पहले ही कई अहम नियुक्तियों को लेकर विवादों का सामना कर रही अखिलेश सरकार के लिए अब लोकायुक्त की नियुक्ति ऐसी फांस बन गई है जो ढीली होने का नाम नहीं ले रही.
ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश सरकार और नियुक्तियों से जुड़े विवादों का साथ चोली-दामन जैसा हो गया है. चाहे उत्तर प्रदेश राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष पद का मामला हो या उच्च शिक्षा सेवा आयोग या फिर अन्य आयोगों का, सरकार को बार बार नियुक्तियों को लेकर मुंह की खानी पड़ी है. विज्ञान परिषद के सदस्यों के मनोनयन से लेकर मुख्य सूचना आयुक्त और पुलिस महानिदेशक के चयन तक कोई भी प्रकरण ऐसा नहीं रहा जहां राज्य सरकार के निर्णय पर सवाल न उठे हों. लेकिन लोकायुक्त के मसले पर तो सरकार बहुत बुरी तरह घिर गई है.
उत्तर प्रदेश में पूरे तीन साल नौ महीने से लोकायुक्त के पद को लेकर विवाद है. मौजूदा लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा का कार्यकाल 16 मार्च 2012 को समाप्त हो चुका था. अखिलेश सरकार ने शपथ ग्रहण के बाद मेहरोत्रा का कार्यकाल दो वर्ष के लिए बढ़ा दिया. हालांकि इस विस्तार को भी अदालत में चुनौती मिली . मगर अन्ततः 15 मार्च 2014 को मेहरोत्रा ने लोकायुक्त के रूप में दो वर्ष भी पूरे कर लिए. तब तक उत्तर प्रदेश में नया लोकायुक्त नियुक्त करने का प्रकरण भी सर्वाेच्च न्यायालय पहुंच चुका था.
रवींद्र सिंह के बारे में यह कहा गया कि न्यायाधीश रहते हुए उनके भाई और पुत्रों की नियुक्तियां सुप्रीम कोर्ट व अन्य न्यायिक पदों पर हुई थीं जबकि इन पदों के हिसाब से उनकी योग्यताएं नहीं थीं.
24 अप्रैल 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि सरकार छह महीने में लोकायुक्त चयन प्रक्रिया पूरी करे. सरकार ने कुछ शुरुआत तो की मगर चयन प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई. इसके बाद दिसंबर 2014 में राज्यपाल राम नाईक ने राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश की याद दिलाई. इस पर सरकार ने थोड़ी सक्रियता दिखाई और पांच फरवरी 2015 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस रवींद्र सिंह का नाम तय करके इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चन्द्रचूड के पास अनुमोदन के लिए भेज दिया. लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने चयन प्रक्रिया को निर्धारित ढंग से न करने और रवींद्र सिंह की योग्यता को पद के अनुकूल न मानते हुए अपनी असहमति जता दी. मामला फिर उलझ गया. रवींद्र सिंह के बारे में यह कहा गया कि न्यायाधीश रहते हुए उनके भाई और पुत्रों की नियुक्तियां सुप्रीम कोर्ट व अन्य न्यायिक पदों पर हुई थीं जबकि इन पदों के हिसाब से उनकी योग्यताएं नहीं थीं. सपा का करीबी होने का भी उन पर आरोप था.
बहरहाल राज्य सरकार येन केन प्रकारेण रवींद्र सिंह को लोकायुक्त बनवाना चाहती थी. इसलिए उसने राज्य की लोकायुक्त और उप लोकायुक्त चयन नियमवाली में भी कई बदलाव कर चयन प्रक्रिया में मुख्य न्यायाधीश की भूमिका को ही सीमित कर दिया. इस विधेयक पर अब तक राज्यपाल के हस्ताक्षर नहीं हुए हैं मगर राज्य सरकार ने रवींद्र सिंह के नाम को फिर एकतरफा ढंग से राज्यपाल के पास अनुमोदन के लिए भेज दिया. राज्यपाल ने संवैधानिक आधार पर इसे अस्वीकार किया तो सरकार ने फिर रवींद्र सिंह का ही नाम भेज कर अपने इरादे दिखा दिए. तीसरी बार जब सरकार ने फिर उनका नाम भेजा तो राज्यपाल को कहना पड़ा कि वह रवीद्र सिंह के अलावा कोई और नाम भेजे. इसके बाद रवीद्र सिंह ने ही खुद को चयन प्रक्रिया में शामिल न किए जाने का अनुरोध किया और इस तरह रवींद्र सिंह प्रकरण का पटाक्षेप हो गया.
23 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को लोकायुक्त की नियुक्ति में हो रही देरी के लिए फटकार लगाते हुए चार सप्ताह में नियुक्ति करने का आदेश दिया था.
