डीडीसीए प्रकरण से पहले आज की भाजपा को चलाने वाले छह लोगों में ​से सिर्फ अरुण जेटली ही ऐसे थे जिनपर कोई गंभीर आरोप नहीं थे.
दिल्ली जिला क्रिकेट संघ (डीडीसीए) विवाद में उलझे अरुण जेटली पर लग रहे आरोपों के बचाव में भारतीय जनता पार्टी की ओर से लगातार यह कहा जा रहा है कि जेटली ऐसे व्यक्ति नहीं रहे हैं जिन पर आर्थिक गड़बड़ियों के आरोप लगाए जाएं. जेटली के सियासी कद और वकालत के जरिए अरबों कमाने की उनकी क्षमता का हवाला देकर कहा जा रहा है कि वे ऐसा काम कर ही नहीं सकते. पार्टी ने जेटली की इसी मिस्टर क्लीन की छवि के साथ खुद को और मजबूती से खड़ा करते हुए उन पर परोक्ष रूप से आरोप लगा रहे कीर्ति आजाद को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित करने की घोषणा भी कर दी है.
लेकिन क्या भाजपा को चलाने वाले नेता अरुण जेटली की बेदाग छवि को दागदार होने से बचाने के लिए इतने ही गंभीर हैं. अगर सिर्फ ऊपर लिखी बातों को आधार मानें तो इस सवाल का जवाब सकारात्मक आएगा. लेकिन अगर इसे एक राजनीतिक दृष्टि से सतह को थोड़ा खुरचकर समझने की कोशिश करें तो मामला कुछ और ही नजर आता है. ऐसा करने के लिए जरूरी है कि पहले जेटली ​की सियासी पहचान को ठीक से समझा जाए.
उनकी पहचान एक ऐसा नेता की रही है जिसकी जमीनी पकड़ खास नहीं है. इसके बावजूद अगर जेटली एक दशक से अधिक वक्त से भाजपा के शीर्ष नेताओं में शुमार किए जाते हैं तो इसकी भी कुछ वजहें हैं
राजनीति में अरुण जेटली की पहचान आखिर रही क्या है? वे अब तक वैसे किसी चुनाव में जीत हासिल नहीं कर पाए हैं, जिनमें जनता सीधे मतदान करती है. छात्र संघ का चुनाव एक अपवाद जरूर है. इसका मतलब यह हुआ कि उनकी पहचान एक ऐसा नेता की रही है जिसकी जमीनी पकड़ खास नहीं है. इसके बावजूद अगर जेटली एक दशक से अधिक वक्त से भाजपा के शीर्ष नेताओं में शुमार किए जाते हैं तो इसकी भी कुछ वजहें हैं. वे अगर पार्टी में आज इस मुकाम पर हैं तो इसके लिए उनके रणनीतिक कौशल को सबसे बड़ी वजह माना जाता है. पार्टी के अंदर और बाहर जेटली की पहचान सियासी दांवपेंच में माहिर एक ऐसा नेता की रही है जिसे आर्थिक मोर्चे पर बेईमान नहीं माना जाता.
यहां यह जानना भी जरूरी है कि अभी की भाजपा को चला कौन लोग रहे हैं. मोटे तौर पर आम लोगों के बीच धारणा है कि पार्टी नरेंद्र मोदी और अमित शाह चला रहे हैं. लेकिन व्यावहारिक तौर पर देखें तो पार्टी के बड़े निर्णय लेने वालों में इन दोनों के अलावा राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, अरुण जेटली और सुषमा स्वराज शामिल हैं. आज यही छह लोग मिलकर पार्टी के बड़े फैसले लेते हैं और फिर पूरी पार्टी उस पर चलती है. डीडीसीए प्रकरण से पहले इनमें ​से सिर्फ जेटली ही ऐसे थे जो गंभीर आरोपों में कभी बुरी तरह नहीं घिरे थे.
पार्टी के अंदर ही कई लोग ऐसे मिलते हैं जो मानते हैं कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की कार्यशैली ऐसी है जिसमें इन दोनों के अलावा पार्टी के अंदर कोई भी नेता एक सीमा से अधिक मजबूत नहीं हो सकता. पार्टी के ये लोग बताते हैं कि जब यह लगने लगा कि सही मायने में सरकार में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ही नंबर दो हैं तो उनके बेटे पंकज सिंह पर ट्रांसफर-पोस्टिंग के लिए रिश्वत मांगने के आरोप लग गए. भले ही इस पूरे मामले में उत्तर प्रदेश भाजपा के महासचिव पंकज सिंह पर पार्टी ने कोई कार्रवाई नहीं की लेकिन इस प्रकरण ने राजनीतिक तौर पर राजनाथ सिंह को कमजोर जरूर कर दिया. अब वे पार्टी के अंदर नरेंद्र मोदी और अमित शाह से ज्यादा सवाल करने की स्थिति में नहीं रहे.
नरेंद्र मोदी और अमित शाह की कार्यशैली ऐसी है जिसमें इन दोनों के अलावा पार्टी के अंदर कोई भी नेता एक सीमा से अधिक मजबूत नहीं हो सकता
कुछ ऐसा ही केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के साथ भी हुआ. ललित मोदी से जुड़े विवादों के जरिए न सिर्फ सुषमा स्वराज पार्टी की आंतरिक राजनीति में रक्षात्मक होने को मजबूर हो गईं बल्कि अपने पसंद के लोगों को मोदी सरकार में शामिल कराने के मसले पर लगातार दबाव बना रहीं राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी बचाव की मुद्रा में आ गईं. कभी प्रधानमंत्री पद के लिए शिव सेना की पसंद रहीं सुषमा स्वराज के लिए ललित गेट के बाद विदेश मंत्री पद को बचाए रखना ही सबसे बड़ा संघर्ष बन गया.
