देश भर के छात्र पिछले दो महीनों से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के हालिया फैसलों के खिलाफ दिल्ली की सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं. उनकी मांग है कि यूजीसी अपने उन फैसलों को वापस ले जिनके चलते रिसर्च करने वाले छात्रों की फेलोशिप बंद की जा रही है. साथ ही नैरोबी में हो रही 'विश्व व्यापार संगठन' (डब्ल्यूटीओ) की बैठक का भी ये छात्र विरोध कर रहे हैं. उनके अनुसार डब्ल्यूटीओ में भारत के प्रस्ताव यदि बदले नहीं जाते तो आने वाले समय में शिक्षा एक अधिकार नहीं बल्कि 'व्यापारिक सेवा' बन जाएगी और समाज के कई तबकों की पहुंच से बाहर हो जाएगी. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) को छोड़ कर सभी छात्र संगठन इस आंदोलन में शामिल हैं. शिक्षा क्षेत्र के तमाम विशेषज्ञ भी इस आंदोलन में छात्रों के साथ ही खड़े हैं. आंदोलन में एबीवीपी की अनुपस्थिति और भाजपा और आरएसएस से इसके रिश्तों पर जेएनयू छात्र संघ के जॉइंट सेक्रेटरी और 14 साल बाद जेएनयू की अकादमिक काउंसिल में एबीवीपी की वापसी करवाने वाले सौरभ शर्मा से बातचीत :
देश भर के छात्र पिछले दो महीनों से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के हालिया फैसलों के खिलाफ दिल्ली की सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं. तमाम छात्र संगठन इसमें शामिल हैं. सिर्फ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) इसमें शामिल नहीं है. बल्कि एक वीडियो भी सामने आया है जिसमें एबीवीपी के लोग आंदोलन कर रहे छात्रों को गालियां देते, लड़ाई के लिए ललकारते और झगडा करते नज़र आ रहे हैं. यह भी आरोप हैं कि आपके संगठन के लोग शराब के नशे में आंदोलन स्थल पर पहुंचे थे. इस पर आपका क्या कहना है?
जिस वीडियो की आप बात कर रहे हैं वह सिर्फ 15-20 सेकंड का है. इसमें एकतरफ़ा बात ही दिखती है. हम लोग जब आंदोलन स्थल पर पहुंचे थे तो हमारा स्वागत यह कहते हुए किया गया कि 'मोदी और आरएसएस के दलालों यहां तुम्हारी कोई जरूरत नहीं है, हम लोग यह लड़ाई अकेले लड़ सकते हैं.' उन्होंने यह धमकी भी दी कि 'तुम्हारे जॉइंट सेक्रेटरी को तो हम कैंपस (जेएनयू) में देख लेंगे.' इसके बाद हमारे साथ के कुछ लड़के भड़क गए. उन पर हमने बाद में कार्रवाई भी की. आप वीडियो में भी देख सकते हैं कि हमारे साथ के लोगों ने ही अपशब्द बोलने वालों को रोका और उन्हें पीछे ले गए.
यह बात सही है कि भड़काने के बावजूद भी हमें ऐसा नहीं करना चाहिए था. लेकिन उनकी तरफ से भी गलियां दी गई और हम पर पत्थर फेंके गए. यह उन्होंने वीडियो में नहीं दिखाया है. शराब पीकर वहां जाने की बात पूरी तरह से झूठ है. हम उस पूरी रात वहीँ थे, प्रोटेस्ट कर रहे थे और गिरफ्तार भी हुए थे.
तो फिर अब आप लोग इस आंदोलन से अलग क्यों हो गए?
सौरभ शर्मा
सौरभ शर्मा
क्योंकि अब यह आन्दोलन नहीं सिर्फ प्रोपेगैंडा है. मैं आपको पूरी बात शुरुआत से बताता हूं. यूजीसी के जिन फैसलों के खिलाफ यह आंदोलन चल रहा है उनका विरोध सबसे पहले एबीवीपी ने ही किया था. 21 अक्टूबर को हमने ही सबसे पहले इन फैसलों का विरोध करते हुए रैली करने की घोषणा की थी. इसी दिन हम लोग केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री को ज्ञापन देने भी पहुंचे थे. वे उस दिन नहीं मिलीं लेकिन हमने उनके सेक्रेटरी को ज्ञापन सौंप दिया था.
