जर्मनी में नए साल की रात महिलाओं के साथ हुईं यौन अपराध की घटनाएं और बीते सालों के आंकड़े इस कथित सभ्य समाज की पोल खोलते हैं
यह तीन साल पहले तकरीबन इन्हीं दिनों की बात है. 2013 के जनवरी में जर्मन मीडिया लगातार भारत की चर्चा कर रहा था. अच्छी वजहों से भारत यहां कम ही चर्चा में रहता है और इसबार भी यही था. दिल्ली के निर्भया बलात्कार कांड को लेकर यहां पूरे भारतीय समाज की ऐसी छवि पेश की जा रही थी जैसे इस घटना के प्रति भारतीयों में कोई आक्रोश न हो और वह असभ्य-बर्बर समाज का सबसे बड़ा प्रतीक हो.
निर्भया मामले का असर यह हुआ कि यूरोप के कई देशों में आज भी भारत के बारे में ‘सड़ी-गली हिंदू संस्कृति’ या ‘बलात्कारियों का देश’ वाली टिप्पणियां सुनना असामान्य नहीं है. इस मामले में भी जर्मनी को यूरोप का अगुवा देश कहा जा सकता है. यहां हजारों भारतीय छात्र उच्च शिक्षा के लिए आते हैं. निर्भया कांड के बाद जर्मन बुद्धिजीवियों के दुराग्रहों का अंदाजा कुछ इसी बात से लगाया जा सकता है कि विश्वविद्यालयों की कुछेक महिला प्रोफेसरों ने भारतीय शोधार्थियों का गाइड बनने तक से इनकार कर दिया था.
निर्भया कांड के बाद जर्मन विश्वविद्यालयों की कुछेक महिला प्रोफेसरों ने भारतीय शोधार्थियों का गाइड बनने तक से इनकार कर दिया था
विडंबना ये है कि उस दौरान जर्मन मीडिया ने अपने समाज में झांकने की बिलकुल जरूरत महसूस नहीं की जबकि आंकड़े बताते हैं कि जर्मनी सहित यूरोप के लगभग सभी देशों के पुरुष महिलाओं के साथ छेडछाड़, यौन दुराचार और बलात्कार जैसे अपराधों में उतने ही लिप्त हैं जितना भारत में. और यह कड़वी सच्चाई इसबार नए साल के साथ उसके सामने है. इसबार नया साल जिस अंदाज में जर्मनी में शुरू हुआ वह काफी हद तक इस देश और महाद्वीप के सामाजिक पाखंड को उजागर कर सकता है.
जर्मनी में नए साल का जश्न उसकी ‘सभ्यता’ और सहिष्णुता पोल खोलने वाला साबित हो सकता है
नए साल के आगमन वाली 31 दिसंबर की रात को जर्मनी के तीन बडे शहरों कोलोन, हैम्बर्ग और श्टुटगार्ट में एक ही समय और एक ही ढर्रे पर जो कुछ हुआ, उसका आयाम इतना नया, बड़ा और भयावह था कि वह छिपाए छिप नहीं सकता था. उस रात तीनों शहरों में सैकड़ों लोगों की भीड़ ने दर्जनों महिलाओं को घेरकर उनके साथ न केवल छेड़छाड़ और दुराचार किया, कम से कम दो महिलाओं के साथ बलात्कार भी किया.
यह मामला अब चर्चा में आने की वजह ये है कि जैसा सभी जगह होता है, महिलाओं ने पुलिस के पास देर से अपनी शिकायतें दर्ज कराईं. इसके बाद तो चांसलर अंगेला मेर्कल से लेकर सभी पार्टियों के छोटे-बड़े नेताओं ने आदर्श बयानों की झड़ी लगा दी. 
