहम सवाल यह है कि क्या पीरियड्स सिर्फ लड़कियों/स्त्रियों की समस्या है या यह परिवार और समाज की समस्या भी है. यदि यह नितांत लड़कियों की समस्या है तो इसके बारे में किसी भी पुरुष, पंडे-पुजारी, या पितृसत्तात्मक सोच में पगी स्त्री को भी एक शब्द तक बोलने की अनुमति हम नहीं देना चाहतीं. हम घर के भीतर की उन स्त्रियों की भी अनदेखी करना चाहती हैं, जो इन पंडे-पुजारियों के ऐसे लिंगभेदी निर्णयों को लागू कराने की जिम्मेदारी संभाल रही हैं. यह हम ही तय करेंगी कि हमें पीरियड्स के दौरान क्या करना है, क्या नहीं. कहां जाना है, कहां नहीं.
घर के पुरुषों को क्यों नहीं बताया जाना चाहिए कि उन्हें माहवारी के कठिन समय में घर की स्त्रियों के साथ कैसे पेश आना है? कैसे वे इस दौरान उनका कुछ सहयोग कर सकते हैं?
लेकिन यदि यह पूरे परिवार और समाज के लिए भी कोई जरूरी मुद्दा है, तो इसे घर के पुरुषों से दूर और दबाकर क्यों रखना चाहिए? उन्हें क्यों नहीं बताया जाना चाहिए कि एक 12-15 साल की किशोरी के लिए, शरीर के एक अंग से अचानक खून बहने लगना कितना खौफनाक होता है. कि बच्ची से लेकर 40-50 साल तक की लड़की/स्त्री किस-किस तकलीफ से गुजरती है इस दौरान? घर के पुरुषों को क्यों नहीं बताया जाना चाहिए कि उन्हें माहवारी के कठिन समय में घर की स्त्रियों के साथ कैसे पेश आना है? या फिर कैसे पीरियड्स से गुजर रही लड़कियों/स्त्रियों को वे कुछ सहयोग कर सकते हैं? या फिर कैसे उस तकलीफ भरे समय में भावनात्मक रूप से स्त्रियों का साथ दे सकते हैं?
वैसे तो किसी भी वर्ग या समूह की कोई भी समस्या सिर्फ उसी वर्ग या समूह की नहीं होती. होनी भी नहीं चाहिए. किसी समूह की समस्या को सिर्फ उसी समूह की समस्या मानना न सिर्फ बेहद अमानवीय है, बल्कि उस समस्या को जड़ से न उखाड़ना है. जैसे बलात्कार, यौन हिंसा, शारीरिक हिंसा सिर्फ स्त्रियों की समस्या नहीं है, ठीक वैसे ही पीरियड्स भी सिर्फ स्त्रियों का मसला नहीं है. घर के बेटों, भाइयों, पतियों, और पिताओं को बेहद शुरू से इस बात की सीख दी जानी चाहिए कि वे कैसे अपनी बहनों, बेटियों, पत्नियों, प्रेमिकाओं और दोस्तों को पीरियड्स के दिनों में सहयोग करें.
यदि आपकी ठस्स बुद्धि यह मानने को तैयार नहीं कि यह मर्दों का भी मसला है, तो फिर हमारे इस मसले को हमें अपने तरीके से निपट लेने दीजिए. स्त्रियों के इस नितांत गुप्त मसले पर आप सिर्फ सहयोग करने के लिए सादर आमंत्रित हैं, भोंड़े और बेशर्म निर्णय लेने वालों के लिए ‘नो एंट्री‘!
यह समाज कितना भयंकर दोगला है जो पीरियड्स के खून को गंदा कहता है, लेकिन उसी खून की बदौलत पैदा हुए बच्चे को ईश्वर का वरदान कहता है! पीरियड्स के दौरान किसी सार्वजनिक मंदिर में प्रवेश के विरोध में उतरने से भी कहीं ज्यादा जटिल और बड़ा लक्ष्य है, हमारे घरों के मंदिरों में पीरियड्स के दौरान प्रवेश. उन घरों में जिनकी कमान किसी पंडे-पुजारी ने नहीं बल्कि घर की स्त्रियों ने, यहां तक कि बहुत सारी शिक्षित और आधुनिक स्त्रियों ने संभाली हुई है.