लेफ्ट विंग के संगठन सिर्फ मांगे पूरी करवाने का श्रेय लेने के लिए प्रोपेगैंडा के तहत इस आंदोलन को जारी रखे हुए हैं. हमें इससे भी कोई परेशानी नहीं है.
इसके कुछ दिनों बाद स्मृति ईरानी जी ने हमें बुलाया. एबीवीपी के 8 लोगों का प्रतिनिधि मंडल उनके आवास पर उनसे मिला. इसमें मैं भी शामिल था. हमने उन्हें अपनी चारों मांगें बताई. एक, नॉन-नेट फेलोशिप जारी रखी जाए. दो, स्टेट यूनिवर्सिटीज में रिसर्च करने वाले छात्रों को भी फेलोशिप दी जाए. अभी सिर्फ केन्द्रीय विश्वविद्यालय में रिसर्च कर रहे छात्रों को ही यह मिलती है. तीन, फेलोशिप का पैसा कॉलेज के खाते में नहीं बल्कि सीधे छात्रों के खाते में भेजा जाए. चार, अभी मिल रही 5 हजार और 8 हजार रूपये की फेलोशिप को बढ़ाकर क्रमशः 10 हजार और 16 हजार रूपये किया जाए. इन चार मांगों में से पहली तीन तो स्वीकार भी कर ली गई हैं. चौथी पर भी सरकार विचार कर रही है.
लेकिन मानव संसाधन मंत्रालय या यूजीसी की तरफ से ऐसा कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है कि ये मांगें मान ली गई हैं?
स्मृति ईरानी जी से हमारी मुलाकात के अगले ही दिन मानव संसाधन मंत्रालय ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी थी. पीआईबी की वेबसाइट पर यह आज भी उपलब्ध है.
यदि सरकार कोई ऐसा फैसला करती है जिससे देश के ज्यादातर छात्रों को नुकसान पहुंचता हो तो हम उस फैसले के विरोध में हमेशा खड़े होंगे.
उस प्रेस विज्ञप्ति में तो सिर्फ एक रिव्यू कमेटी के गठन के बात की गई है जो इन मांगों पर विचार करेगी.
यह समिति फेलोशिप बढ़ाने की मांग पर विचार करेगी, जो हमारी चौथी मांग थी. बाकी तीनों मांगें मान ली गई हैं. हां, उस विज्ञप्ति में यह भी जिक्र है कि मेरिट के आधार पर फेलोशिप देने पर विचार किया जाएगा. यदि ऐसा हुआ तो हम इसका विरोध करेंगे. फेलोशिप बिना किसी मेरिट के रिसर्च करने वाले हर छात्र को दी जानी चाहिए. एक बार इस समिति की रिपोर्ट आ जाए फिर हम देखेंगे कि आगे क्या किया जाना है. तब तक आंदोलन करते रहना नादानी है. लेफ्ट विंग के संगठन सिर्फ मांगे पूरी करवाने का श्रेय लेने के लिए प्रोपेगंडा के तहत इस आंदोलन को जारी रखे हुए हैं. हमें इससे भी कोई परेशानी नहीं है. यदि उन्हें श्रेय ही चाहिए तो एबीवीपी की तरफ से मैं उन्हें इन मांगों के पूरे होने का श्रेय देने को तैयार हूं.
आंदोलन कर रहे छात्र सिर्फ यूजीसी के फैसलों का खिलाफ नहीं बल्कि नैरोबी में हो रही 'विश्व व्यापार संगठन' (डब्ल्यूटीओ) की बैठक का भी विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि यदि भारत इस बैठक में शिक्षा क्षेत्र को खोलने का अपना प्रस्ताव वापस नहीं लेता है तो आने वाले समय में उच्च शिक्षा एक व्यापार बनकर रह जाएगी और इसका सबसे ज्यादा नुकसान गरीब और पिछड़े परिवार के छात्रों को होगा. इस विरोध में आपका संगठन अन्य छात्रों के साथ नहीं है?
