अगर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से निकली अनुच्छेद 142 की नई व्याख्या स्वीकार कर ली जाए तो सुप्रीम कोर्ट को भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों की नियुक्ति करने से भी कौन रोक सकता है?
हैरान करने वाले एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट की एक खंडपीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक रिटायर्ड जज को उत्तर प्रदेश का लोकायुक्त नियुक्त कर दिया जिसे समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव का करीबी माना जाता है. लोकपाल एवं लोकायुक्त कानून के तहत लोकायुक्त का चयन इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष से मिलकर बनी एक समिति ही कर सकती है.
तो सवाल उठता है कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कैसे किया? सुप्रीम कोर्ट कैसे खुद को अनाधिकारिक रूप से एक दूसरी वैधानिक संस्था की शक्ति ले सकता है?
हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने जस्टिस एसयू खान का नाम सुझाया था. रिटायर हो चुके जस्टिस खान को अपनी ईमानदारी के लिए जाना जाता है. लेकिन साफ है कि उत्तर प्रदेश सरकार के लिए यह असुविधाजनक होता
सुप्रीम कोर्ट का दावा है कि उसने यह काम संविधान के 142वें अनुच्छेद के तहत किया. लेकिन वह अनुच्छेद सिर्फ यह कहता है कि ‘अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय जरूरत पड़ने पर अपने सामने आए किसी मामले में इस तरह की डिक्री पारित कर सकता है या ऐसा आदेश दे सकता है जो पूर्ण न्याय के लिए आवश्यक हो. औऱ इस तरह की कोई भी डिक्री या आदेश भारत के हर हिस्से में उसी तरह से लागू होगा जिस तरह से संसद की बनाई कोई विधि या कानून कहते हों. जब तक ऐसा प्रावधान न हो तब तक वह डिक्री या आदेश राष्ट्रपति के आदेश के अनुसार लागू किया जाएगा.’
अगर अनुच्छेद 142 की नई व्याख्या स्वीकार कर ली जाए तो सुप्रीम कोर्ट को इस अनुच्छेद के तहत भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों की नियुक्ति से भी कौन रोक सकता है?
बात यह भी है कि एक ऐसे व्यक्ति से क्या उम्मीद की जा सकती है जिसे मुलायम सिंह यादव का करीबी बताया जा रहा हो? कहा जा रहा है कि हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने जस्टिस एसयू खान का नाम सुझाया था. रिटायर हो चुके जस्टिस खान को अपनी ईमानदारी के लिए जाना जाता है. लेकिन साफ है कि उत्तर प्रदेश सरकार के लिए यह असुविधाजनक होता.
(यह जस्टिस मार्कंडेय काटजू के ब्लॉग सत्यम ब्रूयात पर अंग्रेजी में प्रकाशित टिप्पणी का हिंदी रूपांतरण है.)