गंगा की गाय कही जाने वाली इस डॉल्फिन का महत्व हमारी दूध देने वाली थलचर गाय से कहीं ज्यादा है क्योंकि यह गंगा के जिंदा रहने की गारंटी है.
बीते कुछ समय के दौरान गाय सबसे बड़ी राष्ट्रीय चिंताओं में से एक बन गई है. हर तरफ से गाय बचाओ-गाय बचाओ की आवाजें आ रही हैं. इन आवाजों से गाय का कुछ भला हो या न हो लेकिन, उसकी चर्चा तो हो ही रही है.
मगर देश में एक गाय ऐसी भी है कि जिसे बचाने की न तो कोई गंभीर चिंता दिखती है और न ही उसे बचाने की कोई बड़ी आवाज ही सुनी जाती है. इसके बावजूद कि इस गाय का महत्व हमारी दूध देने वाली थलचर गाय से कहीं ज्यादा है. यह गाय गंगा के जिन्दा रहने की गारंटी है और इस लिहाज से समूचे गंगा बेसिन यानी लगभग आधे भारत के बचे रहने की गारंटी भी. यह गाय है गांगेय डॉल्फिन.
डॉल्फिन को बहुत समझदार प्राणी माना जाता है और सामाजिक भी. शायद इन्ही वजहों से 2013 में डॉल्फिन को ‘नान ह्यूमन पर्सन’ घोषित किया गया था. नान ह्यूमन पर्सन यानी वह जीव जो इंसान न होते हुए भी इंसानों की तरह जीना जानता है और उसी तरह जीने का हक भी रखता है. चाहे देर से ही सही मगर अब गंगा की सफाई की नमामि गंगा परियोजना में डॉल्फिन संरक्षण को प्रमुखता मिलने से इस बात की थोड़ी उम्मीद जगी है कि डॉल्फिन को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ेगी, लोग इसको बचाने के लिए भी आगे आएंगे.
नमामि गंगा परियोजना में डॉल्फिन संरक्षण को प्रमुखता मिलने से इस बात की थोड़ी उम्मीद जगी है कि डॉल्फिन को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ेगी
इसी कार्यक्रम के तहत पहली बार सात राज्यों में गंगा की डॉल्फिनों की गिनती की जा रही है. उत्तर प्रदेश में राज्य के वन विभाग और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इण्डिया के प्रयासों से हुई इस गिनती के नतीजे उत्साहजनक आए हैं. अगर इन आंकड़ों पर यकीन किया जाए तो 2012 में 671 की तुलना में 2014 में उत्तर प्रदेश में डॉल्फिनों की संख्या बढ़ कर 1263 हो गई है. यानी लगभग दुगनी. गंगा की सहायक नदियों गेरूआ व कोडियाना में 75, शारदा के संगम से अयोध्या तक घाघरा में 138 और अयोध्या से दोहरीघाट तक 80 डॉल्फिनें देखी गई. तराई इलाके में भी इनकी संख्या 2012 में 69 के मुकाबले बढ़ कर 293 हो गई है.
गंगा की डॉल्फिन की बढ़ती संख्या से यह लगता है कि भले ही गंगा का प्रदूषण कम न हुआ हो, मगर लोगों की जागरूकता बढ़ने से डॉल्फिन कुछ हद तक संरक्षित हो रही हैं. इन आंकड़ों से उत्साहित विशेषज्ञ भाष्कर दीक्षित का अनुमान है कि पूरी गणना के बाद भारत में डॉल्फिनों की संख्या 3500 से ज्यादा हो जाएगी. अब तक देश में 2000 से भी कम डॉल्फिन बची होने का अनुमान था और उनकी संख्या लगातार कम होती जा रही थी.
गंगा की इस गाय का वैज्ञानिक नाम प्लेटैनिस्टा गैंजेटिका गैंजेटिका है. सामान्य तौर पर इसे गैंजेटिक डॉल्फिन या गांगेय डॉल्फिन कहते हैं. क्योंकि सांस लेने के लिए सतह पर आते समय यह तेज आवाज करती है इसलिए इसे सूंस, सोंस या हीहू भी कहा जाता है. कुछ इलाकों में इसे मीठे पानी का बाघ भी कहा जाता है. गंगा के तटीय गांवों में कुछ जगहों पर इसे जलपरी से भी जोड़ा जाता है तो कहीं इसे पानी की नर्तकी माना जाता है. बिहार के सारण क्षेत्र में तो बाकायदा इसकी पूजा भी होती है.