इस आपराधिक घटनाक्रम की शुरुआत जर्मनी के चौथे सबसे बड़े शहर कोलोन के मुख्य रेलवे स्टेशन से हुई. देश की सबसे बड़ी नदी राइन के किनारे बसे कोलोन का यह मुख्य रेलवे स्टेशन नदी से लगता हुआ ही है. इसे यूरोप का एक सबसे व्यस्त रेलवे स्टेशन माना जाता है. हर दिन देश-विदेश की 1220 ट्रेनें और कोई तीन लाख लोग इस स्टेशन से गुजरते हैं. नदी के दोनों तट और उन्हें जोड़ने वाले कई विशाल पुल नए साल की आतिशबाजी देखने का आदर्श स्थान हैं. इस दिन दूर-दूर से लोग नववर्ष की भव्य आतिशबाजी देखने यहां इकट्ठे होते हैं.
‘उन्होंने हमारे वक्षों और नितंबों को जकड़ लिया. हम डर के मारे कुछ नहीं कर पाईं. वे अरबी बोल रहे थे. इक्के-दुक्के फ्रेंच बोलते भी सुनाई पड़े. हम चारों सोच रही थीं,  हे भगवान, यह सब जर्मनी में कैसे हो सकता है?’
इस बार भी ऐसा ही था. शाम सात बजे से दर्शकों का जुटना शुरू हो गया. प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि उसी समय के आसपास स्टेशन के भीतर और उसके बाहर के चौक तथा स्टेशन से सटे विश्व के सबसे बड़े कैथीड्रल की सीढ़ियों पर  ‘अरबी और अफ्रीकी देशों के नौजवानों’ का भी जमघट होने लगा. रात 11 बजे तक उनकी संख्या लगभग एक हजार हो गई. तब वे कई झुंडों में बंटकर भीड़ के बीच पटाखे इत्यादि फोड़ने और विशेषकर महिलाओं को घेर कर उनके साथ धक्का-मुक्की करने लगे. इस अफरातफरी में कई महिलाओं के पर्स, मोबाइल फोन और दूसरी कीमती चीजें चोरी कर ली गईं. साथ ही उनके साथ पूरी बेशर्मी से छेड़छाड़ की गई, यौन दुर्व्यवहार हुआ.
इस हफ्ते स्थानीय अखबारों में कई पीड़ित महिलाओं की कहानियां प्रकाशित हुई हैं. 37 साल की एस ग्यौक्सू और उनकी तीन सहेलियां भी इन महिलाओं में शामिल थीं. वे नववर्ष मनाने के बाद, एक बजे के आसपास राइन नदी पर बने रेलवे पुल पर से हो कर स्टेशन की तरफ जा रही थीं. तभी पुल पर 15 मर्दों के एक झुंड ने उन्हें घेर लिया. एक जर्मन अखबार ग्यौक्सू के हवाले से लिखता है, ‘उन्होंने हमारे वक्षों और नितंबों को जकड़ लिया. हम डर के मारे कुछ नहीं कर पाईं. वे अरबी बोल रहे थे. इक्के-दुक्के फ्रेंच बोलते भी सुनाई पड़े. वे बहुत गंदे थे...  हम चारों सोच रही थीं,  हे भगवान, यह सब जर्मनी में कैसे हो सकता है?’
सामूहिक यौन दुराचार की घटनाओं से जर्मनी की पुलिस बेखबर थी
जर्मनी की पुलिस यहां आ चुके और अब भी आ रहे शरणार्थियों को संभालने में इतनी व्यस्त है कि 31 दिसंबर की रात कोलोन सेंट्रल स्टेशन के पास आतिशबाजी पर नजर रखने के लिए बहुत कम पुलिसकर्मी उपलब्ध थे. जो पुलिस वाले वहां थे भी, उन्हें या तो कुछ पता नहीं चला या वे जानकर भी अनजान बने रहे.
