फेसबुक के ऊपर अक्सर परिवारों को तोड़ने का आरोप लगता है. अब उसी ने पितृत्व अवकाश के जरिये एक पहल परिवार की नींव को मजबूत करने की भी की है
फेसबुक के संस्थापक और सीईओ मार्क जुकरबर्ग अपनी नवजात बच्ची मैक्सिमा के साथ इस वक्त पितृत्व अवकाश का आनंद ले रहे हैं. पिछले महीने उन्होंने घोषणा की थी कि वे अपनी बेटी के जन्म के बाद दो माह का पितृत्व अवकाश लेंगे. जुकरबर्ग की इस घोषणा के बाद ही यह निर्णय लिया गया कि फेसबुक के दुनिया भर के फुल टाईम कर्मचारियों (पिताओं) को चार महीने का पितृत्व अवकाश मिलेगा. इससे पहले कंपनी के सिर्फ अमेरिका में रहने वाले कर्मचारियों को ही चार माह का सवेतन अवकाश मिलता था.
फेसबुक के इस निर्णय की घोषणा करते हुए इसके मानवसंसाधन प्रबंधक का कहना था कि 'पितृत्व अवकाश की नीतियों की समीक्षा करते हुए हमने यह निर्णय लिया है, क्योंकि यह अपने लोगों और उनके परिवारों के लिए की जाने वाली बहुत अच्छी चीज है. यूएस से बाहर के नए पिताओं और समलिंगी जोडों के लिए यह बेहद फायदेमंद है.'
बच्चे को नौ महीने गर्भ में रखने, प्रसव और स्तनपान से अलग असंख्य ऐसे काम हैं जो पितृत्व अवकाश देने वाली कंपनियों में काम करने वाले पिता सीखकर बाद में भी कर सकते हैं
मातृत्व अवकाश की तरह पितृत्व अवकाश देने का चलन अब पूरी दुनिया में धीरे-धीरे बढ़ रहा है. माइक्रोसॉफ्ट 12 सप्ताह और अडोबी 16 सप्ताह का सवेतन पितृत्व अवकाश देती हैं. भारत में भी 2005 से केन्द्रीय कर्मचारियों को 15 दिन के पितृत्व अवकाश की सुविधा मिलनी शुरू हुई. अब सातवें वेतन आयोग ने पिता बने केन्द्रीय कर्मचारियों को 2 साल का सवेतन पितृत्व अवकाश देने की सिफारिश की है. यह सिफारिश अभिभावक की भूमिका अकेले निभाने वाले पिताओं के लिए की गई है.
बच्चों की देखभाल के लिए पिताओं को दी जाने वाली ये छुट्टियां एक साथ कईं स्तरों पर सकारात्मक सामाजिक बदलाव की भूमिका लिखती हैं. बच्चों के जन्म के समय से लेकर उनके बड़े होने तक उनके पालन-पोषण की जो जिम्मेदारी अभी तक सिर्फ मां के कंधों पर रही है, पितृत्व अवकाश एक हद तक उसको मां-बाप के बीच बांटने की पहल करता है. पितृत्व अवकाश मिलने के बाद अब पिता ये नहीं कह सकते कि ‘मैं ऑफिस नहीं जाऊंगा तो खाएंगे क्या?' या 'मुझे काम की बड़ी टेंशन है.' बच्चे को नौ महीने गर्भ में रखने, प्रसव और स्तनपान से अलग असंख्य ऐसे काम हैं जो पितृत्व अवकाश देने वाली कंपनियों में काम करने वाले पिता सीखकर बाद में भी कर सकते हैं.
अभी तक ज्यादातर पिता सिर्फ ‘वीर्यदान‘ और संसाधन जुटाने में ही अपनी जिम्मेदारी निभाते आएं हैं. जबकि बदलते वैश्विक सामाजिक परिवेश में मांओं ने मातृत्व की परंपरागत भूमिका से अलग, संसाधन जुटाने में भी अहम भूमिका निभानी शुरू कर दी है. ऐसे में पिताओं का भी दायित्व है कि वे भी बच्चों के पालन-पोषण में अपनी भूमिका तय करें और इसके लिए समाज का दायित्व यह है कि वह इस दायित्व को निभाने में उनकी मदद करे.
बदलते सामाजिक परिवेश में मांओं ने मातृत्व की परंपरागत भूमिका से अलग, संसाधन जुटाने में भी अहम भूमिका निभानी शुरू कर दी है. ऐसे में पिताओं का भी दायित्व है कि बच्चों के पालन-पोषण में अपनी भूमिका तय करें
पितृत्व अवकाश पिताओं को, बच्चों, मांओं, दाम्पत्य जीवन और पूरे परिवार के लिए बेहद सार्थक भूमिका निभाने का मंच देता है. बच्चा पालन में सक्रिय भूमिका निभाने का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि बच्चे अपने पिताओं के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ेंगे. अक्सर ही बच्चों की छोटी-बड़ी सारी जरूरतें सिर्फ मांएं पूरी करती हैं, जिस कारण बच्चे सिर्फ मां से ही भावनात्मक रूप से गहरे से जुड़ते हैं. इससे बच्चों को सिर्फ मां ही इकलौती वह इंसान लगती है जिसके पास होने से उन्हें संतुष्टि होती है. ऐसे में यदि पिता बच्चों की रोज की कुछ जिम्मेदारियों को पूरा करेंगे तो बच्चे उन पर भी कुछ निर्भर होकर मांओं के भार को थोड़ा कम कर देंगे. इससे पिताओं और बच्चों की घनिष्ठता भी बढेगी और इस दौरान ऐसे असंख्य बेहद खूबसूरत पलों से भी उनका राब्ता पडेगा, जिन पर अभी तक सिर्फ मांओं का एकाधिकार है.
