इस साल की तीन बड़ी घटनाएं जिनके बारे में कहा जा सकता है कि उनमें आने वाली दुनिया का स्वरूप बदलने की क्षमता है.
इस साल जुलाई में जब ईरान और अमेरिका सहित दुनिया की छह बड़ी शक्तियों के बीच समझौता हुआ तो समय के चक्के ने जैसे एक चक्कर पूरा कर लिया. इस समझौते के तहत ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने और उसकी निगरानी करवाने पर राजी हुआ. बदले में उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाने की सहमति बनी. कुल मिलाकर देखें तो ईरान के साथ अपने रिश्तों के मामले में अमेरिका उस मोड़ की तरफ लौटने की कोशिश करता दिख रहा है जिससे करीब छह दशक पहले वह दूर चला आया था. इससे बाकी दुनिया भी किसी न किसी रूप में प्रभावित होगी, यह तय है.
आम धारणा है कि अमेरिका के साथ ईरान के रिश्ते तब खराब हुए जब उसके दुलारे शाह रजा पहलवी को 1979 में ईरान की इस्लामी क्रांति ने उखाड़ फेंका. लेकिन इस टकराव की जड़ें 1950 के दशक तक जाती हैं जब सीआईए ने लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए ईरान के लोकप्रिय प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेक की सरकार का तख्तापलट करवा दिया था. इसके बाद 25 साल तक सत्ता पहलवी के हाथ में रही. बताते हैं कि इस दौरान ईरान के तेल से होने वाली अकूत आमदनी का आधा हिस्सा अमेरिकी और ब्रिटिश कंपनियों के एक कंसोर्टियम को मिलने लगा. इससे पैदा हुए असंतोष को हथियार बनाते हुए अयातुल्लाह खुमैनी की क्रांति ने 1979 में शाह और अमेरिका के इस गठजोड़ का अंत कर दिया.
लेकिन यह सिर्फ ईरान की मजबूरी नहीं थी जो उसे समझौता करना पड़ा. अमेरिका सहित बाकी ताकतों के लिए भी ऐसा करना इतना ही जरूरी हो गया था.
इसके बाद दोनों देशों के बीच का अविश्वास गहराता गया. अमेरिका से दुश्मनी मोल लेने का ईरान के लिए वही नतीजा हुआ जो होना था. व्यापार के मोर्चे पर वह बाकी दुनिया से कटता गया. फिर इस सदी की शुरुआत में ईरान के अघोषित परमाणु केंद्रों के खुलासे की खबरें आईं और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने उस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए. इसने तेल और गैस जैसे प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद ईरान की कमर तोड़ दी. इसके बाद पी5+1 कही जाने वाली छह शक्तियों के साथ उसकी बातचीत का लंबा दौर शुरू हुआ जिसकी परिणति जुलाई में वियना समझौते के साथ हुई.
लेकिन यह सिर्फ ईरान की मजबूरी नहीं थी जो उसे समझौता करना पड़ा. अमेरिका सहित बाकी ताकतों के लिए भी ऐसा करना इतना ही जरूरी हो गया था. इसका कारण यह है कि बीते कुछ सालों के दरम्यान मध्य-पूर्व के बदलते समीकरणों ने अमेरिका और यूरोप की नींद उड़ा दी है. अमेरिका के दुलारे सऊदी अरब ने इस्लाम की जिस वहाबी विचारधारा को पाला-पोसा उससे इस्लामिक स्टेट (आईएस) नाम का एक दानव खड़ा हो चुका है. उसकी भुजाएं कितनी विशाल हो चुकी हैं यह पेरिस से लेकर हाल में अमेरिका के कैलीफोर्निया में हुए हमलों से जाहिर हो रहा है.
ईरान शिया जगत का नेतृत्व करता है. जानकारों के मुताबिक अमेरिका को उम्मीद है कि वह मजबूत होगा तो आईएस को हराना कम मुश्किल होगा.
माना जा रहा है कि आईस से निपटने की कोशिश में अमेरिका अब इस्लाम के उस शिया धारा के हाथ मजबूत करना चाहता है जो न सिर्फ अपेक्षाकृत लचीली मानी जाती है बल्कि आईएस के निशाने पर भी है. ईरान शिया जगत का नेतृत्व करता है. जानकारों के मुताबिक अमेरिका को उम्मीद है कि वह मजबूत होगा तो आईएस को हराना कम मुश्किल होगा.
