फ्लैशबैक: मदन मोहन का आखिरी कालजयी गीत जो हर बशर को दार्शनिक बना देता है
बात 70 के दशक की है. हिंदी फिल्मों में संगीत का परिदृश्य तेजी से बदल रहा था और 50-60 के दशक के कई स्थापित संगीतकारों को काम मिलना कम हो रहा था. इन संगीतकारों में एक मदन मोहन भी थे जिनके हिस्से उस दशक के शुरूआती सालों में कुछ सफल फिल्में जरूर आईं थीं लेकिन लगातार अच्छा काम बड़ी मुश्किल से मिल रहा था. इस वजह से वे शराब का सहारा जरूरत से ज्यादा लेने लगे थे.
लेकिन संघर्ष के ऐसे ही दिनों में उन्होंने ‘मौसम’ (1975) फिल्म के लिए एक कालजयी गीत की रचना की थी जिसे भूपिंदर ने गाया था और जिसे हम सब ‘दिल ढूंढ़ता है फिर वही’ के नाम से जानते हैं. इस फिल्म के गीतकार-निर्देशक गुलजार उन दिनों सिर्फ पंचम दा के साथ काम किया करते थे लेकिन निर्माता ने मदन मोहन को साइन कर लिया था. चूंकि गुलजार को पता था कि मदन मोहन को काम की तलाश है इसलिए वे उनसे ‘मौसम’ का संगीत बनवाने के लिए तैयार हो गए. गालिब की एक गजल से प्रभावित ‘दिल ढूंढ़ता है’ के लिए मदन मोहन ने छह धुनें तैयार की थीं. इनमें से एक धुन पर तकरीबन तीस साल बाद वीर-जारा का ‘तेरे लिए हम हैं जिए’ रचा गया.


‘शानदार’ की असफलता के बाद मैं इतनी ज्यादा दुखी थी कि मेरे डैड मुझे रोज सुबह मोटीवेशनल कोट भेजा करते थे! लाइफ में पहली बार अकेले ट्रेवल भी मैंने तभी किया ताकि मैं असफलता को समझ और पचा सकूं.

आलिया भट्ट




गुलजार ने गालिब की जिस गजल से अपने गीत के लिए प्रेरणा ली थी उसमें ‘दिल ढूंढ़ता है’ की जगह ‘जी ढूंढ़ता है’ का प्रयोग हुआ था. चूंकि गुलजार गालिब के शब्दों से छेड़छाड़ करने के खिलाफ थे, वे ठीक वही शब्द गाने में लेना चाहते थे जो गालिब ने लिखे थे. लेकिन मदन मोहन ने धुन इस तरह तैयार की थी कि वह ‘दिल ढूंढता है’ पर ज्यादा फिट होती थी. ऐसे में मदन मोहन गालिब पर एक ऐसी किताब खोज कर ले आए जिसमें ‘जी’ की जगह ‘दिल’ शब्द का उपयोग हुआ था! आखिरकार गुलजार को उनकी बात माननी पड़ी और इस तरह वह कालजयी गीत अस्तित्व में आया जिसे आज भी गुनगुनाते हुए आम आदमी दार्शनिक हो जाता है.
इस बेहद सफल गीत के लिए हालांकि गुलजार को उस साल का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार नहीं मिल पाया क्योंकि इसका मुखड़ा गालिब की गजल से प्रभावित था. वहीं, अपने इस गीत और फिल्म के बाकी हिट संगीत को मदन मोहन रिलीज के वक्त परदे पर नहीं देख पाए क्योंकि इससे चंद महीने पहले ही 51 साल की उम्र में लिवर सिरोसिस की वजह से उनका इंतकाल हो गया.
क्या ब्योमकेश बक्शी का सीक्वल कभी नहीं बनेगा?
दिबाकर बनर्जी ‘डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी’ की बॉक्स-आफिस असफलता के बाद भी उसके सीक्वल को लेकर इतने चिंतित कभी नहीं हुए होंगे, जितने अभी हैं. इसका कारण है कि उनके हीरो सुशांत सिंह राजपूत आजकल आदित्य चोपड़ा से बेहद और इसलिए खफा हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यशराज फिल्म्स उनका करियर ठीक तरीके से हैंडल नहीं कर रहा. उनके ऐसा सोचने की वजहें भी हैं. पहले तो यशराज ने शेखर कपूर की ‘पानी’ के लिए सुशांत से ढेर सारी तारीखें ले लीं जिस वजह से वे कई सारी फिल्में नहीं कर पाए. बाद में ‘पानी’ वाष्प बनकर उड़ गई. इसी बीच आदित्य चोपड़ा ने भी अपनी अगली निर्देशकीय फिल्म में सुशांत की जगह रणवीर सिंह को ले लिया. इसके बाद से ही यशराज और सुशांत के बीच रिश्ते बेहद खराब हो गए. अब दिबाकर को समझ नहीं आ रहा कि अपनी फिल्म का सीक्वल वे कभी सुशांत सिंह राजपूत के साथ बना भी पाएंगे या नहीं. वे इसलिए भी चिंतित हैं कि कहीं उन्हें यशराज के दबाव के चलते किसी दूसरे एक्टर को अपना डिटेक्टिव न बनाना पड़ जाए, और यशराज को इसके लिए मना करने पर सीक्वल बनाने का सपना ही न त्यागना पड़ जाए. बुरे फंसे!


तुषार-आफताब की अनकूल बातें?
‘क्या कूल हैं हम 3’ जैसी लंपट और अपारिवारिक फिल्म में काम करने के बाद तुषार कपूर और आफताब शिवदासानी इस फिल्म को लेकर आजकल बड़ी पारिवारिक बातें कर रहे हैं! हाल ही में आफताब शिवदासानी ने कहा कि उन्होंने इस (फूहड़) फिल्म की स्क्रिप्ट अपनी वाइफ के साथ डिस्कस की थी और उनकी वाइफ ने उन्हें यह फिल्म करने के लिए काफी सपोर्ट और एन्करेज किया. फिल्म में एडल्ट मूवी स्टार बनने के लिए? वहीं तुषार कपूर गर्व से कह रहे हैं कि उनकी यह फिल्म सारे एज ग्रुप्स के लिए है! अर्थात ये एडल्ट फिल्म जरूर है लेकिन इतनी पारिवारिक है कि सभी उम्र के लोग और बालक इसे देख सकते हैं? तुषार कपूर का यह भी कहना है कि सेक्स कामेडी के जॉनर की वे इतनी सारी फिल्में कर चुके हैं कि ऐसी फिल्में करना उनके लिए रोजमर्रा का काम करने जैसा है! अब आप खुद ही समझ गए होंगे कि ये सारी बातें कूल हैं या अनकूल! हालांकि इस फिल्म को लेकर एकमात्र कूल बात इस फिल्म की निर्मात्री एकता कपूर ने कही, ‘इस फिल्म की रिलीज के वक्त में मुंबई में रहूंगी ही नहीं!’