भारतीय सेना के दो सेवानिवृत्त जवानों, पीएस धोबले और दादासाहेब भोसले के लिए तीन साल पहले की गई वह यात्रा प्रतीकात्मक रूप से काफी महत्वपूर्ण थी. नया साल शुरू होने के एक घंटे बाद वे दादर स्थित भीमराव अंबेडकर के समाधि स्थल से एक बस में सवार हुए थे. उनके जैसे ही 300 और वर्दीधारी महिला-पुरुष भी इस यात्रा में उनके साथ थे.

पांच घंटे बाद सुबह-सुबह ये सारे लोग अपनी मंजिल यानी पुणे के पास स्थित भीमा कोरेगांव पहुंच गए. भीमा नदी के किनारे यही वह जगह है जहां 1818 में कमजोर सी लगने वाली 500 महार लड़ाकों की एक टुकड़ी ने कंपनी झंडे के तले लड़ते हुए अपने से कहीं ताकतवर पेशवा सेना को शिकस्त दी थी. आज 200 साल बाद भी इस लड़ाई की निशानियां यहां मिलती रहती हैं. ग्रामीण बताते हैं कि नदी के तल में कई बार उस दौर की तलवारें मिल जाती हैं.

भोसले गर्व के साथ इस कहानी को हमसे साझा करते हुए बताते हैं कि कैसे 500 महार लड़ाकों ने पूरे जोशो-खरोश के साथ पेशवाओं की 25000 की मजबूत सेना पर हमला किया था, जिसके पास तब बंदूकें हुआ करती थीं. भोसले कहते हैं, ‘हमने पेशवाओं का शासन खत्मकर अंग्रेजों को भारत सौंप दिया.’

भोसले 1965 का युद्ध लड़ चुके हैं. श्रीलंका, अंडमान और निकोबार, और जम्मू-कश्मीर में तैनात रहे इस पूर्व सैनिक, जिसकी वर्दी पर कई मेडल दिख रहे हों, के मुंह से इस तरह की बात आप को कुछ असामान्य लग सकती है. लेकिन कोरेगांव की लड़ाई महारों और भारत के दूसरे दलितों के लिए बहुत महत्व रखती है. इसलिए वे हर बार एक जनवरी को पेशवाओं के अमानवीय शासन के खिलाफ अपनी जीत का उत्सव और जाति आधारित उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत का दिन मनाने के लिए यहां इकट्ठे होते हैं.

कहा जाता है कि 1818 में साल के पहले दिन ईस्ट इंडिया कंपनी के 500 सैनिकों ने भीमा नदी को पार करके भीमा कोरेगांव में अपने से कहीं ताकतवर और सुसज्जित पेशवा की 25,000 सैनिकों की टुकड़ी को धूल चटा दी थी. ईस्ट इंडिया कंपनी के ये सैनिक अंग्रेज कर्नल एफएफ स्टॉन्टन की अगुवाई में लड़े थे.

हो सकता है यह कुछ बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात हो लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों से मिलान करें तो इसे कम करके नहीं आंका जा सकता. अंग्रेजों के तत्कालीन दस्तावेजों के हिसाब से 500 की जगह लड़ाई में 900 महार सैनिक शामिल हुए थे और दूसरी तरफ पेशवा के 25,000 नहीं बल्कि 20,000 हजार सैनिक थे. एक बात यह भी है कि उस समय तक पेशवा रक्षात्मक मुद्रा में थे. ईस्ट इंडिया कंपनी पेशवा से राजधानी पुणे छीन चुकी थी और शनिवारवाडा महल पर भी उसका झंडा लहरा चुका था.

ऐतिहासिक तथ्य जो भी हों लेकिन अंग्रेजों के लिए यह लड़ाई तीसरे मराठा-अंग्रेज युद्ध का आखिरी मोर्चा था जिसने पेशवाओं के साम्राज्य का अंत कर दिया. इस लड़ाई ने पश्चिमी भारत में अंग्रेजों के शासन की बुनियाद रखी थी.