अमेरिका को ईरान की तरफ झुकता देखकर उसके कट्टर दुश्मन और सुन्नी जगत के केंद्र सऊदी अरब ने मध्य-पूर्व में अपने दम पर प्रभुत्व जमाने की कवायद शुरू कर दी है. इस साल की शुरुआत से उसकी अगुवाई में बना एक गठबंधन यमन में ईरान समर्थित उन हूती विद्रोहियों पर बम बरसा रहा है जिन्होंने वहां के राष्ट्रपति को रियाध में शरण लेने पर मजबूर कर दिया है. साफ है कि यह तूफान अभी लंबे समय तक दुनिया को डराता रहेगा.
पेरिस का जलवायु समझौता
लंबी जद्दोजहद के बाद 12 दिसंबर को पेरिस में दुनिया के 195 देशों में एकराय बन गई. जलवायु परिवर्तन की रोकथाम की दिशा और दायित्व तय हो गए. सबने मान लिया कि औसत वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी को किसी भी हालत में दो डिग्री सेल्सियस से आगे नहीं जाने देना है. बल्कि कोशिश करनी है कि यह आंकड़ा 1.5 डिग्री तक ही रहे. इसके लिए तापमान को बढ़ाने वाली ग्रीनहाउस और दूसरी गैसों के उत्सर्जन में कटौती कैसे होगी, इसका एक खाका बन गया है.
वैसे भी दो डिग्री बढ़ोतरी के खतरनाक रास्ते का आधा सफर पूरा हो चुका है. दुनिया में हर जगह औसत तापमान में बढ़ोतरी महसूस की जा रही है. इसके नतीजे भी दिख रहे हैं. यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और एशिया में लू की घटनाओं का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है. उधर, भारत और तमाम दक्षिण एशियाई देशों में अचानक भारी बारिश के चलते बाढ़ की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है. ध्रुवों पर जमी बर्फ तेजी से पिघल रही है और आशंका जताई जा रही है कि इसके चलते समुद्र का ऊपर उठ रहा स्तर इस सदी के आखिर तक मुंबई सहित दुनिया के कई तटीय शहरों को लील जाएगा. ये सारे बदलाव करोड़ों लोगों की जिंदगी पर असर डालेंगे.
मासूम अयलान कुर्दी की इस तस्वीर ने सारी दुनिया को झकझोर दिया
मासूम अयलान कुर्दी की इस तस्वीर ने सारी दुनिया को झकझोर दिया
पेरिस में हुआ जलवायु समझौता एक तरह से यह भी दिखाता है कि दुनिया को अब संभलने और बदलने की जरूरत का अहसास हो चुका है.
तो पेरिस में हुआ समझौता एक तरह से यह दर्शाता है कि दुनिया को अब संभलने और बदलने की जरूरत का अहसास हो चुका है. अमेरिका हो या भारत, सबने माना है कि उन्हें जितनी जल्दी हो सके जीवाश्म आधारित ईंधनों यानी तेल-गैस से दूर जाना है और सौर या पवन ऊर्जा जैसे स्रोतों पर अपनी निर्भरता बढ़ानी है. हालांकि आदर्श स्थिति के हिसाब से इस समझौते को देखा जाए तो कइयों को निराशा हो सकती है और हो भी रही है. लेकिन इस मुददे पर अब तक जो हुआ है उस लिहाज से देखा जाए तो यह समझौता भविष्य के लिए उम्मीदें जगाता है.
सभी देशों में एकराय बनाने की यह कवायद 1992 के आसपास संयुक्त राष्ट्र की अगुवाई में शुरू हुई थी. इसकी परिणति 1997 में हुए क्योतो समझौते के रूप में हुई. लेकिन उस समझौते में यह कह कर सारी जिम्मेदारी विकसित देशों पर डाल दी गई थी कि उन्होंने ही अब तक के अपने अंधाधुंध विकास से तापमान को बढ़ाया है, इसलिए अब वे ही उसकी रोकथाम की कीमत भी चुकाएं. नतीजा वही हुआ जो होना था. अमेरिका ने इस समझौते को ठुकरा दिया.
समझौता तभी 2020 से सबके लिए बाध्यकारी होगा, जब कम से कम 55 ऐसे देश, जो तापमानवर्धक गैसों का कम से कम 55 प्रतिशत हिस्सा उत्सर्जित करते हैं, इसको विधिवत स्वीकृति दे देंगे.
अब पेरिस में हुआ समझौता एक व्यापक सहमति के रूप में आया है. लेकिन अभी यह कानून नहीं बना है. समझौता तभी 2020 से सबके लिए बाध्यकारी होगा, जब कम से कम 55 ऐसे देश, जो तापमानवर्धक गैसों का कम से कम 55 प्रतिशत हिस्सा उत्सर्जित करते हैं, इसको विधिवत स्वीकृति दे देंगे. समझौते की फ़ाइल 22 अप्रैल 2016 से 21 अप्रैल 2017 तक न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में सभी देशों की ओर से हस्ताक्षर के लिए रखी रहेगी. 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस भी पड़ता है. यानी अगले पृथ्वी दिवस से यह साफ होना शुरू हो जाएगा कि हम धरती की सेहत और अपना वजूद बचाने के प्रति कितने गंभीर और ईमानदार हैं.
