उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और फिलहाल राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह का जन्मदिन लखनऊ में जिस अंदाज में मना उसके बाद इस तरह की चर्चा जोर पकड़ने लगी है.
उत्तर प्रदेश में अगली सरकार किसकी होगी, इसका फैसला तो 2017 में उत्तर प्रदेश के मतदाता करेंगे लेकिन, राजनीतिक दल अभी से अपनी- अपनी सरकारों का दावा करने लगे हैं. सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी ‘एक बार फिर, अखिलेश सरकार’ का नारा बुलंद कर चुकी है. उधर, मायावती ‘अगली बारी, मेरी पारी’ के साथ दावेदारी कर रही हैं. फिर भला केंद्र में सत्ता संभाल रही बीजेपी ही क्यों पीछे रहती? इसलिए उसने भी ‘अगली बार भाजपा सरकार’ का दम भरना शुरू कर दिया है. ऐसे में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह का लखनऊ आकर अपना जन्म दिन मनाना राजनीतिक गलियारों में कई चर्चाओं को जन्म दे गया.
कल्याण सिंह का जन्मदिन लखनऊ में उनके सरकारी आवास में मना और खूब धूमधाम से मना. केक कटा, लड्डू-पूरी बंटे और ‘यूपी का नेता कैसा हो, कल्याण सिंह जैसा हो’ के नारे भी लगे. बहुत दिन बाद भाजपा के खेमे में खासी हलचल हो गई. कल्याण का यह जन्म दिन इसलिए भी खास रहा कि उनके दरबार में माथा टेकने भाजपा के छोटे-बड़े कार्यकर्ता तो आए ही, शुभकामना देने आने वालों में केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र और उत्तर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष सहित तमाम बड़े नेता भी शामिल रहे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बुजुर्ग नेताओं लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी और केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने उन्हें फोन पर बधाई दी.
ऐसा समझा जा रहा है कि उसी दांव को बेअसर करने के लिए कल्याण सिंह का नाम उछाला जाने लगा है और कल्याण सिंह को चेहरा नहीं मोहरा बनाया जा रहा है.
काफी समय तक भाजपा की मुख्य राजनीति से अलग-थलग पड़े रहे कल्याण सिंह के लिए यह एक अविस्मरणीय जन्मदिन बन गया. उन्होंने भी कार्यकर्ताओं के उत्साह को देखते हुए घोषणा कर डाली कि '2017 में यहां सपा और बसपा की सरकार बनने वाली नहीं है. यूपी का अगला मुख्यमंत्री भाजपा का ही होगा.' लेकिन खुद को मुख्यमंत्री घोषित करने के सवाल को वे टाल गए. पत्रकारों के बार बार यूपी में बीजेपी का मुख्यमंत्री चेहरा होने के सवाल पर उन्होंने साफ कहा कि उनकी ऐसी कोई तमन्ना नहीं है और अगर पार्टी ने जोर दिया तो वे अनुरोध करेंगे कि किसी और को चेहरा चुन लिया जाए.
इस तरह कल्याण सिंह ने अपनी तरफ से अपनी स्थिति तो साफ कर दी मगर बीजेपी में एक वर्ग कल्याण की पुरानी छवि और राम के नाम का सहारा लेकर उत्तर प्रदेश में विधानसभा की जीत की राह को आसान बनाना चाहता है. इसलिए जन्मदिन समारोह में कल्याण सिंह जिंदाबाद के नारों के बीच ‘जय श्री राम’ के नारे भी लगते रहे. प्रदेश भाजपा अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी का कहना था, 'कल्याण सिंह पिछले दो दशक में बीजेपी के सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री रहे हैं. अभी वे एक संवैधानिक पद पर हैं, इसलिए उन्हे बीजेपी का मुख्यमंत्री चेहरा बनाने को लेकर कोई चर्चा नहीं की जा सकती.'
बीजेपी की एक लॉबी को इसमें कोई खतरा नहीं दिखाई देता क्योंकि कल्याण सिंह अपनी ईमानदार सरकार के लिए तो जाने ही जाते हैं, उन्हें उत्तर प्रदेश में पिछड़ों का नेता भी माना जाता है.