क्या इन लोगों को सपने में आता है कि भारत सरकार डब्ल्यूटीओ में क्या फैसला लेने जा रही है. इन लोगों की विचारधारा ही सपनों की विचारधारा है और मुझे लगता है ये लोग चौबीस घंटे लोग मोदी सरकार और एबीवीपी का सपना ही देखते रहते हैं. इन्हें सोचना चाहिए कि जब तक कोई फैसला नहीं हो जाता तब तक आगे जाने का क्या फायदा? लेकिन अगर इनको छद्म राजनीति ही करनी है तो करते रहें.
क्या इन लोगों को सपने में आता है कि भारत सरकार डब्ल्यूटीओ में क्या फैसला लेने जा रही है. इन लोगों की विचारधारा ही सपनों की विचारधारा है
यहां जेएनयू कैंपस में आज इतनी समस्याएं हैं, उन पर कोई नहीं बोलता. हॉस्टल की त्राहि-त्राहि मची हुई है, अभी भी 2500 छात्र बाहर रह रहे हैं, यहां धर्म के नाम पर गाली दी जा रही हैं, अवैध गतिविधियां चल रही हैं. इन मुद्दों पर मिलकर लड़ना चाहिए लेकिन ये सब चुप हैं.
लेकिन डब्ल्यूटीओ की बैठक से सम्बंधित जिन मुद्दों को लेकर छात्र विरोध कर रहे हैं वह तो पब्लिक डोमेन में हैं ही. शिक्षा के क्षेत्र के कई जानकार पिछले काफी समय से इसका विरोध कर रहे हैं. इसमें सिर्फ लेफ्ट के छात्र नहीं बल्कि एबीवीपी के अलावा लगभग सभी लोग शामिल हैं.
हम लोग शिक्षा के बाजारीकरण के हमेशा ही खिलाफ रहे हैं. यदि सरकार कोई ऐसा फैसला करती है जिससे देश के ज्यादातर छात्रों को नुकसान पहुंचता हो तो हम उस फैसले के विरोध में हमेशा खड़े होंगे. लेकिन जहां तक मेरा विश्वास है, ऐसा कुछ नहीं होने वाला है. यदि ऐसा कोई फैसला सामने आएगा तो हम जरूर उसका विरोध करेंगे.
शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि डब्ल्यूटीओ में यदि उच्च शिक्षा को 'जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड इन सर्विसेज' के अंतर्गत शामिल कर लिया गया तो फिर यह फैसला वापस लेना लगभग नामुमकिन हो जाएगा. ऐसे में आपको नहीं लगता कि इसका विरोध अभी होना चाहिए.
इन लोगों को कैसे पता कि ऐसा होने वाला है? जब तक आग नहीं लगती आप पानी लेकर क्यों जाओगे? हम पहले से ही फायर ब्रिगेड लेकर बैठे रहें कि आग लगने वाली है, यह गलत है.
डब्ल्यूटीओ से सम्बंधित मुद्दों पर एबीवीपी ने रिसर्च करके कभी गंभीरता से चर्चा की है क्या?
हमेशा यहां चर्चा होती है. देश-विदेश में जितनी पॉलिसीज बन रही हैं, उन पर चर्चा होती रहती है. लेकिन हमारा यह मानना है कि जब तक कोई फाइनल रिपोर्ट नहीं आ जाती तक तक कुछ करना ठीक नहीं है.
भाजपा का ही छात्र संगठन एबीवीपी है, तो...
देखिये भाजपा का नहीं है. एबीवीपी आरएसएस का स्टूडेंट विंग है. भाजपा और हमारी जहां विचारधारा मिलती है वहां हम एक-दूसरे के साथ काम करते हैं. लेकिन हमें भाजपा का स्टूडेंट विंग कहना सरासर गलत है.
चलिए आरएसएस का छात्र संगठन है. यदि डब्ल्यूटीओ के मामले में भाजपा के फैसलों को आरएसएस सही ठहराता है तो आप लोग क्या करेंगे? आप आरएसएस के साथ जाएंगे या छात्रों के साथ रहेंगे?
यदि स्टूडेंट कम्युनिटी के खिलाफ फैसला होगा तो हम भी उस फैसले के खिलाफ जाएंगे.
चाहे फिर आरएसएस के खिलाफ भी जाना पड़े?
(एक लम्बी चुप्पी के बाद) देखते हैं फिर तो विचार करना पड़ेगा.