यूरोप की तरफ हो रहा विस्थापन
अरब जगत में हुई जैस्मीन क्रांति की आंच जब 2011 में सीरिया पहुंची तो शायद ही किसी ने कल्पना की हो कि चार साल बाद यह यूरोप को दोफाड़ के कगार पर पहुंचा देगी. यह वही यूरोप है जिसके देशों ने करीब डेढ़ दशक पहले अपने झंडे झुकाकर और एक-दूसरे के लिए सीमाएं खोलकर बाकी दुनिया के सामने आदर्श पेश किया था. आज उसके ही कई देश अपनी सीमाएं बंद कर रहे हैं और बाकियों को चेतावनी दे रहे हैं कि उन्होंने भी ऐसा नहीं किया तो वे भविष्य में पछताएंगे.
इसकी वजह है गृहयुद्ध से जूझते सीरिया और इराक जैसे देशों से यूरोप पहुंचते शरणार्थियों के रेले. 2011 से सिर्फ सीरिया के ही 40 लाख से ज्यादा लोग देश छोड़ चुके हैं. इराक, अफगानिस्तान जैसे अस्थिर देशों से भी बड़ी संख्या में लोग भाग रहे हैं. इन शरणार्थियों की मंजिल यूरोप उनके बोझ तले हांफ रहा है. ‘रेफ्यूजीज़ वेल्कम’ की तख्तियों के साथ कल तक जिन शरणार्थियों का स्वागत हो रहा था, आज उन्हें दुत्कारा जा रहा है. दुत्कारने वाले सिरफिरे या घोर दक्षिणपंथी ही नहीं, पढ़े-लिखे, सफ़ेदपोश मध्यवर्गीय लोग भी हैं. जर्मनी में तो नौबत यह है कि वहां के अनगिनत छोटे-बड़े नेता और अनेक शहरों के मेयर जान लेने की धमकियों के बीच जी रहे हैं. इससे इन देशों के राजनीतिक समीकरण बदलना स्वाभाविक है.
चांसलर अंगेला मेर्कल ने भले ही दुनिया भर में तारीफें बटोरी हों, लेकिन अपनी उदारता का सिक्का जमाने के लिए की गई इस कवायद से अब उनकी कुर्सी ही खतरे में आ गई है.
दरअसल अपनी छोटी सी आाजादी का स्वरूप बदलने के डर से हंगरी और पोलैंड जैसे कई देशो ने तो पहले ही साफ कर दिया था कि वे शरणार्थियों को अपने यहां बसाने के पक्ष में नहीं हैं. लेकिन पेरिस में हाल में हुए आतंकी हमले और उसके तार यूरोपीय संघ की राजधानी ब्रसेल्स के मुस्लिमबहुल इलाके मोलनबेक से जुड़ने के बाद अब फ्रांस और जर्मनी जैसे वे देश भी चिंतित हैं जिन्होंने उदारता के साथ अपने दरवाजे शरणार्थियों के लिए खोलने का ऐलान किया था. जर्मनी में तो इस साल 10 लाख शरणार्थियों के पहुंचने की बात कही जा रही है. चांसलर अंगेला मेर्कल ने भले ही दुनिया भर में तारीफें बटोरी हों, लेकिन अपनी उदारता का सिक्का जमाने के लिए की गई इस कवायद से अब उनकी कुर्सी ही खतरे में आ गई है. वहां इस मुद्दे पर सत्तारूढ़ गठबंधन की तीनों पार्टियों– चांसलर मेर्कल की सीडीयू, बवेरिया राज्य की सीएसयू और उप-चांसलर गाब्रिएल की एसपीडी– के बीच राजनीतिक खींच-तान बढ़ती जा रही है.
खराब आर्थिक हालात के साथ अप्रवासियों की इस भीड़ के मेल नतीजा यह है कि यूरोप में एक समय पूरी तरह हाशिये पर जा चुका धुर दक्षिणपंथ अब वापसी कर रहा है. ब्रिटेन से लेकर फ़्रांस, ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी, हॉलैंड, ग्रीस और इटली तक विभिन्न चुनावों में दक्षिणपंथी पार्टियों को नया जीवन मिलता दिख रहा है. कई तो यह भी कह रहे हैं कि यूरोप में हालात वैसे ही होते जा रहे हैं जैसे 1930 में थे जिनके चलते जर्मनी में नाजी पार्टी और एडोल्फ़ हिटलर का झंडा बुलंद हुआ. अगर वास्तव में ऐसा है तो यह यूरोप के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी है.