यदि निर्भया मामले के किशोर दोषी की सजा कोे बढ़ा दिया जाता तो भविष्य में यह ऐसी नज़ीर बन सकता था जिसके दुरूपयोग को रोकना नामुमकिन होता
निर्भया गैंग रेप मामले के दोषी किशोर को रिहा कर दिया गया. पिछले कई दिनों से उसकी रिहाई को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई थी. भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने इस पर रोक लगाने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की थी. इस पर फैसला देते हुए न्यायालय ने 18 दिसंबर को किशोर की रिहाई को न्यायसंगत बता दिया है. इससे 20 तारीख को उसकी रिहाई का रास्ता साफ हो गया था.
16 दिसंबर 2012 के इस मामले में इस किशोर के अलावा पांच दोषी और थे. इनमें से एक की तिहाड़ जेल में ही मौत हो चुकी है और चार दोषियों को निचली अदालत फांसी की सजा सुना चुकी है. इस फैसले पर दिल्ली उच्च न्यायालय भी अपनी मोहर लगा चुका है. चारों दोषियों ने इस मामले में अपील दाखिल की थी जिसकी सुनवाई पूरी होने तक सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी फांसी पर रोक लगा दी है. किशोर दोषी को 'जुवेनाइल जस्टिस एक्ट' के प्रावधानों के अनुसार अधिकतम तीन साल की सजा सुनाई गई थी. 20 दिसंबर को यह अवधि पूरी हो गई.
जैसी प्रतिक्रिया निर्भया मामले में देखने को मिली, वह अभूतपूर्व थी. कुछ वैसी ही, जैसी हाल ही में दिल्ली से सटे दादरी में हुई अख़लाक़ की हत्या पर सारे देश में देखने को मिली थी
2012 की इस घटना ने उस वक्त सारे देश को झकझोर कर रख दिया था. इसके चलते लाखों लोग सड़कों पर उतर आए थे. कहीं दोषियों को फांसी देने की मांग हो रही थी तो कहीं महिलाओं की सुरक्षा के लिए सख्त कानून बनाए जाने की. एक व्यापक जनांदोलन सारे देश में उठ खड़ा हुआ था. इसका प्रभाव भी हुआ और सरकार ने जस्टिस जेएस वर्मा की अध्यक्षता में एक समिति का गठन कर दिया. समिति की रिपोर्ट के आधार पर आज बलात्कार संबंधी कानून पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुए हैं. महिलाओं से जुड़े कई ऐसे अपराध भी अब कानूनों के दायरे में आ गए हैं जो पहले इनके बाहर थे.
हालांकि आंकड़ों की बात करें तो कानून में बदलाव होने के बाद भी बलात्कार की घटनाओं में कोई कमी नहीं आई है. आज भी दिल्ली में औसतन छह बलात्कार प्रतिदिन होते हैं. इनमें कुछ तो उतने ही बर्बर होते हैं जैसा कि निर्भया के साथ हुआ था. कई जगह, विशेषकर आदिवासी इलाकों में तो स्वयं पुलिस और सेना के जवानों ने भी ऐसी कई बर्बर घटनाओं को अंजाम दिया है. लेकिन जैसी प्रतिक्रिया निर्भया मामले में देखने को मिली, वह अभूतपूर्व थी. कुछ वैसी ही, जैसी हाल ही में दिल्ली से सटे दादरी में हुई अख़लाक़ की हत्या पर सारे देश में देखने को मिली थी. जबकि अल्पसंख्यकों पर हिंसा की ऐसी कई घटनाएं आए दिन सामने आती हैं.
इसी का ही असर है कि निर्भया मामले के किशोर दोषी की सजा पूरी हो जाने पर भी कई लोग चाहते हैं कि उसे रिहा न किया जाए. नहीं तो हममें से ज्यादातर कभी इस तरह का सवाल तक नहीं करते कि सिर्फ दिल्ली में पिछले साल बलात्कार के जो 1813 मामले दर्ज हुए थे उनमें कितनों को सजा हुई? हम यह भी नहीं पूछते कि देश में जो हर आधे घंटे में एक बलात्कार होता है उसके अपराधियों को कभी सजा होती भी है या नहीं? जबकि निर्भया मामले में हम अब वह मांग रहे हैं जो देश के कानून के दायरे से बाहर है.