पहले मराठा शासक शिवाजी महारों को अपनी सेना में पूरी उदारता के साथ भरती करते थे लेकिन, दो दशक बाद पेशवाओं के शासनकाल में यह स्थिति पूरी तरह पलट गई. पेशवा ब्राह्मण थे और उनमें रूढ़िवादिता कूट-कूटकर भरी हुई थी. कहा तो ये भी जाता है कि उनके शासनकाल में जब कोई महार नगर में प्रवेश करता था तो उसे अपने पीछे झाड़ू बांधकर चलना पड़ता था ताकि उसके कदम जहां पड़े हों वह धूल साफ होती जाए. उन्हें मुंह के नीचे गर्दन से एक कटोरी बांधकर बाहर निकलना पड़ता था ताकि उनका थूक जमीन पर न गिरे. उस दौर में जाति छिपाना सजायोग्य अपराध था.

दलित वर्ग इस लड़ाई से जुड़े अपने दस्तावेजों में इसबात पर जोर देता है कि जब अंग्रेज उनसे संपर्क साध रहे थे तब उन्होंने पेशवा बाजीराव द्वितीय को अपनी सेवाएं देने का प्रस्ताव रखा था. बाजीराव ने जब प्रस्ताव ठुकरा दिया तब वे अंग्रेजों के साथ हो गए.

महारों के लिए अंग्रेजों का शासन भी उतार-चढ़ाव भरा रहा

महारों का सैन्य इतिहास काफी पुराना है लेकिन, 1893 में अंग्रेजों ने सेना में उनकी भरती बंद कर दी. यह 1857 के विद्रोह का नतीजा था. अंग्रेजों ने इसके बाद अपनी रणनीति बदलते हुए तय किया कि सेना में सिर्फ ‘लड़ाका जातीय’ वर्ग के लोगों को ही रखा जाएगा. ‘दक्षिण के स्त्रैण लोगों’ और ‘बॉम्बे के कथित महराट्टा’ को भी सेना से बाहर रखा गया.

जिन वर्गों को सेना से बाहर किया गया उनके लिए यह झटके से कम नहीं था. लेकिन उनमें भी महारों पर इस फैसले की सबसे ज्यादा मार पड़ी. वे हिंदू समाज में सबसे निचले तबके – ‘अछूत वर्ग’ में शामिल थे. सेना में काम करने का मौका खोने का मतलब था कि अच्छी शिक्षा और कम से कम कागजों पर ही सही बाकी समुदायों के साथ बराबरी से उठने-बैठने का मौका खोना.

हालांकि प्रथम विश्व युद्ध के समय जब अंग्रेजों को और सैनिकों की जरूरत महसूस हुई तो महार समुदाय के लोग एकबार फिर सेना में भरती किए जाने लगे. सेना में उनके नाम पर एक रेजीमेंट भी बनी लेकिन युद्ध खत्म होते ही इसे खत्म कर दिया गया. 1945 में इसे फिर गठित किया गया. फिलहाल मध्य प्रदेश के सागर में इसका मुख्यालय है. धोबले और भोसले इसी रेजीमेंट में सैनिक रहे हैं. हर साल महार रेजीमेंट के सैनिक, वर्दियों और बिना वर्दियों के भी यहां आकर स्मृति स्तंभ पर श्रद्धासुमन चढ़ाते हैं.

धोबले और भोसले 16 साल पहले सेवानिवृत्त हुए हैं. तब से वे समता सैनिक दल के प्रशिक्षक हैं. यह अर्धसैन्य संगठन बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया से संबंद्ध है और अंबेडकर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वारा हिंदुओं के बीच सैन्यवाद को बढ़ावा देने की कोशिश के आंशिक विरोध में 1926 के दौरान इस संगठन की स्थापना की थी. ‘इस स्मारक से जुड़ी कई यादें हैं’ पुणे विश्वविद्यालय की इतिहासविद् श्रद्धा कुंभोजकर बताती हैं, ‘कोरेगांव की लड़ाई इतिहास के पन्नों से गायब हो चुकी थी. लेकिन जब 1927 में अंबेडकर यहां आए तो इस स्थान को तीर्थ का दर्जा मिल गया. उनकी मृत्यु के बाद इस आयोजन को हिंदू संस्कृति की मुख्यधारा के विकल्प के तौर पर विकसित करने की कोशिश होने लगी.’

