सबसे पहले अपनी ननिहाल में पड़ी गीता प्रेस की लाल जिल्द वाली मोटी-सी रामायण मैंने पढ़ी. किष्किंधा कांड को छोड़कर बाकी सब पढ़ गया. तब शायद मैं नौ साल का था. उस छोटे से बच्चे की पठन-वृत्ति की बड़े लोगों ने बड़ी सराहना की - खासकर इसलिए भी कि वह बच्चा रामायण जैसी धार्मिक किताब पढ़ रहा था.

लेकिन जल्द ही बच्चे के हाथ दूसरी किताबें लग गईं. एससी बेदी के राजन-इकबाल सीरीज़ और रायजादा के राम−रहीम सीरीज़ वाले बाल पॉकेट बुक्स मन को भाने लगे. पराग, नंदन, चंदामामा, इंद्रजाल कॉमिक्स और अमर चित्रकथा तक कभी खरीदकर, कभी मिल-बांटकर और कभी किराये पर लेकर भी पढ़ने का सिलसिला चलता रहा. इतना ही नहीं, उस बच्चे ने बड़े लोगों वाले जासूसी और सामाजिक उपन्यासों पर भी हाथ डाल दिया. कुशवाहा कांत, इब्ने सफी बीए, कर्नल रंजीत, ओम प्रकाश शर्मा, वेद प्रकाश शर्मा और वेद प्रकाश काम्बोज से लेकर गुलशन नंदा, मनोज, समीर, प्रेम वाजपेयी और रानू तक मेरे प्रिय लेखक थे. गरज यह कि जो भी किताब मिल जाती, मैं चाट जाता. दुकानों में मिलने वाले ठोंगे पर क्या लिखा है, यह भी पढ़ जाता और सड़क पर गिरा कोई पूरा पन्ना मिल जाता तो उस पर भी नज़र दौड़ा लेता.

इस ‘बुरी’ आदत ने अचानक मुझे कुछ अच्छे लोगों के बीच पहुंचा दिया. एक दिन टॉलस्टॉय के उपन्यास ‘युद्ध और शांति’ का किशोरोपयोगी संस्करण हाथ लग गया. उसे पढ़कर समझ में आया कि शब्दों की दुनिया कहीं ज्यादा मूल्यवान होती है. प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद ने इस अनुभव को और बड़ा बनाया. आठवीं-नवीं क्लास तक आते-आते सारिका और दूसरी कथा पत्रिकाएं साथ हो लीं. संजीव की मशहूर कहानी ‘अपराध’ ने भी जादू किया. उसी दौर में गौतम सान्याल की कहानी ‘तुम्हारे बाद सौमित्रो दा’ का असर भी बहुत गहरा पड़ा. प्रियंवद की ‘बोसीदनी’ और उदय प्रकाश की ‘तिरिछ’ जैसी कहानियां बार-बार आवाज़ देती रहीं.

पढ़ने की इस आदत का दूसरा सिरा कविताओं से जुड़ा हुआ था. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का मोटा-सा काव्य संग्रह ‘चक्रवाल’ घर में था. उसी में पहली बार पढ़ी ‘हिमालय’ - ‘मेरे नगपति मेरे विशाल साकार दिव्य गौरव विराट, पौरुष के पूंजीभूत ज्वाल, मेरी जननी के हिमकिरीट, मेरे भारत के दिव्य भाल, मेरे नगपति मेरे विशाल...’

उस कच्ची उम्र में इस कविता की उदात्तता ने एक सम्मोहन का काम किया. इसके बाद दिनकर मेरे प्रिय कवि हो गए. चक्रवाल की कई कविताएं कंठस्थ हो गईं. पूरी की पूरी ‘रश्मिरथी’ भी. बल्कि नवीं में पढ़ते हुए कर्ण की नकल पर मैंने भीष्म पर ही रश्मिरथी जैसा खंड काव्य लिखने की कोशिश की. 15−20 पृष्ठ लिखने के बाद फाड़कर फेंक दिया. अपनी सीमा समझ में आ गई. उसी वक्त हिन्दी के दूसरे बड़े कवियों से रिश्ता बना. छायावाद के चार स्तंभों निराला, प्रसाद, पंत और महादेवी के अलावा अज्ञेय, बच्चन, भवानी प्रसाद मिश्र, नागार्जुन प्रिय कवि बन गए. बाद में रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना को पढ़कर समझ में आया कि नई कविता की रेंज कितनी बड़ी और गहरी हो सकती है. शमशेर ने इस अनुभव में नई आंख जोड़ी. विष्णु खरे, मंगलेश डबराल और वीरेन डंगवाल से होते हुए देवी प्रसाद मिश्र और बिल्कुल युवा लेखकों तक सब कुछ न कुछ जैसे मुझे सौंपते रहे.

किताबों से मुहब्बत का यह अफसाना अब तक जारी है. कहानियों और उपन्यासों की इस दुनिया में देसी-विदेशी सब तरह के लेखक जुड़ते गए, अपने होते चले गए. अज्ञेय, फणीश्वरनाथ रेणु, जैनेंद्र कुमार, अमृतलाल नागर, भगवतीचरण वर्मा से लेकर राजेंद्र यादव, निर्मल वर्मा, मनोहर श्याम जोशी, कमलेश्वर, मोहन राकेश, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, धर्मवीर भारती और अभी के वीरेंद्र जैन, अलका सरावगी, मैत्रेयी पुष्पा और अखिलेश तक. बीच में ढेर सारे नाम हैं, जिन्हें भूलना मुश्किल है और लिखना और ज्यादा मुश्किल - क्योंकि सूची जैसे ख़त्म होगी ही नहीं.