डॉल्फिन के लिए अभियान
डॉल्फिन के लिए अभियान
सामान्यतः डॉल्फिन समुद्रों में रहती हैं. दुनिया में साफ पानी वाली नदियों में रहने वाली डॉल्फिनों की कुल तीन ही प्रजातियां हैं और सभी खतरे में हैं.
कुछ कछुओं और सरीसृपों के साथ-साथ डॉल्फिन पृथ्वी पर पाए जाने वाले सबसे पुराने प्राणियों में से एक है. सामान्यतः डॉल्फिन समुद्रों में रहती हैं और इनकी कुछ प्रजातियां समुद्र के साथ नदियों में भी रह लेती हैं. लेकिन दुनिया में साफ पानी वाली नदियों में रहने वाली डॉल्फिनों की कुल तीन ही प्रजातियां हैं और सभी खतरे में हैं. इनमें से दक्षिण अमेरिका की अमेजन नदी में पाई जाने वाली ‘बोटो’ नामक डॉल्फिन सबसे अधिक यानी लगभग 9000 से ज्यादा संख्या में मौजूद हैं. हालांकि इनकी संख्या भी पिछले दस वर्ष में एक तिहाई कम हो चुकी है. चीन की यांगत्से नदी में पाई जाने वाली ‘बैजी’ नामक डॉल्फिन तो अब विलुप्त ही हो गई है. अंतिम बार इसे 2002 में देखा गया था और 2006 में भी एक बार देखे जाने का अपुष्ट दावा हुआ था.
तीसरी प्रजाति भारतीय उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली गांगेय डॉल्फिन की है. हालांकि 1998 तक पाकिस्तान में सिंधु और उसकी सहायक नदियों में पाई जाने वाली डॉल्फिन ‘मुलन’ को एक अलग प्रजाति माना जाता था लेकिन डीएनए जांच व अन्य शोध परिणामों के आधार पर अब इसे भी गांगेय डॉल्फिन की ही प्रजाति माना जाता है और अब इसका वैज्ञानिक नाम प्लैटेनिस्टा गैंजेटिका माइनर हो गया है.
गांगेय डॉल्फिन ढाई से तीन मीटर लम्बी और 150 किलो से ज्यादा वजनदार होती है. इसकी लम्बी पूंछ पर मौजूद फिन शिकार पकड़ने और तैरने में जबकि घडि़यालनुमा लम्बा थूथन शिकार निगलने में इसकी मदद करता है. इसके पास आंखें नहीं होती और यह ध्वनि तरंगों के जरिए देखने और सुनने का काम करती है. डॉल्फिन की औसत उम्र 28 वर्ष होती है और दस वर्ष की उम्र के बाद यह प्रजनन के योग्य हो जाती हैं.
आम तौर पर डॉल्फिन को मछली जैसे आकार के कारण मछली समझ लिया जाता है. लेकिन, असल में यह हमारी गाय की तरह ही स्तनपायी जीव है.
आम तौर पर डॉल्फिन को मछली जैसे आकार के कारण मछली समझ लिया जाता है. लेकिन, असल में यह हमारी गाय की तरह ही स्तनपायी जीव है. मादा प्रायः हर तीसरे वर्ष एक बच्चा पैदा करती है. अब तक कृत्रिम रूप से इन डॉल्फिनों का प्रजनन नहीं कराया जा सका है, इस कारण भी इनके विलुप्त होने का खतरा बढ़ गया है और संख्या वृद्धि के लिए यह सिर्फ प्राकृतिक परिस्थितियों पर ही निर्भर रह गई है.
गांगेय डॉल्फिन बहुत शर्मीला प्राणी है. इसे सांस लेने के लिए हर आधे मिनट से दो मिनट तक के अंतराल में पानी की सतह पर आना होता है और अनेक बार यह सतह पर आते समय ऐसी करवटें लेती है कि नृत्य का सा आभास होता है. लेकिन यह सतह पर बहुत ही कम समय के लिए आती है इसलिए इसकी तस्वीरें खींचना भी बहुत मुश्किल होता है. इसकी हलचलें देखना ब्रिटिश काल में अंग्रेज अधिकारियों का एक प्रिय खेल होता था.
सिलेटी-मटमैली डॉल्फिन हमारे पर्यावरण के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. इसका कारण यह है कि यह नदी के परिस्थितिकी तंत्र की सेहत का पैमाना मानी जाती है. जिस तरह हमारे जंगलों की खाद्य श्रंखला में बाघ सबसे ऊपर होता है उसी तरह गंगा की खाद्य श्रृंखला में डॉल्फिन सबसे ऊपर है. उत्तर प्रदेश वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी आशुबोध पंत के मुताबिक डॉल्फिन गंगा की सेहत की पहचान है. गंगा के जल की स्वच्छता और गुणवत्ता की पहचान है. वे कहते हैं, 'पानी जितना साफ होगा उसमें डॉल्फिन के होने की संभावना उतनी ही अधिक होगी. यह खुद भी पानी को साफ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.'