देश भर के लोगों की संवेदनाएं और समर्थन निर्भया के माता-पिता के साथ है. लेकिन उस किशोर दोषी की रिहाई पर रोक लगना न तो कानूनन संभव है और न ही यह न्याय हित में ही है
निर्भया के साथ जो अपराध हुआ था वह निश्चित ही सारे देश की सामूहिक भावना को झकझोरने वाला था. ऐसे में इसके एक दोषी का सिर्फ तीन साल 'सुधार गृह' में रहकर छूट जाना नाइंसाफी सी लगती है. निर्भया के माता-पिता भी ऐसा ही मानते हैं. वे कहते हैं 'उसने जो किया वह गलती नहीं बल्कि घोर अपराध था.' इसलिए वे 20 तारीख को होने वाली रिहाई का लगातार विरोध कर रहे हैं.
देश भर के लोगों की संवेदनाएं और समर्थन निर्भया के माता-पिता के साथ है. लेकिन उस किशोर दोषी की रिहाई पर रोक लगना न तो कानूनन संभव है और न ही यह न्याय हित में ही है. निर्भया के साथ हुए अपराध के वक्त देश का कानून यही था कि 18 साल से कम उम्र के किसी भी किशोर को तीन साल से ज्यादा की सजा नहीं दी जा सकती. (नए कानून में प्रावधान है कि 16 से 18 साल के किशोर को गंभीर अपराध करने पर वैसी ही सजा मिलेगी जैसी किसी वयस्क को मिलती है. लेकिन यह कानून भी फिलहाल राज्य सभा में लंबित है.) इसलिए न्यायालय ने उसकी होने वाली रिहाई को न्यायोचित बताया है.
सुब्रमण्यम स्वामी ने कुछ समय पहले किशोर न्याय अधिनियम की संवैधानिकता को ही चुनौती दे दी थी. लेकिन न्यायालय ने इसमें कोई दोष नहीं पाया. इसके बाद स्वामी ने विशेष तौर से निर्भया मामले के किशोर अपराधी की रिहाई पर रोक लगाने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की. उन्होंने न्यायालय में दलील दी कि यह किशोर समाज के लिए ख़तरा है और ऐसे कोई संकेत नहीं हैं कि तीन साल सुधार गृह में रहकर यह सुधर गया हो. लेकिन इसके बाद भी न्यायालय ने किशोर की रिहाई पर रोक लगाने से इनकार कर दिया.
यह ऐसी व्यवस्था की शुरुआत होती जहां किसी अपराध के लिए कानून में दी गई सजा से ज्यादा कठोर सजा की मांग की जाती और उसे पूरा करने के लिए इस फैसले को बतौर नज़ीर पेश किया जाता
दिल्ली उच्च न्यायालय ने जो फैसला दिया है वह कई लोगों को हताश कर सकता है, लेकिन तटस्थ होकर देखा जाए तो यह वैसा ही है जैसा इसे होना चाहिए. कानून का मूल सिद्धांत है कि किसी भी अपराधी को सिर्फ वही सजा दी जा सकती है जिसका प्रावधान अपराध करते वक्त कानून में मौजूद हो. नए बने कानून से किसी ऐसे व्यक्ति को दंडित नहीं किया जा सकता जिसने पहले कभी इससे जुड़ा अपराध किया हो. इसलिए यदि 18 वर्ष से कम आयु के लोगों को गंभीर अपराधों में ज्यादा सजा देने का कानून बनाया भी जाता है तो उसे आने वाले समय के लिए ही इस्तेमाल किया जा सकता है.
निर्भया मामले के दौरान जो अधिकतम सजा दी जा सकती थी वह, यह किशोर पूरी कर चुका है. यदि किसी भी कारण से उसकी सजा बढाई जाती, तो भविष्य में यह एक ऐसी नज़ीर बनती जिसके दुरूपयोग को रोकना नामुमकिन होता. यह एक ऐसी परंपरा को स्थापित करना होता जहां कानून को लांघ जाने का प्रावधान कानून में ही मौजूद होता. यह ऐसी व्यवस्था की शुरुआत होती जहां किसी अपराध के लिए कानून में दी गई सजा से ज्यादा कठोर सजा की मांग की जाती और उसे पूरा करने के लिए इस फैसले को बतौर नज़ीर पेश किया जाता. इस व्यवस्था में फैसला सुनाने वाले स्वयं कानून से ऊपर हो जाते.
इसलिए निर्भया मामले में दोषी किशोर को रिहा करने का यह फैसला भले हमें व्यक्तिगत पर भले बुरा लगे, दुखी करे लेकिन हमारे सामूहिक भविष्य के लिए यह एक स्वागत योग्य फैसला है.