पिताओं का बच्चा पालन में सहयोग मांओं के अपराधबोध को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. अक्सर ही मांओं को जरूरत के वक्त ऐसा कोई विकल्प नहीं दिखता जो बच्चों का ठीक से खयाल रख सके. बच्चा पालन में पिताओं को जरा सा भी अनुभव न होने के कारण, जरूरत के समय वे उनसे भी संतोषजनक सहयोग की उम्मीद नहीं कर पातीं. अक्सर ही पिताओं को यह तक नहीं पता होता कि बच्चे की खाने, सोने, रोने और चुप होने की आदतें क्या हैं? यहां तक कि बच्चे के कपड़े कहां रखे हैं, अधिकांश पिताओं को यह तक नहीं पता होता है! पितृत्व अवकाश के दौरान यदि पिता ये सब चीजें सीख लेंगे, तो मांओं के पास वक्त जरूरत बच्चों के लिए खुद से अलग भी एक अच्छा विकल्प हो सकता है. इससे उनमें जब-तब बच्चे से दूर होने पर गहरे तक भर जाने वाला गिल्ट भी कम होगा?
नवजात शिशु के जुड़े ऐसे असंख्य काम हैं जो कि पिता प्रयास करके सीख सकते हैं. यह बेहद भ्रामक धारणा है कि लड़कियों को जन्म से ही बच्चे पालना आता है. लड़की जब मां बनती है और चीजें उसके सिर पर पड़ती है तब वह सारी चीजें सीखती है. बच्चे के जन्म के समय मां भी उतनी ही अनगढ़ और नासमझ होती है जितने कि पिता. यह बात पोस्ट डिलीवरी केयर रूम में देखी जा सकती है, जहां नर्स और डाक्टर अक्सर पहली बार मां बनी लड़कियों को बता रहे होते हैं कि बच्चे को कैसे दूध पिलाना है या उसे डकार कैसे दिलानी है.
अक्सर ही मांओं को जरूरत के वक्त ऐसा कोई विकल्प नहीं दिखता जो बच्चों का ठीक से खयाल रख सके. पिताओं को इसका अनुभव न होने के कारण मांएं उनसे भी संतोषजनक सहयोग की उम्मीद नहीं कर पाती
मांएं चुपचाप बच्चा पालन से जुड़ी सारी छोटी-बड़ी चीजें सीखती हैं, कुछ दूसरों के बताने से कुछ और कुछ अपनी अक्ल लगाकर. बच्चों के अकेले पालन के चलते अक्सर बच्चों की मांएं इतनी थकी होती हैं, कि वे अक्सर झुंझलाई हुई या खीजी हुई रहती हैं. यदि पिता बच्चों की रोज की जरूरतों में से कुछ चीजें सीख लें तो इससे मांओं को बड़ी राहत मिले. मसलन बच्चों को खाना खिलाना, पॉटी कराना, रोने पर चुप कराना, उन्हें सुलाना या फिर उनके साथ खेलना. ये ऐसे काम हैं जिनके लिए किसी डिग्री, पुराने अनुभव या तकनीकी ज्ञान की नहीं बस थोड़ा सा समय देने की जरूरत है. बच्चों के पालन की जिम्मेदारी परस्पर ज्यादा से ज्यादा बांटने से दाम्पत्य जीवन पर भी बेहद अच्छा असर पड़ेगा. माता-पिता के बीच अच्छे संबंध का बेहद सकारात्मक असर अंतत: बच्चे पर भी पड़ता है.
फेसबुक के ऊपर अक्सर ही यह आरोप लगता है कि उसने परिवारों को तोड़ा है, क्योंकि माता-पिता दोनों ही आपस का समय फेसबुक पर बिताते हैं. अब फेसबुक ने एक पहल परिवार की नींव को मजबूत करने की भी की है. उसने पिताओं को यह मौका दिया है कि वे बच्चों के पालन में भूमिका निभाकर न सिर्फ उनके साथ अपने भावनात्मक संबंधों को मजबूत करें, बल्कि अपनी पत्नियों का भी सहयोग करके परिवार के ढांचे को ज्यादा मजबूत करें. फेसबुक ने पितृत्व अवकाश के साथ ही 4000 डॉलर का बोनस भी अभिभावकों को देने की बात कही है, नए बच्चे की जरूरतें पूरी करने के लिए. उसका यह निर्णय निजी क्षेत्र के लिए एक आदर्श स्थापित करता है. पितृत्व अवकाश न सिर्फ स्त्री-संवेदी समाज का सूचक है, बल्कि स्वस्थ परिवार और समाज की बुनियादी जरूरत भी है.