बिहार सरकार ने चक्रवर्ती सम्राट अशोक के उस जन्मदिन पर अवकाश की घोषणा की है जिसके बारे में इतिहासकारों को कुछ पता ही नहीं है
जिन सम्राट अशोक की जाति का पता लगाने में देश और दुनिया के इतिहासकार खाक छान-छानकर थक गये, उन चक्रवर्ती सम्राट अशोक की जाति का चुनाव के पहले भाजपा ने पता लगा लिया था. जिन अशोक की तसवीर दुनिया ने नहीं देखी थी, उनकी तसवीर लगाकर डाक टिकट जारी करने के बाद प्रतिमा लगाने तक का ऐलान केंद्र सरकार ने कर दिया था. अब बची हुई बाजी भी हाथ से न निकल जाये, इसे ध्यान में रखते हुए बिहार की सरकार ने चक्रवर्ती सम्राट अशोक के जन्मदिन का पता लगाकर उस दिन राजकीय अवकाश की भी घोषणा कर दी है.
ऐसा नहीं कि यह यह ऐलान अथवा घोषणा राज्य के किसी ऐरे-गैरे-नत्थूखैरे ने किसी सभा में की है. बल्कि यह कल यानी 15 दिसंबर को कैबिनेट की बैठक में लिया गया फैसला है. खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के द्वारा यह घोषणा की गयी है कि 2015 में तो राज्य सरकार के कर्मियों को 33 दिनों की ही छुटटी मिल सकी थी लेकिन अगले साल यानि 2016 में यह छुट्टी 35 दिनों की हो जाएगी. बढ़ी हुई दो में से एक छुट्टी गुरू गोविंद सिंह की जयंती पर होगी और दूसरी 14 अप्रैल को चक्रवर्ती सम्राट अशोक के जन्मदिन पर.
यह हैरत वाली बात है कि जिन अशोक के जन्म के वर्ष तक का पता नहीं, उनकी जन्मतिथि कैसे निर्धारित कर दी गयी.
बिहार कैबिनेट के इस फैसले की जब घोषणा हुई तो सिर्फ बिहार के ही नहीं बल्कि देश भर के चर्चित इतिहासकार सन्न रह गये. प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर का बयान आया कि यह हैरत वाली बात है कि जिन अशोक के जन्म के वर्ष तक का पता नहीं, उनकी जन्मतिथि कैसे निर्धारित कर दी गयी. खैर, इतिहासकार चाहे जितना बवाल मचाते रहे, बिहार की सरकार ने यह तय किया है तो वह अब अगले साल से अशोक की जयंती पर छुट्टी देकर रहेगी.
मजेदार यह होगा कि इस पर भाजपा बोलने से पहले पचास बार सोचेगी. क्योंकि चुनाव के पहले भाजपा ने ही अशोक की जाति का निर्धारण कर बिहार में इस तरह की राजनीति की शुरुआत की थी. तब बवाल मचा था, सवाल उठे थे तो भाजपा के बुद्धिजीवियों ने कहा था कि हम लोगों के अपने सूत्र हैं, अपना संधान है, जिससे हम सबने मिलकर प्रमाणित किया है कि चक्रवर्ती सम्राट अशोक कुशवाहा थे. बाद में जब केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने अशोक की तसवीर वाले डाक टिकट जारी करने की बात कही थी, तब भी सवाल उठे थे. पूछा गया कि अशोक की तसवीर केंद्र की सरकार कहां से खोजकर ले आई कि डाक टिकट पर उसे लगा रही है. तब यह बताया गया था कि अशोका फिल्म या धारावाहिक में जिस तरह अशोक के किरदार को दिखाया गया है, उसे ही आधार बनाकर ऐसा किया जा रहा है. इस बार नीतीश कुमार की सरकार उसी फाॅर्मूले पर चल रही है.
जब केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने अशोक की तसवीर वाले डाक टिकट जारी करने की बात कही थी, तब भी सवाल उठे थे. पूछा गया कि अशोक की तसवीर केंद्र की सरकार कहां से खोजकर ले आई
बताया जा रहा है कि ऐसा नीतीश कुमार भविष्य को ध्यान में रखकर कर रहे हैं. पिछले कुछ समय से चक्रवर्ती सम्राट अशोक एक ऐसे प्रतीक के तौर पर उभरे हैं, जिनसे कई जातियों ने खुद को जोड़ा है. ये जातियां वर्षों से उनकी जयंती आदि भी मनाती रही है. इनमें सबसे प्रमुख कुशवाहा समुदाय है जिसने सीधे तौर पर बेहद मजबूत तरीके से उनसे खुद को जोड़ा है. चुनाव के आसपास भाजपा ने भी इसे जमकर शह दी.
कुशवाहा बिहार में एक मजबूत पिछड़ी जाति है. वह नीतीश कुमार के साथ रही है लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा के उभार के कारण और इस बार के विधानसभा चुनाव में अन्य कई वजहों से भी पूरी तरह से नीतीश कुमार के साथ नहीं रह सकी. माना जा रहा है कि चक्रवर्ती सम्राट अशोक के जन्मदिन पर छुट्टी के बहाने ही सही, नीतीश कुमार फिर से इस समुदाय को अपने साथ लाने की जुगत भिड़ा रहे हैं.