नरेंद्र मोदी सरकार को लगता है कि हामिद अंसारी न केवल सरकार के साथ अपेक्षित सहयोग नहीं कर रहे बल्कि विपक्ष के साथ सख्ती से भी परहेज कर रहे हैं
संसद का शीतकालीन सत्र 26 नवंबर को शुरू हुआ था इसे 23 दिसंबर तक चलना है. यानी कि आज को छोड़कर इसके पास कुल तीन ही दिन हैं जिनमें संसद में कोई कार्य हो सकता है. हालांकि इस सत्र में नरेंद्र मोदी सरकार ने जीएसटी बिल को पारित कराने की उम्मीद तो छोड़ दी है लेकिन कई अन्य बिल हैं जिन्हें पास किया जाना जरूरी है.
रिसर्च संस्था पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के मुताबिक संसद के शीत सत्र में जहां लोकसभा की उत्पादकता पूरी सौ फीसदी रही वहीं राज्यसभा की उत्पादकता मात्र 47 फीसदी ही रही. इसमें भी राज्य सभा की उत्पादकता का एक बड़ा हिस्सा गैर-विधायी कार्यों में खर्च हुआ. अगर समय के संदर्भ में देखें तो लोकसभा के 89 घंटों के मुकाबले अब तक सिर्फ 44 घंटे काम करने वाली राज्यसभा ने विधायी कार्यों पर मात्र चार घंटे ही खर्च किये.
इसमें विपक्ष की भूमिका तो महत्वपूर्ण है ही, जिसे हाल ही में हुए बिहार चुनाव से कुछ संजीवनी मिल गई है, लेकिन मोदी सरकार को यह भी लगता है कि उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का अपेक्षित सहयोग न मिलने से भी राज्यसभा में वह कोई जरूरी काम नहीं कर पा रही है. उसे लग रहा है कि राज्यसभा में जब भी विपक्ष किसी भी तरह का शोर मचाता है, सदन के सभापति हामिद अंसारी संसद की कार्यवाही चलाने से पहले तो मना कर देते हैं फिर सदन को स्थगित कर देते हैं.
समय के संदर्भ में देखें तो लोकसभा के 89 घंटों के मुकाबले अब तक सिर्फ 44 घंटे काम करने वाली राज्यसभा ने विधायी कार्यों पर मात्र चार घंटे ही खर्च किये
नरेंद्र मोदी सरकार के मंत्रियों को यह भी लगता है कि हामिद अंसारी न केवल सरकार के साथ अपेक्षित सहयोग नहीं कर रहे हैं बल्कि विपक्ष के साथ किसी तरह की सख्ती से भी परहेज कर रहे हैं. एक न्यूज एजेंसी के साथ बातचीत में संसदीय कार्यमंत्री वैंकेय्या नायडू का कहना था कि 'सरकार हर तरह के सहयोग के लिए तैयार है लेकिन यदि कोई लगातार (सदन की) कार्यवाही बाधित करने पर तुला ही हुआ है तो सभापति को उसके खिलाफ जरूरी कार्यवाही करनी चाहिए.'
हालांकि मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस संदर्भ में हामिद अंसारी का मानना है कि उनके पास राज्यसभा सदस्यों के शोर-शराबे से निपटने के लिए उतनी सख्त कार्रवाई करने के अधिकार नहीं हैं जितने लोकसभा अध्यक्ष के पास होते हैं. और जब इस संबंध में उन्होंने आज से कुछ साल पहले – जब भाजपा विपक्ष में थी – नियमों में बदलाव का प्रस्ताव रखा था तो भाजपा ने भी इसका विरोध किया था.
जबकि वैंकेय्या नायडू के ही एक और बयान से साफ है कि सरकार राज्यसभा के सभापति की किसी मजबूरी से इत्तेफाक नहीं रखती. वे राज्यसभा में यूपीए के कार्यकाल में भारी विरोध और उसपर मार्शलों की कार्रवाई के बीच पारित हुए दो विधेयकों का उदाहरण देते हुए कहते हैं, ‘हमने ऐसा कई बार देखा है. राज्यसभा में महिला आरक्षण बिल किस तरह से पास हुआ था और तेलंगाना का विधेयक किस तरह से पास हुआ था, सारे देश ने देखा है.
भाजपा को लग रहा है कि राज्यसभा में जब भी विपक्ष शोर मचाता है, हामिद अंसारी संसद की कार्यवाही चलाने से पहले तो मना कर देते हैं फिर सदन को स्थगित कर देते हैं
माना जाता है कि भाजपा की इसी नाराजगी को व्यक्त करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी से मुलाकात की थी. हालांकि इसके बाद तुरंत तो सदन की कार्यवाही में कोई अंतर नहीं दिखा और उसी तरह का शोरगुल होता रहा. लेकिन इसके बाद आज सभापति ने एक सर्वदलीय बैठक जरूर बुलाई है जिसमें वे सभी दलों से शांति से राज्यसभा के बचे हुए कुछ दिन काम होने देने की अपील करने के साथ ही नियमों में बदलाव की बात भी रख सकते हैं.
जहां तक अन्य स्तर पर सरकार के प्रयासों की बात है तो बताया जाता है कि उसे कुछ ऐसे जरूरी विधेयकों पर कांग्रेस के सहयोग का आश्वासन मिल गया है जो लोकसभा में पहले से ही पारित हो चुके हैं. इन बिलों को वह अगले सप्ताह राज्यसभा में पारित कराने के प्रयास करने वाली है. लेकिन उसे यह भी लगता है कि यदि उपराष्ट्रपति ने किसी बी तरह का हो-हल्ला होने पर कार्यवाही नहीं होने दी तो ऐसे में कांग्रेस को अपनी बात से मुकर जाने का मौका मिल जाएगा. इसलिए प्रधानमंत्री तक के स्तर पर हामिद अंसारी को विश्वास में लेने के हर प्रयास भाजपा कर रही है.
जहां तक जीएसटी विधेयक की बात है तो यह तो अब साफ ही है कि वह न तो अब इस सत्र में पारित हो रहा है, न ही एक अप्रैल से लागू हो रहा है. इसे लेकर अब भाजपा की सोच यह है कि वह इसे अब अगले साल बजट सत्र में पारित कराने के प्रयास करेगी. एक अनुमाल के मुताबिक तब तक राज्यसभा में कांग्रेस के करीब 12 सदस्यों का कार्यकाल खत्म हो जाएगा और भाजपा के करीब इतने ही सदस्य बढ़ जाएंगे. ऐसी हालत में संविधान में संशोधन करना, भाजपा को लगता है कि उसके लिए थोड़ा आसान हो सकता है.