क्या यह सिर्फ एक लड़ाई को याद करने का आयोजन है? अंबेडकर की स्मृति से जुड़े जितने कार्यक्रम होते हैं भीमा कोरेगांव का आयोजन भी तकरीबन वैसा ही है. यहां राजनीतिक पार्टियों के भाषण होते हैं, भीमा कोरेगांव की लड़ाई को याद करने वाले गानों के कार्यक्रम भी और अंबेडकर-गौतम बुद्ध की मूर्तियों और पोस्टरों की दुकानें भी दिख जाती हैं. करीब एक लाख या उससे ऊपर लोग भी इकट्ठा हो जाते हैं.

महारों का सैन्य इतिहास काफी पुराना है लेकिन 1893 में अंग्रेजों ने सेना में उनकी भरती बंद कर दी और इससे यह समुदाय बुरी तरह प्रभावित हुआ

भीमा कोरेगांव के भाऊसाहेब भालेराव बताते हैं कि एक दशक पहले तक यह स्थिति नहीं थी, इस लड़ाई को याद करने का आयोजन तो होता था लेकिन खास भीड़ नहीं होती थी. लेकिन बीते सालों में भीमा कोरेगांव रणस्तंभ सेवा समिति के प्रयासों के चलते यह कार्यक्रम बड़े स्तर पर होने लगा और दूर-दूर से लोग इसमें जुटने लगे. गांव के 11 लोग इस समिति के सदस्य हैं और पूरे महाराष्ट्र में 500 स्वयंसेवी फैले हैं. ज्यादातर स्वयंसेवी इन सदस्यों के ही रिश्तेदार हैं. ये सब मिलकर आयोजन की पूरी व्यवस्था संभालते हैं.

महिलाओं को यहां लाने का इंतजाम करने वाली गायत्री कोकरे कहती हैं, ‘हमारे लिए इन महार लड़ाकों की बहादुरी गर्व का विषय है. ये सैनिक हम महिलाओं को भी प्रेरित करते हैं कि हम अपनी जिंदगी की लगाम अपने हाथ में लें.’ कोकरे यह भलीभांति जानती हैं कि जब भी इस तरह के बड़े-बड़े आयोजन होते हैं तो किस तरह दूसरे वर्ग के लोग उनकी ईमानदारी पर शक करते हैं.

अन्य जाति के लोग इस आयोजन को किस तरह देखते हैं इसपर पुणे विश्वविद्यालय की इतिहासविद् श्रद्धा कुंभोजकर एक शोधपत्र में जानकारी देती हैं कि पुणे भीमा कोरेगांव से 50 किमी दूर है. यहां हिंदू आज के दिन कोशिश करते हैं कि इस रोड से होकर न गुजरें. वे लिखती हैं, ‘शहरी मध्यवर्ग जो राजमार्ग से आताजाता है एक दूसरे को याद दिलाता है कि स्मारक के पास वाले हिस्से पर रास्ते में भारी भीड़भाड़ मिलेगी.’ जाहिर है कि इन लोगों के लिए इस आयोजन का कोई महत्व नहीं है लेकिन इससे जाति के खिलाफ संघर्ष की यह लड़ाई कमजोर नहीं होती. यहां लोग उम्मीद जताते हैं कि आने वाले सालों में देश के कोने-कोने से और लोग आएंगे और दो शताब्दियों पुराना यह संघर्ष आज के जातिगत उत्पीड़न के खिलाफ उन्हें भी एकजुट करेगा.