लेकिन इससे उत्तर प्रदेश में लोकायुक्त चयन के विवाद का पटाक्षेप नहीं हो पाया. जिन दिनों रवींद्र सिंह का नाम लोकायुक्त की दौड़ में सरकार की प्राथमिकता बना हुआ था उन्हीं दिनों 23 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को लोकायुक्त की नियुक्ति में हो रही देरी के लिए फटकार लगाते हुए चार सप्ताह में नियुक्ति करने का आदेश दिया था. इस आदेश की नाफरमानी पर 14 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट फिर से नाराज हुआ और कड़ा रूख अपनाते हुए अदालत दो दिन में लोकायुक्त चयन प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया.
इसके बाद सरकार ने आनन-फानन में पुरानी प्रक्रिया के आधार पर मुख्य न्यायाधीश और नेता विपक्ष की समिति की बैठक बुलाई. लेकिन इसमें किसी नाम पर सहमति नहीं बन सकी. इस बीच दिन में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई शुरू हुई. राज्य सरकार को फिर से खाली हाथ देख सुप्रीम कोर्ट भी हैरान था. आखिरकार उसने पहली बार लोकायुक्त नियुक्ति के लिए अनुच्छेद 142 के तहत अपने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करके राज्य सरकार से पांच नामों की सूची मंगवाकर उसमें से वीरेंद्र सिंह का नाम लोकायुक्त के लिए घोषित कर दिया.
16 दिसंबर की शाम राज्य उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष जस्टिस वीरेंद्र सिंह लोगों की बधाइयां स्वीकार कर रहे थे और लोकायुक्त पद पर अपनी नियुक्ति पर प्रसन्न होकर मीडिया को बता रहे थे कि वे यादव हैं तो क्या, एक जज भी तो हैं. इस तरह के उनके साक्षात्कार कई प्रमुख अखबारों में प्रकाशित भी हुए. 20 दिसंबर को उनका शपथ ग्रहण होना था. राज्यपाल की सहमति भी हो चुकी थी, कार्ड भी छप चुके थे. लेकिन शनिवार 19 दिसंबर को फिर एक बाधा आ गई.
याचिका में कहा गया था कि राज्य सरकार ने तथ्यों को छुपा कर सुप्रीम कोर्ट का आदेश प्राप्त किया है, इसलिए नए लोकायुक्त का शपथ ग्रहण समारोह स्थगित कर दिया जाए.
इस दिन सुप्रीम कोर्ट ने लोकायुक्त की नियुक्ति को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई की. यह याचिका कभी मुलायम सिंह यादव के कृपा पात्र रहे इटावा के सच्चिदानंद गुप्ता ने दायर की थी. इसमें कहा गया था कि राज्य सरकार ने तथ्यों को छुपा कर सुप्रीम कोर्ट का आदेश प्राप्त किया है, इसलिए नए लोकायुक्त का शपथ ग्रहण समारोह स्थगित कर दिया जाए. इसके बाद शीर्ष अदालत ने शपथ ग्रहण पर चार जनवरी 2016 तक रोक लगा दी.
याचिकाकर्ता सच्चिदानंद के मुताबिक उनकी किसी से कोई व्यक्तिगत शत्रुता नहीं हैं. वे कहते हैं, 'मैंने स्थानीय अखबारों में जब यह पढ़ा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने राज्यपाल और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिख कर यह कहा है कि वीरेंद्र सिंह के नाम पर 15 व 16 दिसंबर को हुई चयन समिति की बैठक में असहमति हो चुकी थी तो इसे पढ़ कर मुझे लगा कि इस मामले में राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को गुमराह किया है. इसलिए मैंने याचिका दायर कर दी.’
फिलहाल चार जनवरी तक वीरेंद्र सिंह के शपथ ग्रहण पर रोक है. लेकिन कानून के जानकार मानते हैं कि यह रोक अभी और बढ़ सकती है. क्योंकि इस मामले में राज्य सरकार के साथ साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट, उत्तर प्रदेश के राज्यपाल और नेता विपक्ष का भी पक्ष सुना जाना है. चर्चा यह भी है कि वीरेंद्र सिंह समाजवादी पार्टी के प्रथम परिवार के करीबी रिश्तेदार हैं और उनका बेटा मुजफ्फरनगर में समाजवादी पार्टी का उपाध्यक्ष भी है. इस मामले में अब गेंद उसी सुप्रीम कोर्ट के पाले में है जिसे राज्य की सरकार डेढ़ वर्ष से ज्यादा समय से अनसुना करती आ रही है . राज्य सरकार पर लगा यह आरोप गंभीर है कि उसने चयन समिति में अस्वीकृत नाम सुप्रीम कोर्ट के पास भेजा क्योंकि वह वीरेंद्र सिंह को ही लोकायुक्त बनवाना चाहती थी. ऐसे में अगर वीरेंद्र सिंह की नियुक्ति रद्द होती है तो यह अखिलेश सरकार के काम पर असफलता की एक और मोहर होगी.