चर्चा भले ही न की जा सकती हो मगर जिस तरह से कल्याण का जन्म दिन एक 'मेगा इवेंट' बनाया गया उससे इस तरह की चर्चाएं तो सार्वजनिक तौर पर ही होने लगी हैं. वैसे भी उत्तर प्रदेश के जातीय गणित पर यकीन रखने वाली बीजेपी की एक लॉबी को इसमें कोई खतरा नहीं दिखाई देता क्योंकि कल्याण सिंह अपनी ईमानदार सरकार के लिए तो जाने ही जाते हैं, उन्हें उत्तर प्रदेश में पिछड़ों का नेता भी माना जाता है. पार्टी में कई कल्याण को पिछड़ा वोट बैंक’ की एक अहम चाबी मानते हैं.
लेकिन उत्तर प्रदेश के चुनावी गणित को जानने वाले प्रोफेसर विश्वजीत सिंह का मानना है कि कल्याण सिंह की उम्र उनकी छवि के साथ तालमेल नहीं खाती. वे कहते हैं, 'उनकी उपयोगिता तभी लाभदायक मानी जा सकती है जब वे विधान सभा चुनावों की जनसभाओं के लिए पहुंच सकें, वोटर को अपने भाषणों से जोड़ सकें, लेकिन मुझे नहीं लगता कि वे अब इतने सक्षम हैं. फिर जब पार्टी खुद ही बुजुर्ग नेताओं को वनवास की नीति अपना रही है तो कैसे उनके हाथों में इतनी बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है.’
वैसे पार्टी में एक वर्ग इसे राजनाथ सिंह द्वारा नववर्ष के मौके पर लखनऊ में दिखाई गई सक्रियता की प्रतिक्रिया मान रहा है. राजनाथ की सक्रियता देख यह सवाल उठने लगा था कि क्या वे उत्तर प्रदेश में बीजेपी का मुख्यमंत्री चेहरा हो सकते हैं. राजनाथ की दावेदारी की सुगुबुगाहट से ही बीजेपी में दूसरे कई दावेदारों की नींद उड़ गई थी. इसलिए ऐसा समझा जा रहा है कि उसी दांव को बेअसर करने के लिए कल्याण सिंह का नाम उछाला जाने लगा है और कल्याण सिंह को चेहरा नहीं मोहरा बनाया जा रहा है.
उत्तर प्रदेश भाजपा का जो हाल है वह लोकसभा में उसे मिली सीटों के साथ मेल नहीं खाता. संगठन कमजोर है और दावेदार असंख्य. पार्टी अपने कल्पनालोक से बाहर नहीं आना चाहती.
उत्तर प्रदेश भाजपा का जो हाल है वह लोकसभा में उसे मिली सीटों के साथ मेल नहीं खाता. संगठन कमजोर है और दावेदार असंख्य. लखनऊ के अध्यक्ष पद के लिए ही 76 लोगों ने नामांकन करवाया था. इससे समझा जा सकता है कि पार्टी में दावेदारों की संख्या कितनी है. पार्टी के राज्य संगठन के लिए भी नया अध्यक्ष और नई टीम बननी है मगर वहां भी कोई सर्वमान्य नाम नहीं है. पार्टी के साथ एक और समस्या यह है कि वह अपने कल्पनालोक से बाहर नहीं आना चाहती. उत्तर प्रदेश में वोटर भले ही सपा सरकार से असंतुष्ट हो, भले ही बीएसपी की मायावती सरकार का उसका अनुभव बहुत खराब रहा हो, मगर वह उत्तर प्रदेश की नई सरकार का चयन करने से पहले सारे दावेदारों की परख करना बखूवी जानता है और वह किसी हवा महल को हकीकत नहीं बनने देता.
शायद इसीलिए उत्तर प्रदेश के महत्व को समझते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोएडा के हाइवे शिलान्यास कार्यक्रम के बाद अब लखनऊ आने का कार्यक्रम बनाया है. और शायद इसीलिए बीजेपी के मंत्रियों को उत्तर प्रदेश की जमीनी हकीकत समझने के लिए उत्तर प्रदेश के सभी 80 संसदीय क्षेत्रों में भेजे जाने की योजना बनी है. ये मंत्री अपने लिए निर्धारित क्षेत्रों में जाकर, दो तीन दिन वहां रुककर जमीनी हकीकत और उत्तर प्रदेश में बीजेपी के भविष्य की संभावनाओं पर रिपोर्ट तैयार करेंगे. जानकारों के मुताबिक इस फीड बैक के बाद पार्टी यह तय करेगी कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए उसकी रणनीति क्या होगी. बहरहाल जब तक पार्टी अपने पत्ते नहीं खोलती तब तक उत्तर प्रदेश भाजपा में मुख्यमंत्री पद के नए-नए दावेदार भी खड़े होते रहेंगे और भावी चेहरे भी. जब दावेदारी ही करनी है तो भला कोई क्यों पीछे रहे?