इंटरनेट जगत की दिग्गज कंपनी याहू खत्म हो गई है. अमेरिकी दूरसंचार कंपनी वेराइजन द्वारा इसके मुख्य कारोबार को 4.83 अरब डॉलर में खरीदने संबंधी सौदा मंगलवार को आधिकारिक रूप से पूरा हो गया. वेराइजन ने ओथ नाम की एक नई सबसिडेयरी कंपनी बनाई है जो इसकी एक दूसरी मीडिया कंपनी अमेरिका ऑनलाइन (एओएल) के साथ-साथ याहूडॉटकॉम, याहूमेल, फ्लिकर और टंबलर जैसी वेबसाइटों का काम देखेगी. इस सौदे पर आखिरी मुहर लगने के साथ ही एक ऑपरेटिंग कंपनी के रूप में याहू खत्म हो गई है.
एक समय शायद ही कोई सोच सकता था कि इंटरनेट के इस दिग्गज का सफर ऐसे खत्म होगा. 1995 में स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के दो छात्रों जेरी यैंग और डेविड फिलो ने इसकी शुरुआत की थी. तरक्की के रास्ते पर इसकी सरपट रफ्तार का आलम यह था कि 1998 आते-आते याहू और इंटरनेट एक दूसरे के पर्याय हो गए. इंटरनेट सर्फ करने वाले किसी भी व्यक्ति का पहला ठिकाना याहूडॉटकॉम ही हुआ करती थी.
लेकिन सदी के आखिर में डॉटकॉम का गुब्बारा फूटा तो याहू को भी तगड़ा झटका लगा. तीन जनवरी 2000 को इसका जो शेयर 118 डॉलर पर चल रहा था उसका भाव 26 सितंबर 2001 को करीब आठ डॉलर पर पहुंच गया.
तरक्की के रास्ते पर इसकी सरपट रफ्तार का आलम यह था कि 1998 आते-आते याहू और इंटरनेट एक दूसरे के पर्याय हो गए. इंटरनेट पर जाने वाले का पहला ठिकाना याहूडॉटकॉम ही हुआ करती थी.
फिर भी इंटरनेट के वे शुरूआती दिन थे और गिरने के बावजूद याहू इस क्षेत्र में बड़ी खिलाड़ी बनी हुई थी. इंटरनेट के भविष्य को देखते हुए बहुत से लोग यह भी मान रहे थे कि समय के साथ वह फिर नई ऊंचाइयों पर पहुंच जाएगी. ऐसा हो भी सकता था, लेकिन कंपनी के नेतृत्व की दिशाहीनता और इसके चलते हुई लगातार बड़ी गलतियां उसे ले डूबीं. वरना हो सकता है कि आज याहू का हमारी जिंदगी में वह असर होता जो गूगल और फेसबुक का मिलाकर है. याहू सर्च और सोशल मीडिया का दूसरा नाम होती.
याहू की सबसे बड़ी गलती यह रही कि उसे गूगल को खरीदने का मौका मिला था, वह भी एक नहीं दो बार, लेकिन उसने यह गंवा दिया. 1997 में वह दस लाख डॉलर में गूगल को खरीद सकती थी, लेकिन उसने यह कहकर यह मौका ठुकरा दिया कि वह नहीं चाहती कि लोग याहू से कहीं और जाएं. उस समय तक गूगल सिर्फ सर्च इंजन था जो कुछ ही सेकेंड में सर्च रिजल्ट्स देकर यूजरों को उनके काम की वेबसाइट तक पहुंचाता था. उधर, याहू चाहती थी कि यूजर उसकी वेबसाइट पर ही रहें. इसलिए याहूडॉटकॉम को डिजाइन भी ऐसे ही किया गया था कि यूजर ईमेल चेक करने, गेम खेलने और खरीददारी करने जैसे काम एक ही विंडो पर कर ले.
फिर भी 2002 में याहू इस गलती को सुधार सकती थी. इस समय तक तो वह अपने सर्च इंजन में भी गूगल की तकनीक का इस्तेमाल करने लगी थी. तब याहू के सीईओ टेरी सेमेल को गूगल की 50 लाख डॉलर कीमत बहुत ज्यादा लगी थी. उन्होंने 30 लाख डॉलर में सौदा पटाने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे. आज गूगल का बाजार पूंजीकरण करीब 522 अरब डॉलर है.
