दिलीप कुमार साहब को हम सभी एक अद्भुत एक्टर के तौर पर तो जानते हैं लेकिन एक गायक के तौर पर नहीं. हालांकि उन्होंने कुछ इक्का-दुक्का गीतों में दो-चार लाइनें गायीं हैं ये जरूर हमें पता है. इनमें उनकी आवाज की गेस्ट एपीयरेंस वाला कर्मा का ‘ऐ सनम तेरे लिए’ गीत आता है जिसकी शुरुआती चंद पंक्तियां उन्हीं की आवाज में थीं. लेकिन ऐसे गीतों के इतर एक गीत ऐसा भी है जिसमें उनकी आवाज की गेस्ट नहीं फुल अपीयरेंस थी और शायद यह हिंदी फिल्मों के लिए दिलीप साहब का गाया इकलौता पूरा गीत भी है.
हम बात कर रहे हैं 1957 में आई ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म ‘मुसाफिर’ की. यह फिल्म इसलिए भी खास है क्योंकि यह बतौर निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की पहली फिल्म थी. हास्य कलाकार केष्टो मुखर्जी की भी यह पहली फिल्म थी और इसमें गीतकार शैलेंद्र का भी एक छोटा सा अपीयरेंस था. लेकिन यह सबसे खास सिर्फ इसलिए है क्योंकि इसमें दिलीप साहब ने फिल्म के संगीत निर्देशक सलिल चौधरी के कहने पर एक पूरा क्लासिकल गीत गाया था जिसके बोल थे, ‘लागी नाहीं छूटे, चाहे जिया जाए’. एक और दिलचस्प बात है कि इस युगल गीत में उनकी सहयोगी गायिका लता मंगेशकर थीं. इस गाने को गाना बेहद मुश्किल इसलिए भी था क्योंकि इसमें ज्यादातर समय वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल न के बराबर किया गया है.
हुआ ये था कि एकबार फिल्म के सेट पर दिलीप साहब अपनी धुन में कुछ गुनगुना रहे थे और उन्हें सुनकर सलिल दा जैसे संगीतकार इतने प्रभावित हुए कि उनसे एक गाना गंवाने की जिद कर बैठे. राग आधारित यह गीत अगर आप सुनें तो खुद ही समझ जाएंगे कि शैलेंद्र के लिखे इस गीत को दिलीप साहब ने सुर में रहते हुए क्या खूब गाया था. उस दौर में ऑटो-ट्यून भी नहीं था कि खराब आवाज को आज की तरह मधुर बना देता, इसलिए लता मंगेशकर के साथ वाले इस क्लासिकल गीत को सुनने पर साफ जाहिर होता है कि दिलीप साहब के पास अद्भुत अभिनय के अलावा एक नेचुरल सिंगर वाला कमाल का गला भी था. हालांकि ऐसी मधुर और सधी आवाज का हमारी फिल्में इस एक गाने के अलावा फिर कभी उपयोग नहीं कर पाईं.
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