पेरिस में ऐतिहासिक समझौते के साथ जलवायु-परिवर्तन की रोकथाम का रास्ता भले ही तय हो गया हो, लेकिन अब भी दुनिया के इस राह से भटकने की खासी गुंजाइश बनी हुई है.
मुझे कोई आपत्ति सुनाई नहीं पड़ रही है,' पेरिस में दो हफ्ते से चल रहे संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन के संचालक और फ्रांस के विदेशमंत्री लौरां फ़ाबियूस ने 12 दिसंबर की रात कहा. भारत की घड़ियों में तब रात के 12 बजने में केवल दो मिनट की देर रह गई थी. 'पेरिस का जलवायु समझौता इसी के साथ मंजूर हो गया है,' फ़ाबियूस के यह कहते ही हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. सम्मेलन के प्रतिनिधि आपस में गले मिलने और एक-दूसरे को बधाई देने लगे. एक चिरप्रतीक्षित सपना साकार होता लगने लगा.
यह समझौता बहुत लंबी, जटिल और सघन वार्ताओं का परिणाम है. उस पर पहुंचने के लिए सम्मेलन की अवधि एक दिन बढ़ानी पड़ी. उसकी बारीकियों और सही शब्दों के चयन के लिए अंतिम 48 घंटों में बंद दरवाज़ों के पीछे लगभग दिन-रात बातचीत होती रही. मंत्री-स्तरीय इन वार्ताओं में बार-बार पैदा हो रहे गतिरोधों को दूर करने के लिए कभी अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रोंस्वां ओलांद ने एक-दूसरे को फ़ोन किया तो कभी दोनों ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से टेलीफ़ोन पर बात की. भारत और चीन एक समय सम्मेलन की सफलता-विफलता की कुंजी बन गए थे.
कभी अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रोंस्वां ओलांद ने एक-दूसरे को फ़ोन किया तो कभी दोनों ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से टेलीफ़ोन पर बात की.
अब नतीजा यह है कि दो दशक से भी ज्यादा समय की जद्दोजहद के बाद पेरिस में दुनिया सर्वसहमति के एक ऐतिहासिक मोड़ तक पहुंच गई है. इस समझौते के साथ जलवायु-परिवर्तन की रोकथाम की दिशा और दायित्व तय हो गए हैं. हालांकि अब भी दुनिया के इस राह से भटकने की खासी गुंजाइश बनी हुई है.
जब पोप को भी हस्तक्षेप करना पड़ा
एक समय मध्य अमेरिका का छोटा-सा देश निकारागुआ इस बात पर अड़ गया कि जलवायु-परिवर्तन की रोकथाम के लिए औद्योगिक देशों को उससे अधिक ज़िम्मेदारी लेनी चाहिये, जितनी समझौते के प्रारूप में लिखी गई है. उसने जलवायुरक्षा के लिए निकारागुआ की ओर से कोई राष्ट्रीय इरादा घोषित करने से भी मना कर दिया. पेरिस सम्मेलन में भाग ले रहे 195 में से 186 देश सम्मेलन के शुरू में ही अपने-अपने इरादे बता चुके थे. नियमानुसार यदि एक भी देश समझौते के प्रारूप का खुल कर विरोध करता है, तो वह पारित नहीं हो सकता था.
निकारागुआा एक कैथलिक देश है. इसलिए फ्रांस ने अपने कूटनीतिक स्रोतों के ज़रिये कैथलिक ईसाइयों के सर्वोच्च धर्माधिकारी पोप फ्रांसिस से अनुरोध किया कि वे निकारागुआा के राष्ट्रपति दानिएल ओर्तेगा को समझाएं. माना जाता है कि पोप ने निकारागुआा के राष्ट्रपति को फ़ोन किया. इसके बाद ओर्तेगा के प्रतिनिधि ने समझौते के प्रारूप का विरोध करना छोड़ दिया.
पेरिस में जो समझौता हुआ है, वह जलवायु-परिवर्तन की रोकथाम करने के तौर-तरीकों के और उनके भावी लक्ष्यों के बारे में ऐसा पहला समझौता है जो विश्वव्यापी है, जिसमें विश्व के सभी देश शामिल हैं और जिसका आधे या पूरे मन से विश्व के सभी देश समर्थन करते हैं. वह 2020 से तब सबके लिए बाध्यकारी हो जाएगा, जब कम से कम 55 ऐसे देश, जो तापमानवर्धक गैसों का कम से कम 55 प्रतिशत हिस्सा उत्सर्जित करते हैं, समझौते की विधिवत पुष्टि, स्वीकृति, अनुमोदन या उसका अंग बनने की घोषणा कर देंगे. समझौते की फ़ाइल 22 अप्रैल 2016 से 21अप्रैल 2017 तक न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में सभी देशों की ओर से हस्ताक्षर के लिए रखी रहेगी.