इस सिलसिले में दुष्यंत और धूमिल भी जुड़े और ग़ालिब−मीर से लेकर फ़ैज़−फ़िराक़ तक. अब भी कविताओं की कोई न कोई किताब हमेशा सिरहाने रहती है जिन्हें दिन में कई−कई बार पलटता, पढ़ता या फिर छूकर निकलता रहता हूं. इन दिनों किताबों के अलावा सोशल मीडिया की मार्फ़त उभरे कई लेखकों को पढ़ना सुखद लग रहा है.

इस समूचे दौर में कभी रूसी लेखकों टॉल्स्टॉय, चेखव गोर्की, तुगर्नेव दॉस्तोव्स्की, ऑस्त्रोव्स्की शोलोखोव और गोगोल का बहुत गहरा असर रहा. तुगर्नेव का ‘ओत्सेशिनी’ यानी ‘पिता और पुत्र’ मेरे लिए भुलाना मुश्किल है - बजारोव जैसा निहिलिस्ट किरदार हमेशा मेरे साथ चलता है, जो सिर्फ निहिलिज़्म ही नहीं सिखाता है.

एक इत्तफाक ने रूसी कविताओं की पूरी परंपरा से भी परिचय कराया. जब दिल्ली नया-नया आया था, उन्हीं दिनों जेएनयू में रूसी के प्राध्यापक रहे डॉ. वरयाम सिंह ने रूसी कविता पर मुझसे एक प्रोजेक्ट का काम करवाया. उन्होंने रूसी कवियों के अनुवादों पर मुझसे टिप्पणियां लिखवाईं. कई बार एक ही कवि के कई−कई अनुवादों से गुजरते हुए कवि का मोल और कविता का मर्म समझने की नौबत आती थी. लेकिन, उस दौर में पुश्किन, त्यूतचेव लेर्मंतेव, अख्मातोवा त्वस्वेतायेवा, ब्लोक मायाकोव्स्की, वोज्नेसेंस्की और येव्तुशेन्को को मैंने बड़ी तन्मयता और संलग्नता से पढ़ा. हां, ब्रेख़्त, पाब्लो नेरुदा, महमूद दरवेश और नाजिम हिकमत कभी विदेशी कवि लगे ही नहीं- क्योंकि इन्हें ज़्यादातर हिंदी में ही पढ़ा. इसी तरह पाश, जीवनानंद दास, नामदेव ढसाल दूसरी भारतीय भाषाओं से आए लेखक प्रतीत नहीं हुए. बाद में शिम्बोर्स्का और ट्रांसटोमर तक के अनुवाद का भी दुस्साहस किया मगर गिनती की कुछ कविताओं से ज़्यादा नहीं बढ़ पाया.

यह सब लिखते हुए अचानक याद आ रहा है कि रांची की रामकृष्ण लाइब्रेरी में बांग्ला लेखकों - खासकर शरतचंद्र और विमल मित्र - को पढ़ते हुए जितना कुछ सीखा, वह भी बहुत मूल्यवान रहा और विश्वविद्यालय ने चॉसर से लेकर शेक्सपियर और एलियट तक अंग्रेजी साहित्य का जो विपुल ज्ञान दिया, वह एक अलग थाती बना. बाद के दौर में गैब्रिएल गार्सिया, मारखेज ओरहान, पामुक नगीब महफूज जैसे साहित्यकारों को पढ़कर साहित्य और जीवन की अलग−अलग परतें समझ में आती रहीं.

सवाल है किताबों ने क्या किया और क्या दिया. मेरी तरह के व्यक्तित्वहीन आदमी को दुनिया से आंख मिलाने का साहस दिया. किताबों ने अकेलापन भी दिया और अकेलेपन से निकलने का रास्ता भी दिया. किताबें इकलौती दोस्त रहीं, जो कभी रूठी नहीं. किताबों के पन्नों से निकलकर किरदार जैसे जीवन को रास्ता दिखाते रहे. कभी निर्मल वर्मा की बिट्टी अपने साथ इलाहाबाद से दिल्ली ले गई, कभी रेणु का जित्तन अपने महल के बुर्ज पर साथ बिठाकर विकास का सपना दिखाता रहा. कभी मनोहर श्याम जोशी का मनोहर अपनी हसरतों में हमारा भी हिस्सा जोड़ता रहा, कभी मोहन राकेश का कालिदास साहित्य और जीवन की दुविधा समझाता रहा.

किताबों ने दुनिया को देखने की आंख दी - समझाया कि जिंदगी वही नहीं होती, जो दिखाई पड़ती है, उसकी अनगिनत परतें होती हैं. किताबों ने अपने ऊपर संशय करना सिखाया, दूसरों को माफ करना सिखाया. किताबों ने जीवन का मोल भी समझाया, दुनिया की व्यर्थता भी बताई. किताबों ने कुल मिलाकर ऐसा बनाया कि अपनी बहुत सारी नाकामियों के बावजूद जीवन व्यर्थ गया नहीं लगता है.