'पानी जितना साफ होगा उसमें डॉल्फिन के होने की संभावना उतनी ही अधिक होगी. यह खुद भी पानी को साफ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.'
भारत में डॉल्फिन गंगा के अलावा चम्बल, गण्डक, घाघरा, सोन, यमुना, कोसी और ब्रह्मपुत्र, तीस्ता, मानस, दिबांग, लोहित आदि नदियों में पाई जाती है. नेपाल में यह करनाली, सांगू जैसी नदियों में दिखती है. कभी-कभी यह बांग्लादेश में भी दिख जाती है. इसके बारे में पहला अध्ययन इसका नामकरण करने वाले विलियम रोक्सवर्ग ने 1801 में किया था. 1878 में डॉ जान एंडरसन ने एक गांगेय डॉल्फिन को पकड़ कर एक पोखर में दस दिनों तक जिन्दा रख कर उसका अध्ययन किया था और तब इसके बारे में पहली बार काफी जानकारियां मिली थीं.
बीसवीं सदी के मध्य तक भारत में इस प्रजाति की संख्या 50 हजार से अधिक मानी जाती थी. लेकिन उसके बाद यह बहुत तेजी से विलुप्त होने की कगार पर पहुंचने लगी. कभी गंगा में डॉल्फिनों के 80 से 90 तक के झुंड दिखाई देते थे मगर अब यह एक साथ दो से अधिक नहीं दिखतीं. 1998 में इनकी संख्या महज 5000 के आसपास आंकी गई थी.
दरअसल डॉल्फिनों की घटती संख्या का सीधा रिश्ता गंगा और अन्य नदियों की सेहत से जुड़ा है. जैसे-जैसे इन नदियों में प्रदूषण बढ़ता गया वैसे वैसे डॉल्फिनों की संख्या कम होती चली गई. प्रमुख रूप से इसके लिए नदियों में बन रहे बांध और सिंचाई परियोजनाएं, औद्योगिक प्रदूषण, कीटनाशक और रसायन तथा अवैध खनन जैसे कारण जिम्मेदार हैं.
डॉल्फिनों की घटती संख्या का सीधा रिश्ता गंगा और अन्य नदियों की सेहत से जुड़ा है. जैसे-जैसे इन नदियों में प्रदूषण बढ़ता गया वैसे वैसे डॉल्फिनों की संख्या कम होती चली गई.
एक अन्य कारण डॉल्फिन का शिकार भी है. हालांकि डॉल्फिन का मांस बहुत लोकप्रिय नहीं है और मछुआरों की ज्यादातर जातियां इन्हें मारती नहीं. लेकिन ब्रह्मपुत्र के ऊपरी इलाकों में और पटना के आसपास कुछ जातियां इसका शिकार मांस के लिए भी करती हैं. वैसे ज्यादातर डॉल्फिन मछली के शिकार के लिए जालों में बांधे जाने वाले चारे और तेल के लिए मारी जाती हैं. इसका तेल मछलियों को पकड़ने के लिए काम आता है और कुछ दवाओं में भी इसका इस्तेमाल होता है. नदी में प्रदूषण बढ़ने से डॉल्फिनों की प्रजनन क्षमता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है.
वैसे तो जिस भारतीय परंपरा में गंगा को मां का दर्जा दिया गया है उसी भारतीय परंपरा में डॉल्फिन को गंगा का वाहन भी माना गया है. डॉल्फिन को न मारने का राज्यादेश भी भारत की ऐतिहासिक परम्परा में मिलता है. मौर्य सम्राट अशोक ने ईसापूर्व 246 में अपने राज्य में लगाए पांचवें स्तम्भ में स्पष्ट रूप से अनेक वन्य जीव जन्तुओं को न मारने का जो आदेश अंकित कराया है उसमें गंगा पुपुता के नाम से डॉल्फिन का भी जिक्र है. प्राकृत में पुपुता कहे जाने वाले जीव का संस्कृत समानार्थी शिशुमार है जो गांगेय डॉल्फिन के लिए इस्तेमाल हुआ है. 1994 में इनकी घटती संख्या को देखते हुए डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने इन्हे असहाय जीव की श्रेणी में रख दिया था. मगर 1996 में इंटरनेशनल यूनियन ऑफ कंजरवेशन ऑफ नेचर ने इन्हें और अधिक खतरे में मानते हुए विलुप्तप्राय के साथ साथ 'मोस्ट इनडेंजर्ड स्पीसीज' घोषित कर दिया.