इसी तरह याहू को फेसबुक को खरीदने का मौका भी मिला था. यह 2006 की बात है. तब याहू ने फेसबुक के लिए एक अरब डॉलर की बोली लगाई थी. लेकिन फिर अपने शेयरों में आई गिरावट के कारण उसने इसे घटाकर 85 करोड़ डॉलर कर दिया. फेसबुक के मुखिया मार्क जकरबर्ग ने अपने फैसले पर दोबारा सोचा और सौदे से पीछे हट गए. आज फेसबुक का बाजार पूंजीकरण करीब 250 अरब डॉलर है.
तब भी याहू इस दुर्गति को टाल सकती थी अगर उसने 2008 में माइक्रोसॉफ्ट का ऑफर न ठुकराया होता. तब गूगल की चुनौती से निबटने की जुगत में लगी माइक्रोसॉफ्ट याहू के लिए 44 अरब डॉलर देने को तैयार थी. लेकिन याहू के बोर्ड ने यह कहते हुए यह पेशकश ठुकरा दी कि कीमत काफी कम है. आठ साल बाद आज वह इससे करीब 10 गुना कम कीमत पर गई है.
यह तो हुई उन सौदों की बात जो याहू ने ठुकरा दिए. लेकिन जो सौदे इसने किए भी और जो इसे काफी आगे ले जा सकते थे, उनसे भी यह कोई फायदा नहीं उठा सकी.
लेकिन जो सौदे इसने किए भी और जो इसे काफी आगे ले जा सकते थे, उनसे भी यह कोई फायदा नहीं उठा सकी. फ्लिकर और टंबलर इसका उदाहरण हैं.
फ्लिकर को ही लें. फेसबुक के सबसे बड़ा सोशल नेटवर्क बनने से पहले फ्लिकर को फोटो ऑनलाइन शेयर करने के लिए जाना जाने लगा था. जानकारों के मुताबिक 2005 में इसे खरीदने के बाद याहू इसे अपने सोशल नेटवर्क के रूप में विकसित कर सकती थी क्योंकि लोग पहले से ही फ्लिकर पर तस्वीरें अपलोड करके उन्हें साझा कर रहे थे. लेकिन याहू ने इसके लिए एक अलग मकसद चुना. यूजर बेस बढ़ाने के बजाय उसने इसे मॉनेटाइज करने या कहें कि तस्वीरों से पैसा कमाने की कोशिश की. यह रणनीति विफल रही. जब सोशल मीडिया नाम का एक सुनहरा मौका दस्तक दे रहा था तो याहू ने फ्लिकर को दूसरी दिशा में दौड़ाने की कोशिश करके यह मौका गंवा दिया.
कुछ ऐसा ही टंबलर के मामले में भी हुआ. इस सोशल नेटवर्क साइट को याहू ने 2013 में खरीदा था. तब तक याहू की कमान मेरिसा मेयर के हाथ में आ चुकी थी जो गूगल में गूगल न्यूज सहित कई इकाइयों का सफल नेतृत्व कर चुकी थीं. लेकिन उन्होंने भी वही गलती दोहराई जो फ्लिकर वाले मामले में हुई थी. याहू ने इसे खरीदने के फौरन बाद न सिर्फ इस पर विज्ञापनों की झड़ी लगा दी बल्कि टंबलर का डिजाइन भी बदल दिया. इससे यूजर चिढ़ गए और टंबलर से याहू को कोई आर्थिक फायदा नहीं हुआ.
वैसे इतना कुछ जानने के बाद यह भी कहा जा सकता है कि याहू के हाथ आने के बाद गूगल और फेसबुक भी शायद किसी दूसरी दिशा में चले गए होते. वे उस ताकत में तब्दील न हुए होते जिसके दम पर आज वे दुनिया पर राज करते हैं.
हालांकि याहू के पास एक दूसरा विकल्प भी था. जानकारों के मुताबिक वह दिग्गज चीनी ई कॉमर्स साइट अलीबाबाडॉटकॉम में अपनी हिस्सेदारी बेच सकती थी और इससे मिलने वाली 30 अरब डॉलर की रकम से अपने इंटरनेट कारोबार में जान फूंकने की कोशिश कर सकती थी. मेयर भी यही चाहती थीं कि कंपनी मोबाइल कॉन्टेंट, वीडियो और सोशल मीडिया के बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश करती रहे. लेकिन याहू का बोर्ड इसके लिए तैयार नहीं हुआ. उसने फैसला किया कि याहू के इंटरनेट कारोबार को ही बेच दिया जाए.
इंटरनेट के आगमन के बाद किसी टेक्नॉलॉजी कंपनी के खेत रहने की यह सबसे बड़ी घटना है.
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