बलात्कार के कारण जर्मनी में प्रति सप्ताह औसतन दो मौतें हो रही हैं लेकिन खुद जर्मनी या यूरोप का मीडिया इस आंकड़े को प्रकाशित नहीं करता या करना नहीं चाहता
पुलिस का दावा है कि उस शाम उसने स्टेशन के पास करीब 100 पुरुषों को रोककर उनके पहचान-पत्र जांचे थे. इस जांच में उसे ‘हाल ही में सीरिया से आए कई शरणार्थी भी मिले थे’. ताज्जुब की बात है कि पुलिस ने रात बीतते ही घोषित कर दिया था कि नए साल का जश्न ‘शांतिपूर्ण’ रहा.
जर्मन पुलिस के दावे तब ढेर हुए जब बाद के दिनों में पीड़ित महिलाओं ने शिकायतें दर्ज करवाना शुरू किया और स्थानीय समाचारपत्रों को अपनी आपबीती सुना कर हो-हल्ला मचाया. अब तक 200 से अधिक महिलाएं कोलोन स्टेशन के भीतर या बाहर अपने साथ सामूहिक यौन दुराचार होने और पर्स या मोबाइल फोन जैसे सामान चुराए जाने की शिकायतें दर्ज करा चुकी हैं. दो महिलाओं ने अपने साथ बलात्कार होने की शिकायत भी दर्ज कराई है.
नववर्ष वाली रात को जो कुछ कोलोन में हुआ, वही हैम्बर्ग और श्टुटगार्ट में भी दोहराया गया. हालांकि यहां दर्ज शिकायतों की संख्या कोलोन के मुकाबले काफी कम है लेकिन इन तीनों ही शहरों में महिलाओं के धन और सम्मान की लूट का ढर्रा एक जैसा होने से पुलिस को संदेह है कि यह एक सुनियोजित अभियान था, जिसके पीछे संगठित अपराधी भी हो सकते हैं.
तीनों ही शहरों में महिलाओं के धन और सम्मान की लूट का ढर्रा एक जैसा होने से पुलिस को संदेह है कि यह एक सुनियोजित अभियान था, जिसके पीछे संगठित अपराधी भी हो सकते हैं
इन घटनाओं से जर्मन समाज की छवि दागदार हो सकती है लेकिन पुलिस की प्रतिष्ठा पर दाग लग ही चुका है. पहली बात तो यही है कि वह नए साल के जश्न के दौरान महिलाओं के सुरक्षा उपलब्ध कराने में असफल रही, वहीं दूसरी तरफ दर्ज शिकायतों के आधार पर वह अभी एक गिरफ्तारी तक नहीं कर पाई है. 
क्या इन घटनाओं के पीछे जर्मनी में बसे शरणार्थी हैं? 
ज्यादातर पीड़ित महिलाओं ने अपनी शिकायत में कहा है कि उनके साथ दुर्व्यवहार करने वाले लोग  अरबी और अफ्रीकी मूल के थे. इस आधार पर एक आशंका यह भी जताई जा रही है कि कहीं इन घटनाओं को जर्मनी में आ चुके और अब भी आ रहे शरणार्थियों ने अंजाम न दिया हो.
जर्मनी की कट्टर दक्षिणपंथी पार्टियों को छोड़ दिया जाए तो बाकी सभी पार्टियां अब तक यही सहिष्णुतावादी उपदेश देती रही हैं कि अरब-इस्लामी शरणार्थी मुसीबत के मारे बेचारे लोग हैं. उनके बीच अपराधी और आतंकवादी ढूंढना अमानवीयता होगी. हालांकि कोलोन, हैम्बर्ग और श्टुटगार्ट में एक ही रात में जो कुछ हुआ, यदि वह वाकई में अरब-इस्लामी शरणार्थियों की कारस्तानी सिद्ध होता है तो यह जर्मनी में चल रही सहिष्णुता-असहिष्णुता की बहस में सहिष्णुतावादियों के मुंह पर करारा तमाचा होगा. इससे भी बुरी बात यह होगी कि घोर दक्षिणपंथी अपने आप को सही मानने और छाती फुला कर चलने लगेंगे जो आगे चलकर जर्मन समाज के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. 