दो नहीं, केवल एक डिग्री वृद्धि की गुंजाइश
संयुक्त राष्ट्र अंतरशासकीय पैनल के वैज्ञानिकों ने 2009 में एक सिफ़ारिश की थी. वह यह थी कि जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में भीषण प्राकृतिक आपदाएं अगर टालनी हैं, तो 21वीं सदी के अंत में वैश्विक औसत तापमान, 20वीं सदी की शुरुआत के औसत की तुलना में, दो डिग्री सेल्सियस से अधिक नहीं होना चाहिये. उदाहरण के लिए, पूरी 20वीं सदी का औसत वैश्विक तापमान 14 डिग्री सेल्सियस था, जबकि अक्टूबर 2015 में वह बढ़ कर 14.98 डिग्री हो गया था. दूसरे शब्दों में, इस सदी के बाकी बचे 85 वर्षों के दौरान पृथ्वी पर औसत तापमान अब एक डिग्री से अधिक नहीं बढ़ना चाहिये.
समझौते की फ़ाइल 22 अप्रैल 2016 से 21अप्रैल 2017 तक न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में सभी देशों की ओर से हस्ताक्षर के लिए रखी रहेगी.
वैज्ञानिकों के अनुसार, यह तभी संभव है, जब तापमानवर्धक गैसों के उत्सर्जन में, 2010 वाले स्तर की तुलना में 2050 तक 40 से 70 प्रतिशत और 2100 तक शत-प्रतिशत की कमी लाई जा सके. शत-प्रतिशत का अर्थ है, 2100 तक शून्य उत्सर्जन! पेरिस में जिस समझौते पर सहमति बनी है, उसमें समुद्र में विलीन हो जाने का ख़तरा झेल रहे द्वीप-देशों के आग्रह पर तापमानवर्धक गैसों के उत्सर्जन में इस तरह कटौती करने की मांग है कि इस सदी के अाखिर तक पृथ्वी का औसत तापमान 16 डिग्री सेल्सियस के बदले केवल 15.5 डिग्री सेल्सियस तक ही पहुंच सके.
समझौते में इस कटौती की अनुशंसा की गई है, न कि उसे औपचारिक ठोस लक्ष्य घोषित किया गया है. इसे लक्ष्य घोषित करने का अर्थ होता, 2050 से पहले ही तापमानवर्धक गैसों का शून्य के बराबर उत्सर्जन. भारत और चीन ही नहीं, बहुत से विकसित देश भी ऐसा कोई वादा नहीं करना चाहते.
तापमान बढ़ाने वाली कई गैसे हैं
तापमानवर्धक गैसों के उत्सर्जन में कटौती का अर्थ केवल कोयले, गैस और तेल जैसे जीवाश्म ईंधनों के जलने से पैदा होने वाली कार्बन-डाईऑक्साइड के उत्सर्जन में कटौती नहीं है. तापमान बढ़ाने वाली और भी कई गैसें हैं, जो हमारे रहन-सहन, हमारे खान-पान और हमारी खेती-बाड़ी से पैदा होती हैं. ये अन्य गैसे हैं मवेशियों की पाचनक्रिया से, चावल की खेती से, कूड़ागारों में कूड़े के सड़ने से, जलशोधन संयंत्रों की कार्यप्रणाली से और जैविक पदार्थों को जलाने से बनने वाली मीथेन गैस, गाड़ियों के चलने से, रासायनिक खादों के छिड़काव से, पशुपालन से और जीवाश्म ईंधनों को जलाने से पैदा होने वाली डाईनाइट्रोजन ऑक्साइड गैस और एरोसोल कहलाने वाली फ्लोराइड गैसें, जो कूलिंग या आग बुझाने से जुड़े उपकरणों में इस्तेनाल की जाती हैं. इसीलिए पेरिस वाले समझौते में अकार्बनीकरण (डीकार्बोनेशन) के बदले कांचघर-प्रभाव (ग्रीनहाउस इफ़ेक्ट) पैदा करने वाली सभी गैसों के उत्सर्जन को कम करने पर बल दिया गया है.
कार्बन-डाईऑक्साइड के अलावा तापमान बढ़ाने वाली और भी कई गैसें हैं, जो हमारे रहन-सहन, हमारे खान-पान और हमारी खेती-बाड़ी से पैदा होती हैं.
कई देशों की भागीदारी वाले हर प्रकार के अंतरराष्ट्रीय समझौतों की तरह पेरिस के जलवायु समझौते को भी इस तरह बनाया गया है कि हर कोई उसकी शब्दावली में अपनी भी सफलता देख सके. अमेरिका और उसके साथी विकसित देश यह मनवाने में सफल रहे कि जलवायु परिवर्तन को रोकने के मोर्चे पर केवल वे ही नहीं, हर देश यथाशक्ति लड़ेगा. 1997 वाले क्योतो समझौते में यह कह कर सारा भार विकसित देशों पर डाल दिया गया था कि उन्होंने ही अब तक के अपने अंधाधुंध विकास के द्वारा तापमान को बढ़ाया है, इसलिए अब वे ही उसकी रोकथाम की क़ीमत भी चुकाएं. परिणाम यह हुआ कि अमेरिका ने उसे ठुकरा दिया.