नरेंद्र मोदी और अमित शाह के राज में ही वसुंधरा के अलावा भाजपा के एक और बेहद मजबूत मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए पहली बार ऐसी स्थिति पैदा हो गई कि लगने लगा कि उनका इस्तीफा भी हो सकता है. व्यापम घोटाले की आंच अचानक इस तरह से लपटों में बदल गई कि लगा कि शिवराज इसमें झुलसने से बच नहीं पाएंगे. लेकिन चौहान ने नरेंद्र मोदी के करीबी माने जाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नेता सुरेश सोनी का नाम इसमें घसीटकर साबित कर दिया कि भाजपा की आंतरिक सियासत के दांवपेंच वे भी जानते हैं. फिर भी व्यापम विवाद से इससे पहले की नरेंद्र मोदी का विकल्प तक हो सकने वाली शिवराज की छवि को गहरा धक्का पहुंचा.
संघ नेतृत्व के बेहद करीब माने जाने वाले और मोदी सरकार में अपने कामकाज से सभी को प्रभावित करने वाले नितिन गडकरी भी आर्थिक अनियमितताओं के आरोपों से बचे नहीं रहे हैं. जब 2013 में उनका दोबारा भाजपा अध्यक्ष बनना बिल्कुल पक्का था तो अचानक उनके स्वामित्व वाली पूर्ति समूह की कंपनियों पर आयकर विभाग के छापे पड़े और गडकरी दोबारा भाजपा अध्यक्ष नहीं बन सके. पूर्ति समूह के मामले अब भी पूरी तरह से बंद नहीं हुए हैं. भले ही संघ से अपनी नजदीकी की वजह से वे नरेंद्र मोदी के सामने तनकर खड़े हो सकते हों लेकिन उनकी कंपनियों के खिलाफ चल रही जांच कहीं न कहीं उन्हें परेशान जरूर करती होंगी.
चौहान ने नरेंद्र मोदी के करीबी माने जाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नेता सुरेश सोनी का नाम इसमें घसीटकर साबित कर दिया कि भाजपा की आंतरिक सियासत के दांवपेंच वे भी जानते हैं
पार्टी के शीर्ष पर बैठे छह नेताओं में से नरेंद्र मोदी और अमित शाह को छोड़ दें तो बाकी चार ऐसे हैं जिनमें आपसी प्रतिस्पर्धा है. ऐसे में नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज स्वाभाविक तौर पर चाहेंगे कि अगर वे सभी आरोपों में घिरकर कमजोर हुए हैं तो फिर जेटली भला बेदाग रहकर अपनी सियासी शक्ति क्यों लगातार बढ़ाएं. इसका मतलब यह हुआ कि डीडीसीए विवाद के जरिए जेटली का कमजोर होना भाजपा के इन तीन शीर्ष नेताओं के अनुकूल है.
जब 2014 में अमृतसर से जेटली लोकसभा चुनाव हार गए थे तो उस वक्त पार्टी में उनके प्रतिस्पर्धियों को थोड़ी राहत जरूर मिली थी लेकिन बाद में मोदी सरकार में जिस मजबूती से जेटली उभरे उससे उनके प्रतिस्पर्धियों का चिंतित होना स्वाभाविक ही था. डीडीसीए विवाद पर राजनाथ, गडकरी और सुषमा की चुप्पी को इससे भी जोड़कर देखने वालों की कमी नहीं है. सूत्रों की मानें तो डीडीसीए विवाद सामने आने पर अमित शाह ने राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी से जेटली का बचाव करने को कहा भी था लेकिन दोनों ने इस मसले पर टालमटोल का रास्ता अपनाया. सुषमा स्वराज से कीर्ति आजाद की नजदीकी कोई राजनीतिक रहस्य नहीं है. ऐसे में कुछ लोग यह आरोप भी लगा रहे हैं कि कीर्ति को जिन लोगों से सियासी ताकत मिल रही है उनमें सुषमा स्वराज भी शामिल हैं.
नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर आर्थिक गड़बड़ियों के आरोप भले न हों लेकिन 2002 के गुजरात दंगों के कुछ छींटे तो दोनों पर हैं ही. भले अदालती कार्रवाई में दोनों के खिलाफ कुछ नहीं हुआ हो लेकिन जब—जब गुजरात दंगों की बात होती है नरेंद्र मोदी और अमित शाह का नाम उससे जुड़ ही जाता है. ऐसे में भाजपा के अंदर के उन लोगों की बातों में दम लगता है जो कहते हैं कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए भी बिल्कुल बेदाग अरुण जेटली उतने काम के नहीं हैं जितने आरोपों से घिरे कमजोर अरुण जेटली.
ऐसे में मौजूदा भाजपा में जेटली की साफ-सुथरी छवि ही उनकी सबसे बड़ी दुश्मन बन गई. भाजपा सूत्रों की मानें तो पार्टी से निलंबित किए गए कीर्ति आजाद का तो जो होगा सो होगा लेकिन इतना तय है कि जेटली से उनका मंत्रालय नहीं छीना जाएगा, क्योंकि ऐसा पार्टी के शीर्ष नेताओं में से कोई नहीं चाहता. सब यही चाहते हैं कि जेटली राजनीतिक तौर पर जितने कमजोर हो सकें, उतना हो जाएं और फिर सरकार और पार्टी में रक्षात्मक मुद्रा अपनाकर अपना काम करते रहें.