जर्मनी में भारत से अधिक यौन-अपराध होते हैं
हो सकता है कि नववर्ष की रात वाली घटनाओं के लिए अरब और इस्लामी देशों से आए शरणार्थी या प्रवासी ही दोषी हों. लेकिन इससे यह तथ्य झुठलाया नहीं जा सकता कि जर्मनी में बच्चों और महिलाओं के यौन शोषण के मामले एक हिसाब से भारत को भी पीछे छोड़ देते हैं.
भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, 2013 में बलात्कार के कुल 33,764 मामले दर्ज किए गए थे. इस हिसाब से देश की एक अरब 27 करोड़ जनसंख्या में प्रति एक लाख निवासियों के बीच बलात्कार की घटनाओं का अनुपात 2.6 बैठता है.
भारत में पश्चिमी सभ्यता के प्रशंसक सर्वे की इस बात से चौंक सकते हैं कि यूरोपीय संघ के जिस देश में शिक्षा और रहन-सहन का स्तर जितना ऊंचा है, वहां यौन-हिंसा का अनुपात भी उतना ही ज्यादा है
जर्मन पुलिस के 2013 के ही आंकड़ों के अनुसार, उस वर्ष जर्मनी में बलात्कार या बलात्कार के लगभग बराबर जोर-जबर्दस्ती की कुल 7,408 घटनाएं हुईं. यह प्रति एक लाख जनसंख्या के बीच साल भर में 9.2 बलात्कार के, यानी भारत की अपेक्षा 3.5 गुना अधिक के बराबर है. जर्मन पुलिस के आंकड़े यह भी बताते हैं कि इस देश में हर दिन औसतन 70 मिनट पर एक बलात्कार होता है. इसके अलावा 2013 में 14 साल से कम आयु के बच्चों के साथ यौन शोषण के प्रतिदिन औसतन 34 मामले दर्ज हुए थे.
जर्मनी की प्रशासनिक एजेंसियों से मिले आंकड़े यह भी बताते हैं कि प्रतिवर्ष बलात्कार के 100 से 120 मामलों में पीड़िता की मौत हो जाती है. दूसरे शब्दों में कहें तो  बलात्कार के कारण जर्मनी में प्रति सप्ताह औसतन दो मौतें हो रही हैं लेकिन खुद जर्मनी या यूरोप का मीडिया इस आंकड़े को प्रकाशित नहीं करता या करना नहीं चाहता. 
क्या शिक्षा और संपन्नता बढ़ने के साथ यौन हिंसा भी बढती है!
यूरोपीय संघ द्वारा मार्च, 2014 में प्रकाशित एक सर्वे के मुताबिक संघ के सभी 28 देशों में 18 से 74 उम्र के बीच की हर तीसरी महिला, अपनी आयु के 15वें साल के बाद कम से कम एक बार शारीरिक हिंसा या यौन-हिंसा झेल चुकी है. हर 20वीं महिला कम से कम एक बार बलात्कार भी भुगत चुकी है. भारत में पश्चिमी सभ्यता के प्रशंसक सर्वे की इस बात से चौंक सकते हैं कि यूरोपीय संघ के जिस देश में शिक्षा और रहन-सहन का स्तर जितना ऊंचा है, वहां यौन-हिंसा का अनुपात भी उतना ही ज्यादा है. डेनमार्क में यह 52 प्रतिशत, फ़िनलैंड में 47, स्वीडन में 46 और जर्मनी में 35 प्रतिशत है.
जर्मनी में महिलाओं के प्रति यौन अपराधों के आंकड़ों को देखते हुए इस बात को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता कि नववर्ष की रात हुई घटनाओं में स्थानीय मूल के व्यक्ति शामिल नहीं थे. पुलिस जांच में यदि ये बातें साबित होती हैं तो कम से कम जर्मनी के मीडिया के लिए यह एक ऐसा अवसर जरूर होगा जब वो आत्म-अवलोकन कर सके और अपने कथित सभ्य समाज की सच्चाई उजागर कर सके.