जिस भारतीय परंपरा में गंगा को मां का दर्जा दिया गया है उसी परंपरा में डॉल्फिन को गंगा का वाहन भी माना गया है. डॉल्फिन को न मारने का राज्यादेश भी हमारी ऐतिहासिक परंपरा में मिलता है.
हालांकि डॉल्फिन संरक्षण की दिशा में देश के पहले डॉल्फिन अभयारण्य की स्थापना 1991 में ही हो गई थी. बिहार के भागलपुर जिले में सुल्तानगंज से कहलगांव तक से 65 किलोमीटर के क्षेत्र में गंगा पर बना विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन अभयारण्य अभी भी देश का एक मात्र डॉल्फिन अभयारण्य है. मगर उच्च सुविधाओं तथा संसाधनों के अभाव में यह अभयारण्य डॉल्फिन संरक्षण में बहुत उपयोगी साबित नहीं हो सका है.
इसकी तुलना में स्थानीय स्तर पर डॉल्फिन संरक्षण के लिए किए जाने वाले प्रयास ज्यादा असरदार हैं. डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इण्डिया ने 1997 में गांगेय डॉल्फिन बचाने का अभियान शुरू किया था. इसके तहत चारे के लिए डॉल्फिन के मांस का प्रयोग न करने और अपर गंगा क्षेत्र में डॉल्फिन के आवास क्षेत्रों के आसपास खनन रोकने तथा खेती में कीटनाशकों का इस्तेमाल न करने के लिए जागरूकता अभियान चलाया गया.
पटना के डॉ रवीन्द्र कुमार सिन्हा आदि के प्रयासों से 2009 में गांगेय डॉल्फिन को भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव (नेशनल एक्विटिक एनीमल ऑफ इण्डिया) घोषित कर दिया गया था. इसके बाद असम में ब्रह्मपुत्र में डॉल्फिन का शिकार करने पर कड़े प्रतिबन्ध लग गए. भारतीय वन्य जीव अधिनियम के मुताबिक डॉल्फिन मारना उसका मांस या तेल रखना या इस्तेमाल करना प्रतिबंधित है और इस अपराध के लिए कम से कम छह हजार जुर्माना और छह वर्ष तक की सजा हो सकती है. ब्रह्मपुत्र के इलाकों में डॉल्फिन कंजरवेशन प्रोजेक्ट, ‘आरण्यक’ ने मछुवारों को चारे के लिए डॉल्फिन के तेल के बजाय कॉड लीवर आयल या अन्य विकल्प बांट कर सराहनीय प्रयास किया है. पश्चिम बंगाल में तो अब एक और सुरक्षित आवास बनाए जाने की चर्चा हो रही है. वहां डॉल्फिन संरक्षण का काम ‘रिवर फॉर लाइफ’ अभियान के तहत चलाया जा रहा है और मालदा तथा सुन्दर वन के बीच हुगली नदी को डॉल्फिन कम्युनिटी रिजर्व के रूप में विकसित करने की योजना है.
कानून के मुताबिक डॉल्फिन मारना उसका मांस या तेल रखना या इस्तेमाल करना प्रतिबंधित है और इस अपराध के लिए कम से कम छह हजार जुर्माना और छह वर्ष तक की सजा हो सकती है.
उत्तर प्रदेश में भी ‘माय गंगा माय डॉल्फिन’ के नाम से एक सरकारी अभियान चल रहा है मगर यहां कुछ स्वयं सेवी संगठन भी गंगा के तटीय इलाकों में डॉल्फिन संरक्षण के लिए जागरूकता अभियान चला रहे हैं. ये लोग नुक्कड़ नाटकों के जरिए लोगों को जागरूक करने के लिए धार्मिक मान्यताओं का भी सहारा ले रहे हैं. इनके अनेक नाटकों में से एक नाटक गंगा अवतरण का भी है जिसमें बाल्मीकि रामायण के गंगावतरण प्रसंग के जरिए बताया जाता है कि गंगा के साथ-साथ शिव की जटाओं से शिशुमार भी धरती पर अवतरित हुई थीं. इसलिए जितनी पूज्य गंगा है उतनी ही दोस्त शिशुमार यानी डॉल्फिन भी हैं.
बहरहाल उत्तर प्रदेश में गांगेय डॉल्फिन की बढ़ती हुई संख्या से यह उम्मीद जगी है कि गंगा साफ हो या न हो, इंसान का यह प्यारा दोस्त अभी कुछ साल और जी सकेगा.