हर पांच वर्ष पर समीक्षा
पेरिस में यह नहीं कहा गया कि किस देश को अपना उत्सर्जन कितना कम करना होगा. इसके बदले हर देश ने सम्मेलन की शुरुआत में स्वेच्छा से यह घोषित किया कि वह कितनी कटौती करने का इरादा रखता है. इसे समझौते की एक बड़ी कमी के रूप में देखा जा रहा है. आलोचकों का कहना है कि इरादों की जो अबाध्यकारी घोषणाएं की गई हैं, उनसे तो सदी के अंत तक भूमंडलीय औसत तापमान डेढ़ या दो नहीं, तीन डिग्री तक बढ़ जाएगा. इस संभावना को देखते हुए समझौते में इस समीक्षा की व्यवस्था है कि 2020 में सभी देशों की सरकारों को अपने नए कटौती इरादे बताने होंगे. हर पांच वर्ष बाद इन इरादों को और कसना होगा और 2023 से उत्सर्जन में कटौती के नए इरादों के साथ-साथ उस वित्तीय सहायता का भी हिसाब-किताब देना होगा, जो उदाहरण के लिए विकासशील या अविकसित देशों को मिलेगी.
हर देश ने सम्मेलन की शुरुआत में स्वेच्छा से यह घोषित किया कि वह कितनी कटौती करने का इरादा रखता है. इसे समझौते की एक बड़ी कमी के रूप में देखा जा रहा है.
वित्तीय सहायता के नाम पर तय हुआ है कि जलवायु-परिवर्तन से जूझने वाले ग़रीब देशों की सहायता करने और उनके वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का आधार बढ़ाने के लिए विकसित औद्योगिक देश आपस में मिल कर 2020 से हर वर्ष 100 अरब डॉलर उपलब्ध करवाएंगे. भारत को इसका लाभ संभवतः नहीं मिल सकेगा. भारत और पश्चिम के विकसित देशों के बीच इस सहायता-प्रावधान को लेकर काफ़ी नोक-झोंक हुई. चालाकी यह की गई है कि छह साल पहले ही तय हो चुकी इस सहायता को, पेरिस सम्मेलन के अंतिम क्षण में, समझौते के बाध्यकारी हिस्से ले निकाल कर अबाध्यकारी हिस्से में डाल दिया गया है. कारण यह बताया जा रहा है कि इस नई तरकीब से उसके लिए अमेरिकी कॉंग्रेस (संसद) के अनुमोदन की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. वास्तविक कारण शायद यह है कि वित्तीय सहायता अबाध्यकारी होने पर उसे कानूनी चुनौती देने या सब को उपलब्ध करने की मांग नहीं की जा सकेगी. यह धन सरकारी और ग़ैर-सरकारी, दोनों तरह के स्रोतों से जुटाया जाएगा. संयुक्त राष्ट्र संघ इस सहायता का हिसाब-किताब रखेगा.
जी-7 की जलवायु बीमा योजना
जलवायु-परिवर्तन जनित आपदाओं से होने वाले नुकसानों की कोई औपचारिक क्षतिपूर्ति भविष्य में भी नहीं मिल सकती. सात सबसे उन्नत औद्योगिक देशों का संगठन जी-7, अफ्रीकी, मध्य अमेरिकी और द्वीप देशों को अनौपचारिक राहत पहुंचाने के विचार से एक 'जलवायु बीमा' शुरू करने की सोच रहा है. इस बीमे को 42 करोड़ डॉलर की रकम के साथ शुरू किया जाऐगा. सरकारें और साधारण नागरिक इस बीमे की पॉलिसी लेकर बाढ़, तूफ़ान और सूखे के कारण होने वाले नुकसान का बीमा करा सकेंगे. जर्मनी 15 करोड़, अमेरिका तीन करोड़ और बाकी पांच देश शेष धनराशि जुटाएंगे. यह योजना पेरिस में हुए जलवायु समझौते का हिस्सा नहीं है, पर हो सकता है कि भविष्य में ऐसी ही कोई योजना वैश्विक स्तर पर भी बने.
पेरिस समझौता सर्सम्मति से पारित तो हो गया, पर अब देखना यह होगा कि उसे लागू होने के लिए 21 अप्रैल 2017 तक उसकी पुष्टि की आवश्यक शर्तें भी पूरी हो पाती हैं या नहीं. तब तक अमेरिका में एक नया राष्ट्रपति अपना पद संभाल चुका होगा. यदि वह पेरिस समझौते में मीनमेख निकालने वाली रिपब्लिकन पार्टी का नेता हुआ, तब या तो रंग में भंग भी हो सकता है.